श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
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धर्म शब्द अनेक स्थानोंपर आया है; और जिस स्थानमें कहा गया हैं, कि "किसी- को कोई काम करना धर्म-संगत है", उस स्थानमें धर्म शब्दसे कर्तव्यशास्त्र अथवा तत्कालीन समाज-व्यवस्थाशास्त्रहीका अर्थ पाया जाता है; तथा जिस स्थानमें पारलौकिक कल्याणके मार्ग बतलानेका प्रसंग आया है, उस स्थानपर अर्थात् शांतिपर्वके उत्तरार्धमें 'मोक्षधर्म' इस विशिष्ट शब्दकी योजना की गई है। इसी तरह मन्वादि स्मृति-ग्रंथोंमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके विशिष्ट कर्मों अर्थात् चारों वर्णोंके कर्मोंका वर्णन करते समय केवल 'धर्म' शब्दकाही अनेक स्थानोंपर कई बार उपयोग किया गया है। और भगवद्गीतामेंभी जब भगवान् अर्जुनसे यह कहकर लड़नेके लिये कहते हैं, कि "स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य" (गीता २. ३१) तब
- और उसके बाद "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः" (गीता ३. ३५) इस स्थानपरभी - 'धर्म' शब्द 'इस लोकके चातुर्वर्ण्यके धर्म' अर्थमेंही प्रयुक्त हुआ है। पुराने जमानेके ऋषियोंने श्रम-विभागरूप चातुर्वर्ण्य-संस्था इसलिये चलाई थी, कि समाजके सब व्यवहार सरलतासे होते जावें, किसी एक विशिष्ट व्यक्ति या वर्गपरही सारा बोझ न पड़ने पावे, और समाजका सभी दिशाओंसे संरक्षण और पोषण भलीभाँति होता रहे। यह बात भिन्न है, कि कुछ समयके बाद चारों वर्णोंके लोग केवल जातिमात्रोपजीवी हो गये; अर्थात् सच्चे स्वकर्मको भूलकर वे केवल नामधारी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र हो गये। इसमें संदेह नहीं, कि आरंभमें यह व्यवस्था समाजधारणार्थही की गई थी। और यदि चारों वर्णोंमेंसे कोईभी एक वर्ण अपना धर्म अर्थात् कर्तव्य छोड़ दे, यदि कोई वर्ण समूल नष्ट हो जाय और उसकी स्थानपूर्ति दूसरे लोगोंसे न की जाय, तो कुल समाज उतनाही पंगु होकर धीरे धीरे नष्टभी होने लग जाता है; अथवा वह निकृष्ट अवस्थाको तो अवश्यही पहुँच जाता है। यद्यपि यह बात सच है, कि यूरोपमें ऐसे समाज हैं, जिनका अभ्युदय चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाके बिनाही हुआ है; तथापि स्मरण रहे, कि उन देशोंमें चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था चाहे न हो; परंतु चारों वर्णोंके सब धर्मजातिरूपसे नहीं तो गुण-विभागरूपहीसे जागृत अवश्य रहते हैं। सारांश, जब हम धर्म शब्दका उपयोग व्यावहारिक दृष्टिसे करते हैं, तब हम यही देखा करते हैं कि, सब समाजका धारण और पोषण कैसे होता है। मनुने कहा है - "असुखोदर्क अर्थात् जिसका परिणाम दुःखकारक होता है, उस धर्मको छोड़ दें" (मनु. ४. १७६) और शांति- पर्वके सत्यानृताध्याय (महा. शां. १०९. १२) में धर्म-अधर्मका विवेचन करते हुए भीष्म और उसकेपूर्व कर्णपर्वमे श्रीकृष्ण कहते हैं :- धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः। यत्स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥ "धर्म शब्द धृ (= धारण करना) धातुसे बना है। धर्मसेही सब प्रजा बँधी हुई है। यह निश्चय किया गया है, कि जिससे (सब प्रजाका) धारण होता है वही धर्म