श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
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कर्मयोगशास्त्र ७३ घुसकर विचारवान् पुरुषोंको उसे ढूंढ़ निकालनाही पड़ता है। "न देवचरितं चरेत्" - देवताओंके केवल बाहरी चरित्रके अनुसार आचरण नहीं करना चाहिये
- इस उपदेशका रहस्यभी यही है। इसके सिवा, कर्म-अकर्मका निर्णय करनेके लिये कुछ लोगोंने एक और सरल युक्ति बतलाई है। उनका कहना है, कि कोईभी सद्गुण हो, उसकी अधिकता न होने देनेके लिये हमें हमेशा यत्न करते रहना चाहिये; क्योंकि इस अधिकतासेही अंतमें सद्गुण दुर्गुण बन बैठता है। जैसे, दान सचमुच सद्गुण है; परंतु 'अतिदानाद्बलिर्बद्धः' - दानकी अधिकता होनेसेही राजा बलिने धोखा खाया। प्रसिद्ध यूनानी पंडित ॲरिस्टॉटलने अपने नीतिशास्त्रके ग्रंथमें कर्म-अकर्मके निर्णयकी यही युक्ति बतलाई है; और स्पष्टतया दिखलाया है, कि प्रत्येक सद्गुणकी अधिकता होनेपर दुर्दशा कैसे हो जाती है। कालिदासनेभी रघुवंशमें वर्णन किया है, कि केवल शूरता व्याघ्र सरीखे श्वापदका क्रूर काम है, और केवल नीतिभी डर- पोकपन है; इसलिये अतिथि राजा तलवार और रणनीतिके योग्य मिश्रणसे अपने राज्यका प्रबंध करता था (रघु. १७.४७)। भर्तृहरि आदियोंनेभी कुछ गुण-दोषोंका वर्णन कर कहा है, कि यदि ज्यादा बोलना वाचालताका लक्षण है, और कम बोलना गुम्मापन है; ज्यादा खर्च करे तो उड़ाऊ और कम करे तो कंजूस, आगे बढ़े तो दुःसाहसी और पीछे हटे तो ढीला, अतिशय आग्रह करे तो जिद्दी और न करे तो चंचल, ज्यादा खुशामत करे तो नीच और ऐंठ दिखलावे तो घमंडी है; परंतु इस प्रकारकी स्थूल कसौटीसे अंततक निर्वाह नहीं हो सकता। क्योंकि, 'अति' किसे कहते हैं और 'नियमित' किसे कहते हैं- इसकाभी तो कुछ निर्णय होना चाहिये न; तथा, यह निर्णय कौन और किस प्रकार करे ? किसी एकको अथवा किसी एक समयपर जो बात 'अति' होगी वही दूसरेको, अथवा दूसरे समयपर कम हो जायगी। हनुमानजीको, पैदा होतेही सूर्यको पकड़नेके लिये उड़ान भरना कोई कठिन काम नहीं मालूम पड़ा (वा. रामा. ७. ३५); परंतु यही बात औरोंके लिये कठिन क्या असंभव जान पड़ती। इसलिये जब धर्म-अधर्मके विषयमें संदेह उत्पन्न हो, तब प्रत्येक मनुष्यको ठीक वैसाही निर्णय करना पड़ता है, जैसा श्येनने राजा शिबीसे कहा है :- अविरोधात्तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम। विरोधिषु महीपाल निश्चित्य गुरुलाघवम्। न बाधा विद्यते यत्र तं धर्मं समुपाचरेत् ॥ अर्थात् परस्पर-विरुद्ध धर्मोंका तारतम्य अथवा लघुता और गुरुता देखकरही, प्रत्येक प्रसंगपर, अपनी बुद्धिके द्वारा सच्चे धर्म अथवा कर्मका निर्णय करना चाहिये (मभा. वन. १३१. ११, १२ और मनु. ६. २९९)। परंतु इतनेहीसे यहभी नहीं कहा जा सकता, कि धर्म-अधर्मके सार-असारका विचार करनाही शंकाके समय, धर्म-निर्णयकी एक सच्ची कसौटी है। क्योकि व्यवहारमें अनेक बार देखा जाता है, कि अनेक पंडित लोग अपनी बुद्धिके अनुसार सार-असारका विचारभी