भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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लोगोंका अधिक सुख होना संभव है तो भीष्म पितामहकोभी मारकर युद्ध करना तेरा कर्तव्य है। दीखनेमें तो यह उपदेश बहुत सीधा और सहज दीख पडता है; परंतु कुछ विचार करनेपर इसकी अपूर्णता और कठिनाई समझमें आ जाती है। पहले यही सोचिये, कि अधिक यानी कितना? पांडवोंकी सात अक्षौहिणियाँ थीं और कौरवोंकी ग्यारह। इसलिये यदि पांडवोंकी हार हुई होती तो कौरवोंको सुख हुआ होता। क्या, इसी युक्तिवादसे पांडवोंका पक्ष अन्याय्य कहा जाता? भारतीय युद्धहीकी बात कौन कहे; औरभी अनेक अवसर ऐसे हैं कि जहाँ नीतिका निर्णय केवल संख्यासे कर बैठना बडी भारी भूल हैं। व्यवहारमें सब लोग यही समझते हैं कि लाखों दुर्जनोंको सुख होनेकी अपेक्षा एकही सज्जनको जिससे सुख हो, वही सच्चा सत्कार्य है। इस समझको सच बतलानेके लिये एकही सज्जनके सुखको लाख दुर्जनोंके सुखकी अपेक्षा अधिक मूल्यवान् मानना पडेगा; और ऐसा करनेपर "अधिकांश लोगोंका अधिक बाह्य" मुखवाला (जो कि नीतिमत्ताकी परीक्षाका एकमात्र साधन माना गया है) सिद्धान्त उतनाही शिथिल हो जायगा। इसलिये कहना पड़ता है कि, लोकसंख्याकी न्यूनाधिकताका नीतिमत्ताके साथ कोई नित्य-संबंध नहीं हो सकता। यह बातभी ध्यानमें रखनेयोग्य है, कि कभी जो बात साधारण लोगोंको सुखदायक मालूम होती है, वही बात किसी दूरदर्शी पुरुषको परिणाममें सबके लिये हानिप्रद दीख पड़ती है। उदाहरणार्थ, साक्रेटीज और ईसामसीहकोही लीजिये। दोनों अपने अपने मतसे परिणाममें कल्याणकारक समझ करही अपने देशबंधुओंको उपदेश करते थे; परंतु इनके देशबंधुओंने इन्हें “समाजके शत्रु” समझकर मौतकी सजा दी। इस विषयमें "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" इसी तत्त्वके अनुसार उस समय लोगोंने और उनके नेताओने मिल कर आचरण किया था; परंतु अब हम नहीं कह सकते कि उन लोगोंका बर्ताव न्याययुक्त था। सारांश, यदि “अधिकांश लोगोंके अधिक सुख” को ही क्षणभरके लिये नीतिका मूलतत्त्व मान लें, तोभी उससे ये प्रश्न हल नहीं हो सकते, कि लाखों-करोडों मनुष्योंका सुख किसमें है; उसका निर्णय कौन और कैसे करे? साधारण अवसरोंपर निर्णय करनेका यह काम उन्हीं लोगोंको सौंप दिया जा सकता है, कि जिनके बारेमें सुख-दुःखका प्रश्न उपस्थित हो। परंतु साधारण अवसरपर इतना प्रयत्न करनेकी कोई आवश्यकताही नहीं रहती। और जब विशेष कठिनाईका कोई समय आता है, तब साधारण मनुष्योंमें यह अचूक विचार-शक्ति नहीं रहती, कि हमारा सुख किस बातमें है। ऐसी अवस्थामें यदि इन साधारण और अनधिकारी लोगोंके हाथ यह नीतिका एकमेव तत्त्व “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख” लग जाय, तो वही भयानक परिणाम होगा; जो सैतानके हाथमें मशाल देनेसे होता है। यह बात उक्त दोनों उदाहरणों (साक्रेटीज और ईसामसीह) से भली भाँति प्रकट हो जाती है। इस उत्तरमें कुछ जान नहीं, कि “नीतिधर्मका