भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भिन्न भिन्न प्रकारसे किया करते है; और एकही बातकी नीतिमत्ताका निर्णयभी भिन्न भिन्नसे किया करते हैं। यही अर्थ उपर्युक्त 'तर्कोऽप्रतिष्ठ:' वचन प्रकारमें दिया गया है। इसलिये अब हमें यह जानना चाहिये, कि धर्म-अधर्म-संशयके इन प्रश्नोंका अचूक निर्णय करनेके लिये अन्य कोई साधन या उपाय हैं या नहीं; यदि हैं तो कौनसे हैं; और यदि अनेक उपाय हों तो उनमें श्रेष्ठ कौन है। बस, इस बातका निर्णय कर देनाही शास्त्रका काम है। शास्त्रका यही लक्षण है, कि "अनेक संशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम्"-अर्थात् अनेक शंकाओंके उत्पन्न होनेपर, सबसे पहले उन विषयोंके गुत्थमगुत्थेको सुलझा दे, जो समझमें नहीं आ सकते हैं; फिर उनके अर्थको सुगम और स्पष्ट कर दे और जो बातें आँखोंसे दीख न पड़ती हों उनका, अथवा आगे होनेवाली बातोंकाभी यथार्थ ज्ञान करा दे। जब हम इस बातको सोचते हैं, कि ज्योतिषशास्त्रके सीखनेसे आगे होनेवाले ग्रहणोंकाभी सब हाल मालूम हो जाता है, तब उक्त लक्षणके "परोक्षार्थस्य दर्शकम्" इस दूसरे भागकी सार्थकता अच्छी तरह दीख पड़ती है। परंतु अनेक संशयोंका समाधान करनेके लिये पहले यह जानना चाहिये, कि वे कौन-सी शंकाएँ हैं। इसीलिये प्राचीन और अर्वाचीन ग्रंथकारोंकी यह रीत है, कि किसीभी शास्त्रका सिद्धान्तपक्ष बत- लानेके पहले उस विषयमें जितने पक्ष हो गये हों, उनका विचार करके उनके दोष और उनकी न्यूनताएँ दिखलाई जाती हैं। इसी रीतिको स्वीकार करके गीतामें कर्म-अकर्म निर्णयके लिये प्रतिपादन किया हुआ सिद्धान्त-पक्षीय योग अर्थात् युक्ति बतलानेके पहले, इसी कामके लिये जो अन्य युक्तियाँ पंडित लोग बतलाया करते हैं, उनकाभी अब हम विचार करेंगे। यह बात सच है, कि ये युक्तियाँ हमारे यहाँ पहले विशेष प्रचारमें न थीं; और विशेष करके पश्चिमी पंडितोंनेही वर्तमान समयमें उनका प्रचार किया है; परंतु इतनेहीसे यह नहीं कहा जा सकता, कि उनकी चर्चा इस ग्रंथमें न की जावे। क्योंकि न केवल तुलनाहीके लिये, परंतु गीताके आध्यात्मिक कर्मयोगका महत्त्व ध्यानमें लानेके लियेभी इन युक्तियोंको-संक्षेपमेंभी क्यों न हो-जान लेना अत्यंत आवश्यक है।