भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उसके साथ साथ वहभी चल जाता है। इसलिये विद्वानोका कर्तव्य है, कि आत्म- विचारके झंझटमें न पड़कर जबतक यह शरीर जीवित अवस्थामें है, तबतक “ऋण ले कर भी त्योहार मनावें” - ? “ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्” – क्योंकि मरने पर कुछ नहीं है। चार्वाक हिंदुस्थानमें पैदा हुआ था, इसलिये उसने घृतहीमे अपनी तृष्णा बुझा ली। नहीं तो उक्त सूत्रका रूपांतर “ऋणं कृत्वा सुरां पिबेत्” हो गया होता। कहाँका धर्म और कहाँका परोपकार ! इस संसारमें जितने पदार्थ परमेश्वरने, – शिव, शिव ! भूल हो गई । परमेश्वर आया कहाँसे ? – इस संसारमें जितने पदार्थ हैं, वे सब मेरेही उपभोगके लिये हैं। उनका दूसरा कोईभी उपयोग नहीं दिखाई पड़ता – अर्थात् है ही नहीं ! मैं मरा कि दुनिया डूबी ! इसलिये जबतक मैं जीता हूँ, तब आज यह तो कल वह; इस प्रकार सब कुछ अपने अधीन करके अपनी सारी काम-वासनाओंको तृप्त कर लूंगा । यदि में तप करूंगा, अथवा कुछ ज्ञान दूंगा तो वह सब मैं अपने महत्त्वको बढ़ानेहीके लिये करूँगा; और यदि मैं राजसूय या अश्वमेध यज्ञ करूँगा, तो उसे मैं यही प्रकट करनेके लिये करूँगा, कि मेरी सत्ता या अधिकार सर्वत्र अबाधित है। सारांश, इस जगतका मैंही केंद्र हूँ; और केवल यही सब नीतिशास्त्रोंका रहस्य है। बाकी सब झूठ है। ऐसेही आसुरी मताभिमानियोंका वर्णन गीताके सोलहवें अध्यायमें किया गया है—“ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी” (गीता १६. १४) – “मैंही ईश्वर, मैंही भोगनेवाला; और मैंही सिद्ध बलवान् और सुखी हूं।” यदि श्रीकृष्णके बदले जाबालिके समान इस पथवाला कोई आदमी अर्जुनको उपदेश करनेके लिये होता, तो वह पहले अर्जुनके कान मलकर यह बतलाता, कि “अरे तू मूर्ख तो नहीं है ? लड़ाईमें सबको जीत कर अनेक प्रकारके राजभोग और विलासोंके भोगनेका यह बढ़िया मौका पाकरभी तू “यह करूं कि वह करूं ?” इत्यादि व्यर्थ भ्रममें कुछका कुछ बक रहा है। यह मौका फिरसे मिलनेका नहीं। कहाँका आत्मा और कहाँके कुटुंबियोंको लिये बैठा है। उठ, तैयार हो; सब लोगोंको ठोक-पीटकर सीधा कर दे; और हस्तिनापुरके साम्राज्यका सुखसे निष्कंटक उपभोग कर ! इसीमें तेरा परम कल्याण है। स्वयं अपने दृश्य तथा ऐहिक सुखके सिवा इस संसारमे और रखाही क्या है ?” परंतु अर्जुनने इस घृणित, स्वार्थ-साधक और आसुरी उपदेशकी प्रतीक्षा नहीं की – उसने पहलेही श्रीकृष्णसे कह दिया कि :- एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥ “पृथ्वीहीका क्या, परंतु यदि तीनों लोकोंका राज्य (इतना बड़ा विषय-सुख) भी (इस युद्धके द्वारा) मुझे मिल जाय, तोभी मैं कौरवोंको मारना नही चाहता। भलेही वे मेरी गर्दन उडा दें !” (गीता १. ३५) । अर्जुनने पहलेहीसे जिस स्वार्थ- परायण और आधिभौतिक सुखवाद-पंथका इस तरह निषेध किया है, उसके आसुरी