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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 956 में से

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पृष्ठ 137

९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारण गीतामें यह बतलाया गया है, कि यदि एकही धर्म-कार्यके लिये दो मनुष्य समान धन प्रदान करें, तोभी अर्थात् दोनोंके बाह्य कर्म एकसमान होनेपरभी, दोनोंकी बुद्धि या भावकी भिन्नताके कारण एक दान सात्त्विक और दूसरा राजस या तामसभी हो सकता है। इस विषयपर अधिक विचार पूर्वी और पश्चिमी मतोंकी तुलना करते समय करेंगे। अभी केवल इतनाही देखना है, कि कर्मके केवल बाहरी परिणामपरही अवलंबित रहनेवाली आधिभौतिक सुखवादकी श्रेष्ठ श्रेणीभी नीति- निर्णयके काममें कैसे अपूर्ण सिद्ध हो जाती है; और इसे सिद्ध करनेके लिये हमारी समझमें मिलसाहबकी उक्त स्वीकृति काफ़ी है। “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख” वाले आधिभौतिक पंथमें सबसे भारी दोष यह है, कि उसमें कर्ताकी बुद्धि या भावका कुछभी विचार नहीं किया जाता। मिलसाहबके लेखहीसे यह स्पष्टतया सिद्ध हो जाता है, कि उस (मिल) के युक्ति- वादको सच मानकरभी इस तत्त्वका उपयोग सब स्थानोंपर एकसमान नहीं किया जा सकता। क्यों कि वह केवल बाह्य फलके अनुसार नीतिका निर्णय करता है, अर्थात् उसका उपयोग किसी विशेष मर्यादाके भीतरही किया जा सकता है; या यों कहिये कि वह एकदेशीय है। इसके सिवा इस मतपर एक औरभी आक्षेप किया जा सकता है, कि स्वार्थकी अपेक्षा परार्थ क्यों और कैसे श्रेष्ठ है? – इस प्रश्नकी कुछ भी उपपत्ति न बतलाकर ये लोग इस तत्त्वको सच मान लिया करते हैं। फल यह यह होता है, कि बुद्धिमान स्वार्थकी बेरोक वृद्धि होने लगती है। यदि स्वार्थ और परार्थ ये दोनों बातें मनुष्यके जन्मसेही विद्यमान रहती हैं, अर्थात् स्वाभाविक हैं; तो प्रश्न होता है, कि मैं स्वार्थकी अपेक्षा लोगोंके सुखको अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों समझूं? यह उत्तर तो संतोषदायक होही नहीं सकता, कि तुम अधिकांश लोगोंके अधिक सुखको देखकर ऐसा करो। क्यों कि मूल प्रश्नही यह है, कि मैं अधिकांश लोगोंके अधिक सुखके लिये यत्न क्यों करूं? यह बात सच है, कि अन्य लोगोंके हितमें अपनाभी हित सम्मिलित रहता है, इस लिये यह प्रश्न, हमेशा नहीं उठता। परंतु आधिभौतिक पंथके उक्त तीसरे वर्गकी अपेक्षा इस अंतिम (चौथे) वर्गकी यही विशेषता है, कि इस आधिभौतिक पंथके लोग यह मानते हैं, कि जब स्वार्थ और परार्थमें विरोध खड़ा हो जाय, तब बुद्धिमान स्वार्थका त्याग करके परार्थ-साधन- हीके लिये यत्न करना चाहिये। इस पंथकी उक्त विशेषताकी कुछभी उपपत्ति नहीं दी गई है। इस अभावकी ओर एक विद्वान् आधिभौतिक पंडितका ध्यान आकर्षित हुआ। उसने छोटे कीड़ोंसे लेकर मनुष्यतक सब सजीव प्राणियोंके व्यवहारोंका खूब निरीक्षण किया; और अंतमें यह सिद्धान्त निकाला, कि जब कि छोटे कीड़ोंसे लेकर मनुष्यों तकमें यही गुण अधिकाधिक बढ़ता और प्रकट होता चला आ रहा है, कि वे स्वयं अपनेही समान अपनी संतानों और जातियोंकी रक्षा करते हैं; और किसीको दुःख न देते हुए अपने बंधुओंकी यथासंभव सहायता

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