श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 126, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंआधिभौतिक सुखवाद [७९]
मतका केवल उल्लेख करनाही उसका खंडन करना कहा जा सकता है। दूसरोंके हित-अनहितकी कुछभी परवाह न करके सिर्फ अपने खुदके विषयोपभोग-सुखको परम-पुरुषार्थ मान कर नीतिमत्ता और धर्मको ठुकरा देनेवाले आधिभौतिक वादियोंकी यह अत्यंत कनिष्ठ श्रेणी कर्मयोगशास्त्रके सब ग्रंथकारोंके द्वारा, और सामान्य लोगोंके द्वाराभी बहुतही अनीति की, त्याज्य और गर्ह्य मानी गई है। अधिक क्या कहा जाय, यह पंथ नीतिशास्त्र अथवा नीतिविवेचनके नामकोभी पात्र नहीं है। इसलिये इसके बारेमें अधिक विचार न करके आधिभौतिक सुखवादियोंके दूसरे वर्गकी ओर ध्यान देना चाहिये। खुल्लमखुल्ला या प्रकट स्वार्थ संसारमें चल नहीं सकता। क्योंकि यह प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है, कि यद्यपि आधिभौतिक विषयसुख प्रत्येकको इष्ट होता है; तथापि जब हमारा सुख अन्य लोगोंके सुखोपभोगमें बाधा डालता है, तब वे लोग बिना विघ्न उपस्थित किये नहीं रहते। इसलिये दूसरे कई आधिभौतिक पंडित प्रतिपादन किया करते हैं, कि यद्यपि स्वयं अपना सुख या स्वार्थ-साधनही हमेशा उद्देश्य है, तथापि सब लोगोंको अपनेही समान रियायत दिये बिना सुखका मिलना संभव नहीं है। इसलिये अपने सुखके लियेही दूरदर्शिताके साथ अन्य लोगोंके सुखकी ओरभी ध्यान देना चाहिये। इन आधिभौतिकवादियोंकी गणना हम दूसरे वर्गमें करते हैं। बल्कि यह कहना चाहिये, कि नीतिकी आधिभौतिक उपपत्तिका यथार्थ आरंभ यहींसे होता है। क्योंकि इस वर्गके लोग चार्वाकके मतानुसार यह नहीं कहते, कि समाज-सुधारके लिये नीतिके बंधनोंकी कुछ आवश्यकताही नहीं है। किंतु इन लोगोंने अपनी विचारदृष्टिसे इस बातका कारण बतलाया है, कि सभी लोगोंको उनका पालन क्यों करना चाहिये। इनका कहना यह है, कि यदि इस बातका सूक्ष्म विचार किया जाय, कि संसारमें अहिंसा-धर्म कैसे चला और लोग उसका पालन क्यों करते हैं, तो यही मालूम होगा, कि ऐसे स्वार्थमूलक भयके सिवा उसका दूसरा कोई कारण नहीं है, जो इस वाक्यसे प्रकट होता है - "यदि मैं लोगोंको मारूँगा तो वे मुझेभी मार लेंगे; और फिर मुझे अपने सुखोंसे हाथ धोना पड़ेगा।" अहिंसा-धर्मके अनुसारही अन्य सब धर्मभी इसी या ऐसेही स्वार्थ- मूलक कारणोंसे प्रचलित हुए हैं। हमें दुःख हुआ, तो हम रोते हैं; और दूसरोंको हुआ, तो हमें दया आती है। क्यों ? इसी लिये न, कि हमारे मनमें यह डर पैदा होता है, कि कहीं भविष्यमें हमारीभी ऐसीही दुःखमय अवस्था न हो जाय। परोपकार, उदारता, दया, ममता, कृतज्ञता, नम्रता, मित्रता इत्यादि जो गुण लोगोंके सुखके लिये आवश्यक मालूम देते हैं, वे सब - यदि उनका मूलस्वरूप देखा जाय तो - अपनेही सुखके लिये या अपनेही दुःखनिवारणार्थ हैं। कोई किसीकी सहायता करता है, या कोई किसीको दान देता है। क्यों ? इसीलिये न कि जब हमपरभी आ बीतेगी, तब वे हमारी सहायता करेंगे। हम अन्य लोगोंको इसलिये प्यार करते