भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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आधिभौतिक सुखवाद ८१ दिखलानेके लिये तो रोती है सासके हितके लिये; परंतु हृदयका भाव कुछ औरही रहता है। (तु. गा. ३५८३. २)" बहुतसे पंडित तो हेल्वेशिअमसेभी आगे बढ़ गये हैं। उदाहरणार्थ, "मनुष्यकी स्वार्थप्रवृत्ति तथा परार्थप्रवृत्तिभी दोषमय होती है" - "प्रवर्त्तनालक्षणा दोषाः" इस गौतम-न्यायसूत्र (१. १. १८) के आधारपर ब्रह्मसूत्रभाष्यमें श्रीशंकराचार्यने जो कुछ कहा है (वे. सू. शां. भा. २. २. ३), उसपर टीका करते हुए आनंदगिरि लिखते हैं, कि "जब हमारे हृदयमें कारुण्यवृत्ति जागृत होती है, और हमको उससे जो दुःख होता है, उस दुःखको हटानेके लिये हम अन्य लोगोंपर दया या परोपकार किया करते हैं।" आनंदगिरिका यही युक्तिवाद प्रायः हमारे सब संन्यासमार्गीय ग्रंथोंमें पाया जाता है; जिससे यह सिद्ध करनेका प्रयत्न दीख पड़ता है, कि सब कर्म स्वार्थमूलक होनेके कारण त्याज्य हैं। परंतु बृह- दारण्यकोपनिषद् (बृ. २. ४. ४. ५) में याज्ञवल्क्य और उनकी पत्नी मैत्रेयीका जो संवाद दो स्थानोंपर है, उसमें इसी युक्तिवादका उपयोग एक दूसरीही अद्भुत रीतिसे किया गया है। मैत्रेयीने पूछा "हम अमर कैसे बनेंगे?" इस प्रश्नका उत्तर देते समय याज्ञवल्क्य उससे कहते हैं, "हे मैत्रेयी! स्त्री अपने पतिको चाहती है, वह पतिहीके लिये नहीं किंतु वह अपनी आत्माके लिये उसे चाहती है। इसी तरह हम अपने पुत्रसे उसके हितार्थ प्रेम नहीं करते; किंतु हम स्वयं अपनेही लिये उससे प्रेम करते हैं।* द्रव्य, पशु और अन्य वस्तुओंके लियेभी यही न्याय उपयुक्त है। "आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति" - अपने आत्माके प्रीत्यर्थही सब पदार्थ हमें प्रिय लगते हैं। और यदि इस तरह सब प्रेम आत्ममूलक है, तो क्या हमको सबसे पहलें यह जाननेका प्रयत्न नहीं करना चाहिये, कि आत्मा (हम) क्या है?" यह कहकर अंतमें याज्ञवल्क्यने यही उपदेश दिया है, "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यः" - अर्थात् "सबसे पहले यह देखो, कि आत्मा कौन है, फिर उसके विषयमें सुनो और उसका मनन तथा ध्यान करो।" इस उपदेशके अनुसार एक बार आत्माके सच्चे स्वरूपकी पहचान होनेपर सब जगत् आत्ममय दिख पड़ने लगता है; और स्वार्थ तथा परार्थका भेदही मनमें रहने नहीं पाता। याज्ञवल्क्यका यह युक्तिवाद दिखनेमें तो हॉब्सके मतानुसारही है; परंतु यह बातभी किसीसे छिपी नहीं है, कि इन दोनोंके निकाले गये अनुमान एक दूसरेके विरुद्ध हैं। हॉब्स स्वार्थहीको प्रधान मानता है; और सब परार्थोंको दूरदर्शी स्वार्थ का ही

  • "What say you of natural affection? Is that also a species of self-love? Yes; All is self-love. Your children are loved only because they are yours. Your friend for a like reason. And Your country engages you only so far as it has a connection with Yourself" ह्यूमनेभी इसी युक्तिवादका उल्लेख अपने Of the Dignity or Meanness of Human Nature नामक निबंधमें किया है। स्वयं ह्यूमका मत इससे भिन्न है। गी. र. ६