श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 114, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्मयोगशास्त्र ६७ है” (महा. कर्ण. ६९. ५९)। यदि यह धर्म छूट जाय, तो समझ लेना चाहिये, कि समाजके सारे बंधनभी टूट गये; और यदि समाजके बंधन टूटे, तो आकर्षण- शक्तिके बिना आकाशके सूर्यादि ग्रहमालाओंकी जो दशा हो जाती है, अथवा समुद्रमे मल्लाहके बिना नावकी जो दशा होती है, ठीक वही दशा समाजकीभी हो जाती है। इसलिये उक्त शोचनीय अवस्थासे समाजको नाशसे बचानेके लिये व्यासजीने कई स्थानोंपर कहा है, कि यदि अर्थ या द्रव्य पानेकी इच्छा हो, तो 'धर्मके द्वारा' अर्थात् समाजकी रचनाको न बिगाड़ने हुए प्राप्त करो; और यदि काम आदि वासनाओंको तृप्त करना हो, तो वह भी 'धर्मसेही' करो। महाभारतके अंतमें यही कहा है कि :- ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति माम् । धर्मादर्थश्च कामश्च स धर्मः किं न सेव्यते ॥ “अरे ! भुजा उठा कर मैं चिल्ला रहा हूँ, (परंतु) कोईभी मेरी नहीं सुनता ! धर्मसेही अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है, (इसलिये) इस प्रकारके धर्मका आचरण तुम क्यों नहीं करते हो ?” अब इससे पाठकोंके ध्यानमें यह बात अच्छी तरह जम जायगी, कि महाभारतको जिस धर्म-दृष्टिसे पाँचवां वेद अथवा 'धर्मसंहिता' मानते हैं, उस 'धर्मसंहिता' शब्दके 'धर्म' शब्दका मुख्य अर्थ क्या है। यही कारण है, कि पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा इन दोनों पारलौकिक अर्थके प्रतिपादक ग्रंथोंके साथही - धर्मग्रंथके नातेसे - 'नारायणं नमस्कृत्य' इन प्रतीक शब्दोंके द्वारा - महाभारतकाभी समावेश ब्रह्मयज्ञके नित्यपाठमें कर दिया है। धर्म-अधर्मके उपर्युक्त निरूपणको सुनकर कोई यह प्रश्न करे कि, यदि तुम्हें 'समाज-धारण' और दूसरे प्रकरणके सत्यानृतविवेकमें कथित 'सर्वभूतहित' ये दोनों तत्त्व मान्य हैं, तो तुम्हारी दृष्टिमें और आधिभौतिक दृष्टिमें भेदही क्या है ? क्योंकि ये दोनों तत्त्व बाह्यतः प्रत्यक्ष दिखनेवाले या आधिभौतिकही हैं। इस प्रश्नका विस्तृत विचार अगले प्रकरणोंमें किया गया है। यहाँ इतनाही कहना बस है, कि यद्यपि हमको यह तत्त्व मान्य है, कि समाज-धारणही धर्मका मुख्य बाह्य उपयोग है, तथापि हमारे मतकी विशेषता यह है, कि वैदिक अथवा अन्य सब धर्मों- का जो परम उद्देश्य आत्म-कल्याण या मोक्ष है, उसपरभी हमारी दृष्टि बनी है। समाज-धारणको लीजिये, चाहे सर्वभूतहितहीको, यदि ये बाह्योपयोगी तत्त्व हमारे आत्म-कल्याणके मार्गमें बाधा डालें, तो हमें इनकी ज़रूरत नहीं। हमारे आयुर्वेदग्रंथ यदि यह प्रतिपादन करते हैं, कि वैद्यकशास्त्रभी शरीररक्षाके द्वारा मोक्षप्राप्तिका साधन होनेके कारण संग्रहणीय है, तो यह कदापि संभव नहीं, कि जिस शास्त्रमें इस महत्त्वके विषयका विचार किया गया है, कि सांसारिक व्यवहार किस प्रकार करना चाहिये, उस कर्मयोगशास्त्रको हमारे शास्त्रकार आध्यात्मिक मोक्षज्ञानसे अलग बतलावें। इसीलिये हम समझते हैं, कि जो कर्म हमारे मोक्ष अथवा हमारी