श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरते हैं; तब हम कह सकते हैं, कि सजीव सृष्टिके आचरणका यही परस्पर-सहा- यताका गुण - प्रधान नियम है। सजीव सृष्टिमें यह नियम पहले पहल संतानोत्पादन और संतानके लालन-पालनके बारेमें दीख पड़ता है। ऐसे अत्यंत सूक्ष्म कीड़ोंकी सृष्टिको देखनेसे - कि जिसमें स्त्री-पुरुषका कुछ भेद नहीं है - ज्ञात होगा कि एक कीड़ेकी देह बढ़ते बढ़ते फट जाती है; और उससे दो कीड़े बन जाते हैं। अर्थात् यही कहना पड़ेगा कि संतानके लिये - दूसरेके लिये - यह कीड़ा अपने शरीरकोभी त्याग देता है। इसी तरह सजीव सृष्टिमें इस कीड़ेसे ऊपरके दर्जेके स्त्री-पुरुषात्मक प्राणीभी अपनी अपनी संतानके पालन-पोषणके लिये स्वार्थत्याग करनेमें आनंदित हुआ करते हैं। यही गुण बढ़ते बढ़ते मनुष्य जातिके असभ्य और जंगली समाजमेंभी इस रूपमें पाया जाता है, कि वे लोग न केवल अपनी संतानोंकी रक्षा करनेमें - वरन अपने जाति-भाइयोंकी सहायता करनेमेंभी सुखसे प्रवृत्त हो जाते हैं। इसलिये मनुष्यको - जो कि सजीव सृष्टिका शिरोमणि है - स्वार्थके समान परार्थमेंभी सुख मानते हुए सृष्टिके उपर्युक्त नियमकी उन्नति करने तथा स्वार्थ और परार्थके वर्तमान विरोधको समूल नष्ट करनेके उद्योगमें लगे रहना चाहिये। बस इसीमें उसकी इतिकर्तव्यता है।* यह युक्तिवाद तो ठीक है; परंतु यह तत्त्व कुछ नया नहीं है, कि परोपकार करनेका सद्गुण मूक सृष्टिमेंभी पाया जाता है, इसलिये उसे परमावधि तक पहुँचानेके प्रयत्नमें ज्ञानी मनुष्योंको सदैव लगे रहना चाहिये। इस तत्त्वमें विशेषता सिर्फ यही है, कि आजकल आधिभौतिक शास्त्रोंके ज्ञानकी बहुत वृद्धि होनेके कारण इस तत्त्वकी आधिभौतिक उपपत्ति उत्तम रीतिसे बतलाई गई है। यद्यपि हमारे शास्त्रकारोंकी दृष्टि आध्यात्मिक है, तथापि हमारे प्राचीन ग्रंथोंमें कहा है कि :- अष्टादशपुराणानां सारं सारं समुद्धृतम् । परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ “ परोपकार करना पुण्यकर्म है और दूसरोंको पीडा देना पापकर्म है। वह यही अठा- रह पुराणोंका सार है।” भर्तृहरिनेभी कहा है, कि “ स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमान् एकः सतां अग्रणीः ” - परार्थहीको जिस मनुष्यने अपना स्वार्थ बना लिया है, वही सब सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ है। अच्छा, अब यदि छोटे कीड़ोंसे मनुष्यतककी सृष्टिकी उत्तरोत्तर क्रमशः बढ़ती हुई श्रेणियोंको देखें, तो एक और भी प्रश्न उठता है। वह यह है - क्या, मनुष्योंमें केवल परोपकारबुद्धिहीका उत्कर्ष हुआ है, या उसीके
- यह उपपत्ति स्पेन्सरके Data of Ethics नामक ग्रंथमें दी हुई है। स्पेन्सरने मिलको एक पत्र लिखकर स्पष्ट कह दिया था, कि मेरे और आपके मतमें क्या भेद है। उस पत्रके अवतरण उक्त ग्रंथमें दिये गये हैं। pp. 57, 123. Also see Bain's Mental and Moral Science, pp. 721, 722 (Ed. 1875.)