श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआधिभौतिक सुखवाद ७७ दृष्टिसे विचार करनेवाले पंडितोंसेही चलाया गया है। इसका विस्तृत वर्णन इस ग्रंथमें करना असंभव है - भिन्न भिन्न ग्रंथकारोंके मतोंका सिर्फ सारांश देनेके लियेही स्वतंत्र ग्रंथ लिखना पड़ेगा, इसलिये श्रीमद्भगवद्गीताके कर्मयोगशास्त्रका स्वरूप और महत्त्व पूरी तौरसे ध्यानमें आ जानेके लिये नीतिशास्त्रके इस आधि- भौतिक पंथका जितना स्पष्टीकरण अत्यावश्यक है, उतनाही संक्षिप्त रीतिसे इस प्रकरणमें एकत्रित किया गया है। इससे अधिक बातें जाननेके लिये पाठकोंको पश्चिमी विद्वानोंके मूल ग्रंथही पढ़ने चाहिये। ऊपर कहा गया है, कि परलोक या आत्मविद्याके विषयमें आधिभौतिकवादी उदासीन रहा करते हैं; परंतु इसका यह मतलब नहीं है, कि इस पंथके सब विद्वान् लोग स्वार्थसाधक, अपस्वार्थी अथवा अनीतिमान् हुआ करते हैं। यदि इन लोगोंमें पारलौकिक दृष्टि नहीं है तो न सही। ये मनुष्यके कर्तव्यके विषयमें यही कहते हैं, कि प्रत्येक मनुष्यको अपनी ऐहिक दृष्टीको - जितनी बन सके उतनी - व्यापक बना कर समूचे जगत्के कल्याणके लिये प्रयत्न करना चाहिये। इस तरह अंतःकरणसे और उत्साहके साथ उपदेश करनेवाले कांट, मिल, स्पेन्सर आदि सात्त्विक वृत्तिके अनेक पंडित इस पंथमें हैं; और उनके ग्रंथ अनेक प्रकारके उदात्त और प्रगल्भ विचारोंसे भरे रहनेके कारण सब लोगोंके पढ़ने योग्य हैं। यद्यपि कर्मयोगशास्त्रके पंथ भिन्न हैं, तथापि जबतक “ संसारका कल्याण ” यह बाहरी उद्देश्य छूट नहीं गया है तबतक भिन्न रीतिसे नीतिशास्त्रका प्रतिपादन करनेवाले किसी मार्ग या पंथका उपहास करना अच्छी बात नहीं है। अस्तु; आधिभौतिकवादियोंमें इस विषयपर मतभेद है, कि नैतिक कर्म-अकर्मका निर्णय करनेके लिये जिस आधिभौतिक बाह्य सुखका विचार करना है वह किसका है? स्वयं अपना है या दूसरेका; एकही व्यक्तिका है, या अनेक व्यक्तियोंका? अब संक्षेपमें इस बातका क्रमशः विचार किया जायगा, कि नये और पुराने सभी आधिभौतिक-वादियोंके मुख्यतः कितने वर्ग हो सकते हैं; और उनके ये पंथ कहाँतक उचित अथवा निर्दोष हैं। इनमेंसे पहला वर्ग केवल स्वार्थ-सुखवादियोंका है। इस पंथका कहना है, कि परलोक और परोपकार सब झूठ है। आध्यात्मिक धर्मशास्त्रोंको चालाक लोगोंने अपना पेट भरनेके लिये लिखा है। इस दुनियामें स्वार्थही सत्य है, और जिस उपायसे स्वार्थ सिद्ध हो सके, अथवा जिसके द्वारा स्वयं अपने आधिभौतिक सुखकी वृद्धि हो उसीको न्याय्य, प्रशस्त या श्रेयस्कर समझना चाहिये। हमारे हिंदुस्थानमें बहुत पुराने समयमें चार्वाकने बड़े उत्साहसे इस मतका प्रतिपादन किया था और रामायणमें जाबालिने अयोध्याकांडके अंतमें श्रीरामचंद्रजीको जो कुटिल उपदेश दिया है वह, तथा महाभारतमें वर्णित कणिकनीति ( सभा. आ. १४२ ) भी इसी प्रकारकी है। चार्वाकका मत है, कि जब पंचमहाभूत एकत्र हो जाते हैं, तब उनके मिलापसे आत्मा नामका एक गुण उत्पन्न हो जाता है; और देहके जलनेपर