श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआधिभौतिक सुखवाद ८७ हमारा तत्त्व शुद्ध और सच्चा है; मूर्ख लोगोंने उसका दुरुपयोग किया तो हम क्या कर सकते हैं?" कारण यह है, कि यद्यपि तत्त्व शुद्ध और सच्चा हो, तथापि उसका उपयोग करनेके अधिकारी कौन हैं, वे उसका उपयोग कब और कैसे करते हैं, इत्यादि बातोंकी मर्यादाभी, उसी तत्त्वके साथ देनी चाहिये। नहीं तो संभव है, कि हम अपनेको साक्रेटीजके सदृश्य नीति-निर्णय करनेमें समर्थ मानकर अर्थका अनर्थ कर बैठें। केवल संख्याकी दृष्टिसे नीतिका उचित निर्णय नहीं हो सकता; और इस तर्कका निश्चय करनेके लिये कोईभी बाहरी साधन नहीं कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है। इन दो आक्षेपोंके सिवा इस पंथपर औरभी बड़े बड़े आक्षेप किये जा सकते हैं। जैसे, विचार करनेपर यह अपने आप ही मालूम हो जायगा, कि किसी कामके केवल बाहरी परिणामसेही उसके न्याय्य अथवा अन्याय्य होनेका निर्णय करना बहुधा असंभव हो जाता है। हम लोग किसी घड़ीको, उसके ठीक ठीक समय बतलाने न बतलाने पर, अच्छी या खराब कहा करते हैं। परंतु इसी नीतिका उपयोग मनुष्यके कार्योंके संबंधमें करनेके पहले हमें यह बात अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिये, कि मनुष्य केवल घड़ी या यंत्र नहीं है। यह बात सच है, कि सब सत्पुरुष जगत्के कल्याणार्थ प्रयत्न किया करते हैं। परंतु इससे यह उलटा अनुमान निश्चयपूर्वक नहीं किया जा सकता, कि जोभी कोई लोगोंके कल्याणार्थ प्रयत्न करता है, उसे सत्पुरुषही होना चाहिये। इसलिये यह देखना चाहिये, कि मनुष्यका अंतः- करण कैसा है। यंत्र और मनुष्यमें यदि कुछ भेद है तो यही, कि एक हृदयहीन है, और दूसरा हृदययुक्त है; और इसीलिये अज्ञानसे या भूलसे किये गये अपराधको कायदेमें क्षम्य मानते हैं। तात्पर्य, कोई काम अच्छा है या बुरा, धर्म्य है या अधर्म्य, नीतिका है अथवा अनीति का, इत्यादि बातोंका सच्चा निर्णय उस कामके केवल बाहरी फल या परिणाम - अर्थात् वह अधिकांश लोगोंको अधिक सुख देगा कि नहीं इतनेही - से नहीं किया जा सकता। उसीके साथ साथ यहभी जानना चाहिये, कि उस कामको करनेवालेकी बुद्धि, वासना या हेतु कैसा है। एक समयकी बात है, कि अमरीकाके एक बड़े शहरमें सब लोगोंके सुख और उपयोगके लिये ट्रामवेकी बहुत आवश्यकता थी। परंतु सरकारी अधिकारियोंकी आज्ञा पाये बिना ट्रामवे नहीं बनाई जा सकती थी। सरकारी मंजूरी मिलनेमें बहुत देरी हुई। तब ट्रामवेके व्यवस्थापकने अधिकारियोंको रिश्वत देकर जल्द मंजूरी ले ली। ट्रामवे बन गई और उससे शहरके सब लोगोंकी सुभीता और फ़ायदा हुआ। कुछ दिनोंके बाद रिश्वतकी बात प्रकट हो गई; और उस व्यवस्थापकपर फ़ौजदारी मुकदमा चलाया गया। पहली ज्यूरी (पंचायत) का एकमत नहीं हुआ; इसलिये दूसरी ज्यूरी चुनी गई। दूसरी जूरीने व्यवस्थापकको दोषी ठहराया। अतएव उसे सज़ा दी गई। इस उदाहरणमें "अधिक लोगोंके अधिक सुख" वाले नीतितत्त्वसे काम