भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आध्यात्मिक उन्नतिके अनुकूल हो, वही पुण्य है, वही धर्म और वही शुभकर्म है; और जो कर्म उसके प्रतिकूल वही पाप, अधर्म अथवा अशुभ है। यही कारण है, कि हम 'कर्तव्य-अकर्तव्य', 'कार्य-अकार्य' शब्दोंके बदले 'धर्म' और 'अधर्म' शब्दोंकाही ( यद्यपि वे दो अर्थके अतएव कुछ संदिग्ध हों, तोभी ) अधिक उपयोग करते हैं। यद्यपि बाह्य-सृष्टिके व्यावहारिक कर्मों अथवा व्यापारोंका विचार करनाही प्रधान विषय हो, तोभी उक्त कर्मोंके बाह्य परिणामके विचारके साथही साथ यह विचारभी हम लोग हमेशा करते हैं, कि ये व्यापार हमारी आत्माके कल्याणके अनुकूल हैं या प्रतिकूल । यदि आधिभौतिकवादीसे कोई यह प्रश्न करे, कि " मैं अपना हित छोड़कर लोगोंका हित क्यों करूँ ? " तो वह इसके सिवा और क्या समाधानकारक उत्तर दे सकता है, कि " यह तो सामान्यतः मनुष्यस्वभावही है।" हमारे शास्त्र- कारोंकी दृष्टि इससे परे पहुँची हुई है; और उस व्यापक आध्यात्मिक दृष्टिहीसे महाभारतमें कर्मयोगशास्त्रका विचार किया गया है; एवं श्रीमद्भगवद्गीतामें वेदान्तका निरूपणभी इतनेहीके लिये किया गया है। प्राचीन यूनानी पंडितोंकीभी यही राय है, कि ' अत्यंत हित' अथवा ' सद्गुणकी पराकाष्ठा 'के समान कुछ-न-कुछ परम उद्देश्य कल्पित करके फिर उसी दृष्टिसे कर्म-अकर्मका विवेचन करना चाहिये । और ॲरिस्टॉटलने अपने नीतिशास्त्रके ग्रंथ ( १. ७, ८) में कहा है, कि आत्माके हितमेंही इन सब बातोंका समावेश हो जाता है। तथापि इस विषयमें आत्माके हितको जितनी प्रधानता देनी चाहिये थी, उतनी ॲरिस्टॉटलने नहीं दी है। हमारे शास्त्रकारोंकी बात इस प्रकार नहीं है। उन्होंने निश्चित किया है कि, आत्माका कल्याण अथवा आध्यात्मिक पूर्णावस्थाहो प्रत्येक मनुष्यका पहला और परम उद्देश्य है। अन्य प्रकारके हितोंकी अपेक्षा उसीको प्रधान जानना चाहिये और तदनुसार कर्म-अकर्मका विचार करना चाहिये । अध्यात्म-विद्याको छोड़कर कर्म-अकर्मका विचार करना ठीक नहीं है। जान पड़ता है कि वर्तमान समयमें पश्चिमी देशोंके कुछ पंडितोंनेभी कर्म-अकर्मके विवेचनकी इसी पद्धतिको स्वीकार किया है। उदा- हरणार्थ, जर्मन तत्त्वज्ञानी कांटने पहले "शुद्ध (व्यवसायात्मक) बुद्धिकी मीमांसा" नामक आध्यात्मिक ग्रंथ लिखकर फिर उसकी पूतिके लिए "व्यावहारिक (वासनात्मक) बुद्धिकी मीमांसा" नामका नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथ लिखा है* और इंग्लैंडमेंके ग्रीनने अपने "नीतिशास्त्रके उपोद्घात" का सृष्टिके मूलभूत आत्म- तत्त्वसेही आरंभ किया है। परंतु इन ग्रंथोंके बदले केवल आधिभौतिक पंडितोंकेही

  • कांट एक जर्मन तत्त्वज्ञानी था । इसे अर्वाचीन तत्त्वज्ञानशास्त्रका जनक समझते हैं। इसके Critique of Pure Reason ( शुद्ध बुद्धिकी मीमांसा ) और Critique of Practical Reason ( वासनात्मक बुद्धिकी मीमांसा ) ये दो ग्रंथ प्रसिद्ध हैं। ग्रीनके ग्रंथका नाम Prolegomena to Ethics है।