श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा प्रकरण आधिभौतिक सुखवाद
दुःखादुद्विजते सर्वः सर्वस्य सुखमीप्सितम् । * – महाभारत, शांति. १३९. ६१
मनु आदि शास्त्रकारोंने "अहिंसा सत्यमस्तेयं" इत्यादि जो नियम बनाये हैं उनका कारण क्या है, वे नित्य हैं कि अनित्य, उनकी व्याप्ति कितनी है, उनका मूलभूततत्त्व क्या है, यदि इनमेंसे कोई दो परस्परविरोधी धर्म एकही समयमें प्राप्त हों तो किस मार्गका स्वीकार करना चाहिये, इत्यादि प्रश्नोंका निर्णय ऐसी सामान्य युक्तियोंसे नहीं हो सकता, जो "महाजनो येन गतः स पंथाः" या "अति सर्वत्र वर्जयेत्" आदि वचनोंमें सूचित होती है। इसलिये अब यह देखना चाहिये, कि इन प्रश्नोंका उचित निर्णय कैसे हो; और श्रेयस्कर मार्ग निश्चित करनेके लिये निभ्रान्त युक्ति क्या है; अर्थात् यह जानना चाहिये, कि परस्परविरुद्ध धर्मोंकी लघुता और गुरुता – न्यूनाधिक महत्ता – किस दृष्टिसे निश्चित की जावे। अन्य शास्त्रीय प्रतिपादनोंके अनुसार कर्म-अकर्म विवेचनसंबंधी प्रश्नोंकीभी चर्चा करनेके तीन मार्ग हैं; जैसे आधिभौतिक और आध्यात्मिक। इनके भेदोंका वर्णन पिछले प्रकरणमें करचुके हैं। हमारे शास्त्रकारोंके मतानुसार आध्यात्मिक मार्गही इन सब मार्गोंमें श्रेष्ठ है; परंतु अध्यात्ममार्गका महत्त्व पूर्ण रीतिसे ध्यानमें लानेके लिये दूसरे दो मार्गोंकाभी विचार करना आवश्यक है; इसीलिये इस प्रकरणमें पहले कर्म-अकर्म-परीक्षाके आधिभौतिक मूलतत्त्वोंकी चर्चा की गई है। जिन आधिभौतिक शास्त्रोंकी आजकल बहुत उन्नति हुई है, उनमें व्यक्त पदार्थोंके बाह्य और दृश्य गुणोंहीका विचार विशेषतासे किया जाता है। इसलिये जिन लोगोंने आधिभौतिक शास्त्रोंके अध्ययनहीमें अपनी उम्र बिता दी है और जिनको इस शास्त्रकी विचारपद्धतिका अभिमान है, उन्हें बाह्य परिणामोंकाही विचार करनेकी आदत-सी पड़ जाती है। इसका परिणाम यह होता है, कि उनकी तत्त्वज्ञानदृष्टि थोड़ी-सी संकुचित हो जाती है; और किसीभी बातका विवेचन करते समय वे लोग आध्यात्मिक, पारलौकिक, अव्यक्त या अदृश्य कारणोंको विशेष महत्त्व नहीं देते। परंतु यद्यपि वे लोग उक्त कारणसे आध्यात्मिक और पारलौकिक दृष्टिको छोड़ दें, तथापि उन्हें यह मानना पड़ेगा कि मनुष्योंके सांसारिक व्यवहारोंको सरलता- पूर्वक चलाने और लोकसंग्रह करनेके लिये नीति-नियमोंकी अत्यंत आवश्यकता
* "दुःखसे सभी ऊब जाते हैं और सुखकी इच्छा सभी करते हैं।"