श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआधिभौतिक सुखवाद ८५
है, तो वही दूसरेको दुःखदायक हो जाती है। परंतु जैसे घुग्घूको प्रकाश नापसंद होनेके कारण कोई प्रकाशहीको त्याज्य नहीं कहता, उसी तरह यदि किसी विशिष्ट संप्रदायको कोई बात लाभदायक मालूम न हो तो कर्मयोगशास्त्रमेभी यह नहीं कहा जा सकता, कि वह सभी लोगोंको हितावह नहीं है। और, इसी लिये “सब लोगोंका सुख” इन शब्दोंका अर्थभी “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख” करना पड़ता है। इस पंथके मतका सारांश यह है, कि “जिसमें, अधिकांश लोगोंका अधिक सुख हो, उसी बातको नीतिकी दृष्टिसे उचित और ग्राह्य मानना चाहिये, और उसी प्रकारका आचरण करना इस संसारमें मनुष्यका सच्चा कर्तव्य है।” आधिभौतिक सुखवादियोंका उक्त तत्त्व आध्यात्मिक पंथको मंजूर है। यदि यह कहा जाय तोभी कोई आपत्ति नहीं कि आध्यात्मिकवादियोंनेही इस तत्त्वको अत्यंत प्राचीन कालमें ढूंढ निकाला था। और भेद इतनाही है, कि अब आधिभौतिकवा- दियोंने उसका एक विशिष्ट रीतिसे उपयोग किया है। तुकाराममहाराजने कहा है, कि “संतजनोंकी विभूतियाँ केवल जगतके कल्याणके लिये हैं - वे लोग परोपकार करनेमें अपने शरीरको कष्ट दिया करते हैं।” अर्थात् इस तत्त्वकी सच्चाई और योग्यताके विषयमें कुछभी संदेह नहीं है। स्वयं श्रीमद्भगवद्गीतामेंभी, पूर्ण योगयुक्त अर्थात् कर्मयोगयुक्त ज्ञानी पुरुषोंके लक्षणोंका वर्णन करते हुए, यह बात दो बार स्पष्ट कही गई है, कि वे लोग ‘सर्वभूतहिते रताः’ अर्थात् सब प्राणियोंका कल्याण करनेहीमें निमग्न रहा करते हैं (गी. ५. २५; १२. ४)। इस बातका पता दूसरे प्रकरणमें दिये हुए महाभारतके “यद्भूतहितमत्यंतं तत् सत्यमिति धारणा” वचनसे स्पष्टतया चलता है, कि धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये हमारे शास्त्रकार इस तत्त्वको हमेशा ध्यानमें रखते थे। परंतु हमारे शास्त्रकारोंके कथनानुसार ‘सर्वभूतहित’ को ज्ञानी पुरुषोंके आचरणका बाह्य लक्षण समझ कर धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके किसी विशेष प्रसंगपर स्थूलमानसे उस तत्त्वका उपयोग करना एक बात है, और उसीको नीतिमत्ताका सर्वस्व मान कर - दूसरी किसी बातका विचार न करके - केवल इसी नींव पर नीतिशास्त्रका भव्य भवन निर्माण करना दूसरी बात है। इन दोनोंमें बहुत भिन्नता है। आधिभौतिक पंडित दूसरे मार्गको स्वीकार करके प्रतिपादन करते हैं, कि नीतिशास्त्रका अध्यात्मविद्यामें कुछभी संबंध नहीं है। इसलिये अब यह देखना चाहिये, कि उनका कहना कहाँ तक युक्तिसंगत है। 'सुख' और 'हित' दोनों शब्दोंके अर्थमें बहुत भेद है। परंतु यदि इस भेदपर ध्यान न दें; और 'सर्वभूतहितका अर्थ 'अधिकांश लोगोंका अधिक सुख' मान लें, और कार्य-अकार्य-निर्णयके काममें केवल इसी तत्त्वका उपयोग करें; तो यह साफ़ दीख पड़ेगा कि बड़ी बड़ी अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। मान लीजिये, कि इस तत्त्वका कोई आधिभौतिक पंडित अर्जुनको उपदेश देने लगता, तो वह अर्जुनसे क्या कहता? यही न; कि यदि युद्धमें जय मिलनेपर अधिकांश