श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चलने का नहीं। क्योंकि यद्यपि "घूस देनेसे ट्रामवे बन गई" यह बाहरी परिणाम अधिक सुखदायक था; तथापि इतनेहीसे घूस देना न्या य हो नहीं सकता।* दान करनेको अपना धर्म (दातव्य) समझ कर निष्काम-बुद्धिसे दान करना, और कीर्तिके लिये या अन्य फलकी आशासे दान करना, इन दो कृत्योंका बाहरी परिणाम यद्यपि एक-सा हो, तथापि श्रीमद्भगवद्गीतामें पहले दानको सात्त्विक और दूसरेको राजस कहा है (गीता १७. २०, २१)। और यहभी कहा गया है, कि यदि वही दान कुपात्रोंको दिया जाय, तो वह तामस अथवा गर्ह्य है। यदि किसी गरीबने एक- आध धर्म-कार्यके लिये चार पैसे दिये और किसी अमीरने उसीके लिये सौ रुपये दिये, तो लोगोंमें दोनोंकी नैतिक योग्यता एकही समझी जाती है। परंतु यदि केवल "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" किसमें है, इसी बाहरी साधनद्वारा विचार किया जाय तो ये दोनों दान नैतिक दृष्टिसे समान योग्यताके नहीं कहे जा सकते। "अधि- कांश लोगोंका अधिक सुख" इस आधिभौतिक नीति-तत्त्वमें जो बहुत बड़ा दोष है, वह यही है, कि इसमें कर्ताके मनके हेतु या भावका कुछभी विचार नहीं किया जाता। और यदि अंतःस्थ हेतुपर ध्यान दें, तो इस प्रतिज्ञासे विरोध खड़ा हो जाता है, कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुखही नीतिमत्ताकी एकमात्र कसौटी है। कायदा- कानून बनानेवाली सभा अनेक व्यक्तियोंके समूहसे बनी होती है। इसलिये उक्त मतके अनुसार इस सभाके बनाये हुए कायदों या नियमोंकी योग्यता-अयोग्यता पर विचार करते समय यह जाननेकी कुछ आवश्यकताही नहीं, कि सभासदोंके अंतः- करणोंमें कैसा भाव था - हम लोगोंको अपना निर्णय केवल इस बाहरी विचारके आधारपर कर लेना चाहिये, कि इनके कायदोंसे अधिकोंको अधिक सुख हो सकेगा या नहीं। परंतु, उक्त उदाहरणसे यह साफ़ साफ़ ध्यानमें आ सकता है, कि सभी स्थानोंमें यह न्याय उपयुक्त हो नहीं सकता। हमारा यह कहना नहीं है, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख या हित" वाला तत्त्व बिलकुलही निरुपयोगी है। केवल बाह्य परिणामोंका विचार करना होता तो उससे बढ़कर दूसरा तत्त्व कहीं नहीं मिलेगा। परंतु हमारा यह कथन है, कि जब नीतिकी दृष्टिसे किसी बातको न्याय्य अथवा अन्याय्य कहना हो, तब केवल बाह्य परिणामोंको देखनेसे काम नहीं चल सकता। उसके लिये औरभी कई बातोंपर विचार करना पड़ता है। अतएव नीतिमत्ताका निर्णय करनेके लिये पूर्णतया इसी तत्त्वपर अवलंबित नहीं रह सकते। इसलिये इससेभी अधिक निश्चित और निर्दोष तत्त्वको खोज निकालना आवश्यक है। गीताके प्रारंभमें जो यह कहा गया है, कि "कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है।" (गीता २. ४९) उसकाभी यही अभिप्राय है। यदि केवल बाह्य
- यह उदाहरण डॉक्टर पॉल केरसकी The Ethical Problem (pp. 58, 59, 2nd Ed.) नामक पुस्तकसे लिया है।