श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
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८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र एक स्वरूप मानकर कहता है, कि इस संसारमें स्वार्थके सिवा और कुछ नहीं। याज्ञवल्क्य 'स्वार्थ' शब्दके 'स्व' (अपना) पदके आधारपर दिखलाते हैं, कि अध्यात्मदृष्टिसे अपने एकही आत्मामें सब भूतोंका और सब भूतोंमें अपने आत्माका, अविरोध भावसे समावेश कैसे होता है। यह दिखला कर उन्होंने स्वार्थ और परार्थमें दिखनेवाले द्वैतके झगड़ेकी जड़हीको काट डाला है। याज्ञवल्क्यके उक्त मत और संन्यासमार्गीय मतपर अधिक विचार आगे किया जायगा। यहाँपर याज्ञवल्क्य आदियोंके मतोंका उल्लेख यही दिखलानेके लिये किया गया है, कि "सामान्य मनुष्योंकी प्रवृत्ति स्वार्थ-विषयक अर्थात् आत्मसुखविषयक होती है"
- इस एकही बातको थोड़ा-बहुत महत्त्व दे कर, अथवा इसी एक बातको सर्वथा अपवाद-रहित मान कर, हमारे प्राचीन ग्रंथकारोंने उसी बातसे हॉब्सके विरुद्ध दूसरे अनुमान कैसे निकाले हैं। जब यह बात सिद्ध हो चुकी, कि मनुष्यका स्वभाव केवल स्वार्थमूलक अर्थात् तमोगुणी या राक्षसी नहीं है - जैसा कि अंग्रेजी ग्रंथकार हॉब्स और फ्रेंच पंडित हेल्वैशियस कहते हैं- किंतु मनुष्य-स्वभावमें स्वार्थके साथही परोपकारबुद्धिकी सात्त्विक मनोवृत्तिभी जन्मसे स्वतंत्र रूपसे पाई जाती है। अर्थात् जब यह सिद्ध हो चुका कि परोपकार केवल दूरदर्शी स्वार्थ नहीं है, तब स्वार्थ अर्थात् स्वसुख और परार्थ अर्थात् दूसरोंका सुख, इन दोनों तत्त्वोंपर समदृष्टि रखकर कार्य-अकार्य व्यवस्थाशास्त्रकी रचना करनेकी आवश्यकता प्रतीत हुई। यही आधिभौतिक- वादियोंका तीसरा वर्ग है। इस पक्षमेंभी यह आधिभौतिक मत मान्य है, कि स्वार्थ- परार्थ दोनों सांसारिक सुखवाचक हैं। सांसारिक सुखके परे कुछभी नहीं है। भेद केवल इतनाही है, कि इस पंथके लोग स्वार्थबुद्धिके समान परार्थबुद्धिकोभी स्वाभा- विक मानते हैं। इसलिये वे कहते हैं कि नीतिका विचार करते समय स्वार्थके समान परार्थकी ओरभी ध्यान देना चाहिये। सामान्यतः स्वार्थ और परार्थमें विरोध उत्पन्न नहीं होता; इसलिये मनुष्य जो कुछ करता है, वह सब प्रायः समाजकेभी हितका होता है। यदि किसीने धनसंचय किया, तो उससे समस्त समाजकाभी हित होता है; क्योंकि, अनेक व्यक्तियोंके समूहको समाज कहते हैं; और यदि उस समाजका प्रत्येक व्यक्ति दूसरेकी हानि न कर यदि अपना लाभ करने लगे, तो उसमें कुल समाजका हितही होगा। अतएव इस पंथके लोगोंने निश्चित किया है, कि अपने सुखकी ओर दुर्लक्ष न करके यदि कोई मनुष्य लोकहितका कुछ काम कर सके, तो ऐसा करना उसका कर्तव्य है। परंतु इस पक्षके लोग परार्थकी श्रेष्ठताको स्वीकार नहीं करते; किंतु वे यही कहते हैं, कि हर समय अपनी बुद्धिके अनुसार इस बातका विचार करते रहो, कि स्वार्थ श्रेष्ठ है या परार्थ। इसका परिणाम यह होता है कि जब स्वार्थ और परार्थमें विरोध उत्पन्न होता है, तब इस प्रश्नका निर्णय करने समय बहुधा मनुष्य स्वार्थहीकी ओर अधिक झुक जाया करता है,