भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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कर्मोंपर ध्यान दें, तो वे बहुधा भ्रामक होते हैं। "स्नान-संध्या, तिलक-माला" इत्यादि बाह्य कर्मोंके होते हुएभी 'पेटमें क्रोधाग्नि'का भड़कते रहना असंभव नहीं है, परंतु यदि हृदयका भाव शुद्ध हो, तो बाह्यकर्मोंका महत्त्व नहीं रहता।" "सुदामाके मुट्ठीभर चावल" सरीखे अत्यंत अल्पबाह्य कर्मकी धार्मिक और नैतिक योग्यता, अधिकांश लोगोंको अधिक सुख देनेवाले हजारों मन अनाजके बरा- बरही समझी जाती है। इसी लिये प्रसिद्ध जर्मन तत्त्वज्ञानी कांटने * कर्मके बाह्य और दृश्य परिणामोंके तारतम्य-विचारको गौण माना है। एवं नीतिशास्त्रके अपने विवेचनका प्रारंभकर्ताकी शुद्ध बुद्धि (शुद्ध भाव) हीसे किया है। यह नहीं समझना चाहिये, कि आधिभौतिक सुखवादकी यह न्यूनता बड़े बड़े आधिभौतिकवादियोंके ध्यानमें नहीं आई। ह्यूमने † स्पष्ट लिखा है - जब कि मनुष्यका कर्म (काम या कार्य) ही उसके शीलका द्योतक है, और जब लोगोंमें वही नीतिमत्ताका दर्शक भी माना जाता है, तब केवल बाह्य परिणामोंहीसे उस कर्मको प्रशंसनीय या गर्हणीय मान लेना असंभव है। यह बात मिल साहबको भी मान्य है, कि "किसी कर्मकी नीतिमत्ता कर्ताके हेतुपर अर्थात् वह उसे जिस बुद्धि या भावसे करता है, उसपर पूर्णतया अवलंबित रहती है!" परंतु अपने पक्षमंडनके लिये मिलसाहबने यह युक्तिवाद किया है, कि "जबतक बाह्य कर्मोंमें कोई भेद नहीं होता तबतक कर्मकी नीतिमत्तामें कुछ फ़र्क नहीं हो सकता, चाहे कर्ताके मनमें उस कामको करनेकी वासना किसी भावसे हुई हो।" § मिलके इस युक्तिवादमें सांप्रदायिक आग्रह दीख पड़ता है; क्योंकि बुद्धि या भावमें भिन्नता होनेपर यद्यपि दो कर्म दीखनेमें एकहीसे हों, तोभी वे तत्त्वतः एक योग्यताके कभी नहीं हो सकते। और इसी लिये मिलसाहबकी कही हुई 'जब तक (बाह्य) कर्मोंमें भेद नहीं होता, इत्यादि' मर्यादाको ग्रीनसाहब ‡ निर्मूल बतलाते हैं। गीताकाभी यही अभिप्राय है। इसका

  • Kant's Theory of Ethics, (trans. by Abbott) 6th Ed. p. 6. † "For as actions are objects of our moral sentiment, so far only as they are indications of the internal character, passions and affections, it is impossible that they can give rise either to praise or blame, where they proceed not from these principles, but are derived altogether from external objects." Hume's Inquiry concerning Human Understanding, Section VIII, part II (p. 368 of Hume's Eassys - The World Library Edition). § "Morality of the action depends entirely upon the intention, that is, upon what the agent wills to do, But the motive, that is, the feeling which makes him will so to do, when makes no difference in the act, makes none in the morality." Mill's Utilitarianism, p. 27. ‡ Green's Prolegomena to Ethics § 292 note p. 348. 5th Chea- per Edition.