श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र है। इसीलिये हम देखते हैं, कि उन पंडितोंकोभी कर्मयोगशास्त्र बहुत महत्त्वका मालूम होता है, कि जो लोग पारलौकिक विषयोंमें अनास्था रखते हैं, या जिन लोगोंका अव्यक्त अध्यात्मज्ञानमें (अर्थात् परमेश्वरमेंभी) विश्वास नहीं है। ऐसे पंडितोंने पश्चिमी देशोंमें इस बातकी बहुत चर्चा की है - और वह चर्चा अबतक जारी है - कि केवल आधिभौतिक शास्त्रकी रीतिसे (अर्थात् केवल सांसारिक दृश्य युक्तिवादसेही) कर्म-अकर्म-शास्त्रकी उपपत्ति दिखलाई जा सकती है या नहीं। इस चर्चामें उन लोगोंने यह निश्चय किया है, कि नीतिशास्त्रका विवेचन करनेमें अध्यात्मशास्त्रकी कुछभी आवश्यकता नहीं है। किसी कर्मके भले या बुरे होनेका निर्णय उस कर्मके बाह्य परिणामोंसे - जो प्रत्यक्ष दीख पड़ते हैं - किया जाना चाहिये; और ऐसाही कियाभी जा सकता है। क्योंकि, मनुष्य जो जो कर्म करता है, वह सब सुखके लिये या दुःख-निवारणार्थही किया करता है। और तो क्या 'सब मनुष्योंका सुख' ही ऐहिक परमोद्देश है; और यदि सब कर्मोंका अंतिम दृश्य फल इस प्रकार निश्चित है, तो नीति-निर्णयका सच्चा मार्ग यही होना चाहिये, कि सब कर्मोंकी नीतिमत्ता, सुखप्राप्ति या दुःखनिवारणका तारतम्य अर्थात् लघुता
- गुरुता देखकर, निश्चित की जावे। जब कि व्यवहारमें किसी वस्तुका भला- बुरापन केवल बाहरी उपयोगहीसे निश्चित किया जाता है, - जैसे, जो गाय छोटे सींगोंवाली और सीधी होकरभी अधिक दूध देती है, वही अच्छी समझी जाती है
- तब इसी प्रकार जिस कर्मसे सुख-प्राप्ति या दुःख-निवारणात्मक बाह्य फल अधिक हो, उसीको नीतिकी दृष्टिसेभी श्रेयस्कर समझना चाहिये। जब हम लोगोंको केवल बाह्य और दृश्य परिणामोंकी लघुता-गुरुता देखकर नीतिमत्ताके निर्णय करनेकी यह सरल और शास्त्रीय कसौटी प्राप्त हो गई है, तब उसके लिये आत्म- अनात्मके गहरे विचार-सागरमें चक्कर खाते रहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। “अर्के चेन्मधु विंदेत किमर्थं पर्वत व्रजेत”* - पासहीमें मधु मिल जाय तो मधु- मक्खीके छत्तेकी खोजमें जंगलमें क्यों जाएँ? किसीभी कर्मके केवल बाह्य फलको देखकर नीति और अनीतिक निर्णय करनेवाले उक्त पक्षको हमने “आधि- भौतिक सुखवाद” कहा है। क्यों कि नीतिमत्ताका निर्णय करनेके लिये इस मतके अनुसार जिन सुख-दुःखोंका विचार किया जाता है, वे सब प्रत्यक्ष दिखनेवाले, और केवल बाह्य अर्थात् बाह्य पदार्थोंका इंद्रियोंके साथ संयोग होनेपर उत्पन्न होने- वाले, यानी आधिभौतिक हैं; और यह पंथभी सब संसारका केवल आधिभौतिक
- कुछ लोग इस श्लोकमें 'अर्क' शब्दसे 'आर्क या मदार' के पेड़काभी अर्थ लेते हैं। परंतु ब्रह्मसूत्र ३. ४. ३. के शांकरभाष्यकी टीकामें आनंदगिरिने 'अर्क' शब्दका अर्थ 'समीप' किया है। इस श्लोकका दूसरा चरण यह है - "सिद्धस्यार्थस्य संप्राप्तौ को विद्वान्यत्नमाचरेत्।"