श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआधिभौतिक सुखवाद ८३ कि लोक-सुखके लिये अपने कितने सुखका त्याग करना चाहिये । उदाहरणार्थ, यदि स्वार्थ और परार्थको एक समान प्रबल मान लें, तो सत्यके लिये प्राण देने और राज्य खो देनेकी बात तो दूरही रही; परंतु इस पंथके मतसे यहभी निर्णय नहीं हो सकता, कि बहुतसी द्रव्यकी बहुतसी हानिभी सहनी चाहिये या नहीं। यदि कोई उदार मनुष्य परार्थके लिये प्राण दे दें, तो इस पंथवाले कदाचित् उसकी स्तुति कर देंगे; परंतु जब उनपर आबीतेगी तब स्वार्थ-परार्थ दोनोंहीका आश्रय करनेवाले ये लोग स्वार्थकी ओरही अधिक झुकेंगे। ये लोग, हॉब्सके समान परार्थको एक प्रकारका दूरदर्शी स्वार्थ नहीं मानते, किंतु ये समझते हैं, कि हम स्वार्थ और परार्थको तराजूमें तोल कर उनके तारतम्य अर्थात् उनकी न्यूनाधिकताका विचार करके बड़ी चतुराईसे अपने स्वार्थका निर्णय किया करते हैं। अतएव ये लोग अपने मार्गको 'उदात्त' या बुद्धिमान स्वार्थ (परंतु है तो स्वार्थही) कहकर उसकी बड़ाई मारते हैं;* परंतु देखिये, भर्तृहरिने क्या कहा है :- एके सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थान् परित्यज्य ये। सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाऽविरोधेन ये ।। तेऽमी मानवराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये । ये तु घ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे ।। “जो अपने लाभको त्याग कर दूसरोंका हित करते हैं, वेही सच्चे सत्पुरुष हैं। स्वार्थको न छोड़ कर जो लोग लोकहितके लिये प्रयत्न करते हैं, वे पुरुष सामान्य हैं और अपने लाभके लिये जो दूसरोंका नुकसान करते हैं वे केवल नीच मनुष्यही नहीं हैं, उनको मनुष्याकृति राक्षस समझना चाहिये। परंतु एक प्रकारके मनुष्य औरभी हैं, जो लोकहितका निरर्थक नाश किया करते हैं - मालूम नहीं पड़ता कि ऐसे मनुष्योंको क्या नाम दिया जाय” (भर्तृ. नी. श. ७४) इसी तरह राजधर्मकी उत्तम स्थितिका वर्णन करते समय कालिदासनेभी कहा है - स्वसुखनिरभिलाषः खिद्यसे लोकहेतोः । प्रतिदिनमथवा ते वृत्तिरेवंविधैव ।। अर्थात् “तू अपने सुखकी परवाह न करके लोकहितके लिये प्रतिदिन कष्ट उठाया करता है! अथवा तेरी वृत्ति (पेशा) ही यही है” (शाकुं. ५. ७) भर्तृहरि या कालिदास यह जानना नहीं चाहते थे, कि कर्मयोगशास्त्रमें स्वार्थ और परार्थको स्वीकार करके उन दोनों तत्त्वोंके तारतम्य-भावसे धर्म-अधर्म या कर्म-अकर्मका निर्णय कैसे करना चाहिये; तथापि परार्थके लिये स्वार्थ छोड़ देनेवाले पुरुषोंको उन्होंने जो प्रथम स्थान दिया है; वही नीतिकी दृष्टिसेभी न्याय्य है। इसपर
- अंग्रेजीमें इसे enlightened self-interest कहते हैं। enlightened क भाषांतर 'उदात्त' या बुद्धिमान शब्दोंसे किया है।