श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र महाजनका अर्थ “बड़े बड़े सदाचारी पुरुष” लिया जाय - और यही अर्थ उक्त श्लोकमें अभिप्रेत है - तो उन महाजनोंके आचरणमेंभी एकता कहाँ है ? निष्पाप श्रीरामचंद्रने अग्निद्वारा शुद्ध हो जानेपरभी अपनी पत्नीका त्याग केवल लोका- पवादके लिये किया, और सुग्रीवको अपने पक्षमें मिलानेके लिये उससे 'तुल्यारिमित्र' – अर्थात् जो तेरा शत्रु वही मेरा शत्रु, और जो तेरा मित्र वही मेरा मित्र, इस प्रकार समझौता करके बेचारे वालीका वध किया, यद्यपि उसने श्रीरामचंद्रका कुछ अपराध नहीं किया था। परशुरामने तो पिताकी आज्ञासे प्रत्यक्ष अपनी माताका शिरच्छेद कर डाला। यदि पांडवोंका आचरण देखा जाय तो पाँचोंकी एकही स्त्री थी। स्वर्गके देवताओंको देखें तो कोई अहल्याका सतीत्व भ्रष्ट करनेवाला है, और कोई (ब्रह्मा) मृगरूपसे अपनीही कन्याका अभिलाष करनेके कारण रुद्रके बाणसे विद्ध होकर आकाशमें पड़ा हुआ है। (ऐ. ब्रा. ३. ३३) इन्हीं बातोंको मनमें लाकर 'उत्तररामचरित' नाटकमें भवभूतिने लवके मुखसे कहलाया है, कि “वृद्धास्ते न विचारणीयचरिताः” - इन वृद्धोंके कृत्योंका बहुत विचार नहीं करना चाहिये। अंग्रेजीमें शैतानका इतिहास लिखनेवाले एक ग्रंथकारने लिखा है, कि शैतानके साथियों और देवदूतोंके झगडोंका हाल देखनेसे मालूम होता है, कि कई बार देवताओंने ही दैत्योंको कपटजालमें फँसा लिया है। इसी प्रकार कौषीतकी ब्राह्मणो- पनिषद् (कौषी. ३. १ और ऐ. ब्रा. ७. २८) में इंद्र प्रतर्दनसे कहता है कि “मैंने वृत्रको (यद्यपि वह ब्राह्मण था) मार डाला; अरुन्मुख संन्यासियोंके टुकड़े टुकड़े करके भेडियोंको (खानेके लिये) दिये; और अपनी कई प्रतिज्ञाओंका भंग करके प्रल्हादके नातेदारों और गोत्रजोंका तथा पौलोम और कालखंज नामक दैत्योंका वध किया। (इससे) मेरा एक बालभी बाँका नहीं हुआ – “तस्यमें तन्न लोम च मा मीयते!” यदि कोई कहे, कि "तुम्हें इन महात्माओंके बुरे कर्मोंकी ओर ध्यान देनेका कुछभी कारण नहीं है; जैसा कि तैत्तिरीयोपनिषद (तैत्ति. १. ११. २) में बतलाया है; उनके जो कर्म अच्छे हों, उन्हींका अनुकरण करो; बाकी सब छोड़ दो। उदाहरणार्थ, परशुरामके समान पिताकी आज्ञाका पालन करो; परंतु माताकी हत्या मत करो'; तो वही पहला प्रश्न फिरभी उठता है, कि बुरा कर्म और भला कर्म समझनेके लिये साधन क्या है? इसलिये अपनी करनीका उक्त प्रकारसे वर्णनकर इंद्र प्रतर्दनसे फिर कहता है, “जो पूर्ण आत्मज्ञानी है, उसे मातृवध, पितृवध भ्रूणहत्या अथवा स्तेय (चोरी) इत्यादि किसीभी कर्मका दोष नही लगता। इस बातको भलीभांति समझ ले, कि आत्मा किसे कहते हैं - ऐसा करनेसे तेरे सारे संशयोंकी निवृत्ति हो जायगी।” इसके बाद इंद्रने प्रतर्दनको आत्मविद्याका उपदेश दिया। सारांश यह है, कि "महाजनो येन गतः स पंथाः" यह युक्ति यद्यपि सामान्य लोगोंके लिये सरल है, तोभी सब बातोंमें इससे निर्वाह नहीं हो सकता; और अंतमें महाजनोंके आचरणका सच्चा तत्त्व कितनाभी गूढ हो, तोभी आत्मज्ञानमें