भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इस पंथके लोगोंका यह कहना है, कि "यद्यपि तात्त्विक दृष्टिसे परार्थ श्रेष्ठ है, तथापि परम सीमाकी शुद्ध नीतिकी ओर न देखकर हमें सिर्फ यही निश्चित करना है, कि साधारण व्यवहारमें 'सामान्य' मनुष्योंको कैसे चलना चाहिये । और इसलिये हम 'बुद्धिमान स्वार्थ' को जो अग्रस्थान देते हैं, वही व्यावहारिक दृष्टिसे उचित है !"* परंतु हमारी समझके अनुसार इस युक्तिवादसे कुछ लाभ नहीं है। बाज़ारमें जितने माप-तौल नित्य उपयोगमें लाये जाते हैं, उनमें थोड़ाबहुत फ़र्क रहताही है; बस, यही कारण बतला कर यदि प्रमाणभूत सरकारी माप-तौलमेंभी कुछ न्यूनाधिकता रखी जाय तो क्या उनके खोटे-पनके लिये हम अधिकारियोंको दोष नहीं देंगे ? इसी न्यायका उपयोग कर्मयोगशास्त्रमेंभी किया जा सकता है। नीति- धर्मके पूर्ण, शुद्ध और नित्य स्वरूपका शास्त्रीय निर्णय करनेके लिये ही नीतिशास्त्रकी प्रवृत्ति हुई है; और इस कामको यदि नीतिशास्त्र नहीं करेगा, तो हमें उसको निष्फल कहना पड़ेगा । सिज्विकका यह कथन सत्य है, कि 'बुद्धिमान् स्वार्थ' सामान्य मनुष्योंका मार्ग है। भर्तृहरिका मतभी ऐसाही है ! परंतु यदि इस बातकी खोज की जाय, कि पराकाष्ठाकी नीतिमत्ताके विषयमें उक्त सामान्य लोगोंका क्या मत है; तो यह मालूम होगा कि, सिज्विकने बुद्धिमान स्वार्थको जो महत्त्व दिया है, वह ग़लत है। क्योंकि साधारण लोगभी यही कहते हैं, कि निष्कलंक नीतिके तथा सत्पुरुषोंके आचरणके लिये यह कामचलाऊ मार्ग श्रेयस्कर नहीं है। इसी बातका वर्णन भर्तृहरिने उक्त श्लोकमें किया है। आधिभौतिक सुखवादियोंके निम्नलिखित तीन वर्गोंका अबतक वर्णन किया गया :- (१) केवल स्वार्थी; (२) दूरदर्शी स्वार्थी; और (३) उभयवादी अर्थात् बुद्धिमान स्वार्थी । इन तीन वर्गोंके मुख्य दोषभी बतला दिये गये हैं; परंतु इतनेहीसे सब आधिभौतिक पंथ पूरे नहीं हो जाते । उसके आगे का - और सब आधिभौतिक पंथों में श्रेष्ठ पंथ वह है - जिसमें कुछ सात्त्विक तथा आधिभौतिक पंडितोंने† यह प्रतिपादन किया है, कि "एकही मनुष्यके सुखको न देखकर - सब मनुष्यजातिके आधिभौतिक सुख-दुःखके तारतम्यको देखकरही - नैतिक कार्य-अकार्यका निर्णय करना चाहिये ।" एकही कृत्यसे, एकही समयमें, समाजके या संसारके सब लोगोंको सुख होना असंभव है। कोई एक बात किसीको सुखकारक मालूम होती

  • Sidgwick's Methods of Ethics, Book I, Chap. II § 2. pp. 18-29; also, Book IV, Chap. IV § 3 p. 474. यह तीसरा पंथ कुछ सिज्विकका निकाला हुआ नहीं है; सामान्य सुशिक्षित अंग्रेज़ी लोक प्रायः इसी पंथके अनुयायी हैं। इसे Common-sense morality कहते हैं । † बेंथेम, मिल आदि पंडित इस पंथके अगुआ हैं। Greatest good of the greatest number का हमने "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" यह भाषांतर किया है।