भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

हैं, कि वेभी हमको प्यार करें। और कुछ नहीं तो हमारे मनमें यह स्वार्थमूलक हेतु अवश्य रहता है कि लोग हमें अच्छा कहें। परोपकार और परार्थ दोनों शब्द केवल भ्रांतिमूलक हैं। यदि कुछ सच्चा है तो स्वार्थ; और स्वार्थ कहते हैं अपने लिये सुख-प्राप्ति या अपने दुःख-निवारणको । माता बच्चेको दूध पिलाती है; इसका कारण यह नहीं है, कि वह बच्चेसे प्रेम करती हो; सच्चा कारण तो यही है, कि उसके स्तनोंमें दूध भर जानेसे उसे जो दुःख होता है, उसे कम करनेके लिये - अथवा भविष्यमें यही लड़का मुझे प्यार करके सुख देगा, इस स्वार्थ-सिद्धिके लियेही वह उपाय करती है - इस प्रकार उक्त कथनका अर्थ होता है। इस बातको दूसरे वर्गके आधिभौतिकवादी मानते हैं, कि स्वयं अपनेही सुखके लियेभी क्यों न हो, परंतु भविष्यपर दृष्टि रखकर ऐसे नीतिधर्मका पालन करना चाहिये, कि जिससे दूसरोंको भी सुख हो । बस, यही इस मतमें और चार्वाकके मतमें भेद है। तथापि चार्वाक मतके अनुसार इस मतमेंभी यह माना जाता है, कि मनुष्य केवल विषय-सुखमें, रूप स्वार्थमें ढला हुआ एक पुतला है। इंग्लैंडमें हॉब्स और फ्रान्समें हेल्वेशिअसने इस बातका प्रतिपादन किया है। परंतु इस मतके अनुयायी अब न तो इंग्लैंडमेंही और न कही बाहरभी अधिक मिलेंगे। हॉब्सके नीतिधर्मकी इस उपपत्तिके प्रसिद्ध होनेपर बटलरसरीखे* विद्वानोंने उसका खंडन करके सिद्ध किया, कि मनुष्य-स्वभाव केवल स्वार्थी नहीं है; स्वार्थके समानही उसमें जन्मसेही भूतदया, प्रेम, कृतज्ञता आदि सद्गुणभी कुछ अंशमें रहते हैं। इसलिये किसी व्यवहार या कर्मका नैतिक दृष्टिसे विचार करते समय केवल स्वार्थ या दूरदर्शी स्वार्थकी ओर ही ध्यान न दे कर मनुष्य-स्वभावकी दो स्वाभाविक प्रवृत्तियों ( अर्थात् स्वार्थ और परार्थ ) की ओर नित्य ध्यान देना चाहिये। जब हम देखते हैं कि व्याघ्र सरीखे क्रूर जानवरभी अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये प्राण देनेको तैयार हो जाते हैं, तब हम यह कभी नही कह सकते कि मनुष्यके हृदयमें प्रेम और परोपकारबुद्धि जैसे सद्गुण केवल स्वार्थहीसे उत्पन्न हुए हैं। इससे सिद्ध होता है, कि धर्म-अधर्मकी परीक्षा केवल दूरदर्शी स्वार्थसे करना शास्त्रकी दृष्टिसेभी उचित नहीं है। यह बात हमारे प्राचीन पंडितोंकोभी अच्छी तरहसे मालूम थी, कि केवल संसारमें लिप्त रहनेके कारण जिस मनुष्यकी बुद्धि शुद्ध नहीं रहती है, वह मनुष्य जो कुछ परोपकारके नामसे करता है, बहुधा अपनेही हितके लिये करता है। महाराष्ट्रमें तुकाराम महाराज एक बड़े भारी भगवद्भक्त हो गये हैं। वे कहते हैं, कि " बह


  • हॉब्सका मत उसके Leviathan नामक ग्रंथमें संग्रहीत है, तथा बटलरका मत उसके Sermon on Human Nature नामक निबंधमें है। हेल्वेशिअसकी पुस्तकका सारांश मोर्लेने अपने Diderot विषयक ग्रंथ (Vol. II, Chap. V) में दिया है।