श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मयोगशास्त्र ६९
नीतिग्रंथ आजकल हमारे यहाँकी अंग्रेजी पाठशालाओंमें पढ़ाये जाते हैं, जिसका परि- णाम यह दीख पड़ता है, कि गीतामें बतलाये गये कर्मयोगशास्त्रके मूलतत्त्वोंका - हमारे अंग्रेजी सीखे हुये कुछ विद्वानोंकोभी - स्पष्ट बोध नहीं होता। उक्त विवेचनसे ज्ञात हो जायगा, कि व्यावहारिक नीतिबंधनोंके लिये अथवा समाज-धारणकी व्यवस्थाके लिये हम 'धर्म' शब्दका उपयोग क्यों करते हैं। महाभारत, भगवद्गीता आदि संस्कृत ग्रंथोंमे, तथा प्राकृत भाषा ग्रंथोंमेंभी, व्यावहारिक कर्तव्य अथवा नियमके अर्थमें धर्म शब्दका हमेशा उपयोग किया जाता है। कुलधर्म और कुलाचार, दोनों शब्द समानार्थक समझे जाते हैं। भारतीय युद्धमें एक समय कर्णके रथका पहिया पृथ्वीने निगल लिया था; उसको उठा कर ऊपर लानेके लिये जब कर्ण अपने रथसे नीचे उतरा तब अर्जुन उसका वध करनेके लिये उद्युक्त हुआ। यह देखकर कर्णने कहा, "निःशस्त्र शत्रुको मारना धर्मयुद्ध नहीं है।" इसे सुनकर श्रीकृष्णने कर्णको पिछली कई बातोंका स्मरण दिलाया; जैसे कि द्रौपदीका वस्त्रहरण और सब लोगोंने मिलकर अकेले अभिमन्युका किया वध इत्यादि। और प्रत्येक प्रसंगपर यह प्रश्न किया कि "हे कर्ण! उस समय तेरा धर्म कहाँ गया था ?" इन सब बातोंका वर्णन महाराष्ट्र-कवि मोरोपंतने किया है। और महाभारतमेंभी इस प्रसंगपर "क्व ते धर्मस्तदा गतः"में 'धर्म' शब्दकाही प्रयोग किया गया है। तथा अंतमें कहा गया है, कि जो इस प्रकार अधर्म करे उसके साथ शठं प्रति शाठ्यंका बर्ताव करनाही उसको उचित दंड देना है। सारांश, क्या संस्कृत और क्या प्राकृत सभी ग्रंथोंमें 'धर्म' शब्दका प्रयोग उन सब नीति-नियमोंके लिये किया गया है, जो समाज-धारणके लिये शिष्टजनोंके द्वारा अध्यात्म-दृष्टिसे बनाये गये हैं। इसलिये उसी शब्दका उपयोग हमनेभी इस ग्रंथमें किया है। उक्त दृष्टिसे विचार करनेपर नीतिके उन नियमों अथवा 'शिष्टाचारों'को धर्मकी बुनियाद कह सकते हैं, जो समाज-धारणके लिये शिष्टजनोंके द्वारा प्रचलित किये गये हों; और जो सर्वमान्य हो चुके हों। और, इसलिये महाभारत (अनु. १०४. १५७) में एवं स्मृति-ग्रंथोंमें 'आचारप्रभवो धर्मः' अथवा 'आचारः परमो धर्मः' (मनु. १. १०८), अथवा धर्मका मूल बतलाते समय 'वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः' (मनु. २. १२) इत्यादि वचन कहे हैं। परंतु कर्मयोगशास्त्रमें इतनेहीसे काम नहीं चल सकता; इस बातकाभी पूरा और मार्मिक विचार करना पड़ता है, (जैसे कि दूसरे प्रकरणमें किया है।) कि उक्त आचारकी प्रवृत्तिही क्यों हुई - इस आचारकी प्रवृत्तिका कारण क्या है। 'धर्म' शब्दकी दूसरी जो व्याख्या प्राचीन ग्रंथोंमें दी गई है, उसकाभी यहाँ थोड़ा विचार करना चाहिये। यह व्याख्या मीमांसकोंकी है: 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः' (जै. सू. १. १. २)। अर्थात् 'चोदना' याने प्रेरणा किसी अधिकारी पुरुषका यह कहना तू 'अमुक कर' अथवा 'मत कर' जबतक इस प्रकार कोई प्रबंध