भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

कर्मयोगशास्त्र ७१ इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपंथिनौ ॥ " इंद्रियों तथा इन इंद्रियोंमें अपने उपभोग्य अथवा त्याज्य पदार्थके विषयमें, जो प्रीति अथवा द्वेष होता है, वह स्वभावतः सिद्ध है । इनके वशमें हमें नहीं होना चाहिये । क्योंकि राग और द्वेष दोनों हमारे शत्रु हैं" - तब भगवानको धर्मका वही लक्षण अभिप्रेत है, जो स्वाभाविक तथा स्वैर मनोवृत्तियोंको मर्यादित करनेके विषयमें ऊपर दिया गया है। मनुष्यकी इंद्रियाँ उसे पशुके समान आचरण करनेके लिये कहा करती हैं, और उसकी बुद्धि उसको विरुद्ध दिशामें खींचा करती है। इस कलहाग्निमें जो लोग अपने शरीरमें संचार करनेवाले पशुत्वका यज्ञ करके कृतकृत्य (सफल) होते हैं, उन्हेंही सच्चा याज्ञिक कहना चाहिये, और वेही धन्य हैं। धर्मको 'आचार-प्रभव' कहिये, 'धारणात्' धर्म मानिये अथवा 'चोदनालक्षण' धर्म समझिये; धर्मकी यानी व्यावहारिक नीतिबंधनोंकी कोईभी व्याख्या अपनाइये; परंतु जब धर्म-अधर्मका संशय उत्पन्न होता है, तब उसका निर्णय करनेके लिये उपर्युक्त तीनों लक्षणोंका कुछ उपयोग नहीं होता। पहली व्याख्यासे सिर्फ यह मालूम होता है, कि धर्मका मूलस्वरूप क्या है; उसका बाह्य उपयोग दूसरी व्याख्यासे मालूम होता है; और तीसरी व्याख्यासे यही बोध होता है, कि पहले पहल किसीने धर्मकी मर्यादा निश्चित कर दी है। परंतु अनेक आचारोंमें भेद पाया जाता है; इतनाही नहीं तो एकही कर्मके अनेक परिणाम होते हैं; और अनेक ऋषियोंकी आज्ञाएँ अर्थात् 'चोदना'भी भिन्न भिन्न हैं। इन कारणोंसे संशयके समय धर्मनिर्णयके लिये किसी दूसरे मार्गको ढूँढनेकी आवश्यकता होती है। यह मार्ग कौन-सा है ? यही प्रश्न यक्षने युधिष्ठिरसे किया था। उसपर युधिष्ठिरने उत्तर दिया है कि :- तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्नाः नैको ऋषिर्यस्य वचः प्रमाणम् । धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पंथाः ॥ "यदि तर्कको देखें तो वह चंचल है, अर्थात् जिसकी बुद्धि जैसी तीव्र होती है वैसेही अनेक प्रकारके अनेक अनुमान तर्कसे निष्पन्न हो जाते हैं। श्रुति अर्थात् वेदाज्ञाएँ देखी जायें तो वेभी भिन्न भिन्न हैं, और यदि स्मृतिशास्त्रको देखें तो ऐसा एकभी ऋषि नहीं है, जिसका वचन अन्य ऋषियोंकी अपेक्षा अधिक प्रमाणभूत समझा जाय । अच्छा, ( इस व्यावहारिक ) धर्मका मूलभूततत्त्व देखा जाय, तो वहभी अंधकारमें छिपा हुआ है अर्थात् वह साधारण मनुष्योंकी समझमें नहीं आ सकता ! इसलिये महाजन जिस मार्गसे गये हों, वही (धर्मका) मार्ग है" (मभा. वन. ३१२. ११५) ठीक है ! परंतु महाजन किसको कहना चाहिये ? उसका अर्थ "बड़ा अथवा बहुतसा जनसमूह" नहीं हो सकता । क्योंकि इन साधारण लोगोंके मनमें धर्म-अधर्मकी शंका कभी उत्पन्न नही होती, उनके बतलाये मार्गसे जाना मानो कठोपनिषद्में वर्णित 'अंधेनैव नीयमाना यथान्धाः'-वाली नीतिहीको चरितार्थ करना है। अब यदि