श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नहीं कर दिया जाता, तबतक कोईभी काम किसीकोभी करनेकी स्वतंत्रता होती है। इसका आशय यही है, कि पहलेपहल निर्बंध या प्रबंधके कारण धर्म निर्माण हुआ। धर्मकी यह व्याख्या कुछ अंशमें, प्रसिद्ध अंग्रेज ग्रंथकार हॉब्सके मतसे मिलती है। असभ्य तथा जंगली अवस्थामें प्रत्येक मनुष्यका आचरण, समय-समयपर उत्पन्न होनेवाली उसकी मनोवृत्तियोंकी प्रबलताके अनुसार हुआ करता है। परंतु कुछ समयके बाद यह मालूम होने लगता है, कि इस प्रकारका मनमाना बर्ताव श्रेयस्कर नहीं है; और यह विश्वास होने लगता है, कि इंद्रियोंके स्वाभाविक व्यापारोंकी कुछ मर्यादा निश्चित करके उसके अनुसार बर्ताव करनेहीमें सब लोगोंका कल्याण है। तब प्रत्येक मनुष्य ऐसी मर्यादाओंका पालन कायदेके तौरपर करने लगता है; जो शिष्टाचारसे, या अन्य रीतिसे सुदृढ हो जाया करती हैं। और जब इस प्रकारकी मर्यादाओंकी संख्या बहुत बढ़ जाती है, तब उन्हींका एक शास्त्र बन जाता है। पिछले प्रकरणमें बतलाया गया है कि पूर्वसमयमें विवाहव्यवस्थाका प्रचार नहीं था। पहलेपहल उसे श्वेतकेतुने चलाया: और शुक्राचार्यने मदिरापानको निषिद्ध ठहराया। यह न देखकर, कि इन मर्यादाओंको निश्चित करनेमें श्वेतकेतु अथवा शुक्राचार्यका क्या हेतु था; केवल इसी एक बातपर ध्यान देकर, कि इन मर्यादाओंके निश्चित करनेका काम या कर्तव्य इन लोगोंको करना पड़ा: धर्म शब्दकी "चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः" व्याख्या बनाई गई है। धर्मभी हुआ तो पहले उसका महत्त्व किसी व्यक्तिके ध्यानमें आता है, और तभी उसकी प्रवृत्ति होती है। "खाओ-पीओ, मौज करो" ये बातें किसीको सिखलानी नहीं पड़तीं; क्योंकि ये इंद्रियोंके स्वाभाविक धर्मही हैं। मनुजीने जो कहा है, कि "न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने" (मनु. ५. ५६)
- अर्थात् मांस भक्षण करना अथवा मद्यपान और मैथुन करना कोई (सृष्टि- कर्म-विरुद्ध) दोष नहीं है - उसका तात्पर्यभी यही है। ये सब बातें मनुष्यहीके लिये नहीं, किंतु प्राणिमात्रके लिये स्वाभाविक हैं - "प्रवृत्तिरेषा भूतानाम्।" समाज-धारणके लिये अर्थात् सब लोगोंके सुखके लिये इस स्वाभाविक आचरणका उचित प्रतिबंध करनाही धर्म है। महाभारतके शांतिपर्व (मभा. शां. २९४. २९) मेंभी कहा है - आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ अर्थात् "आहार, निद्रा, भय और मैथुन मनुष्यों और पशुओंके लिये एकही समान स्वाभाविक हैं। मनुष्यों और पशुओंमें कुछ भेद है तो केवल धर्मका (अर्थात् इन स्वाभाविक वृत्तियोंको मर्यादित करनेका)। जिस मनुष्यमें यह धर्म नहीं है, वह पशुके समानही है।" आहारादि स्वाभाविक वृत्तियोंको मर्यादित करनेके विषयमें भागवतका श्लोक पिछले प्रकरणमें दिया गया है। इसी प्रकार भगवद्गीतामेंभी जब अर्जुनसे भगवान् कहते हैं (गीता ३. ३४) :-