श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मयोगशास्त्र ६५ दायक होगा या नहीं। उसे यही देखना था, कि में जो कर रहा हूँ वह 'धर्म्य' है या 'अधर्म्य'; अथवा 'पुण्य' है या 'पाप'; और गीताका विवेचनभी इसी दृष्टिसे किया गया है। केवल गीतामेंही नहीं; किंतु महाभारतमें कई स्थानोंपरभी कर्म- अकर्मका जो विवेचन है, वह पारलौकिक और अध्यात्मदृष्टिसेही किया गया है। और वहाँ किसीभी कर्मका अच्छापन या बुरापन दिखलानेके लिये प्रायः सर्वत्र 'धर्म' और 'अधर्म' इन दो शब्दोंका उपयोग किया गया है। परंतु 'धर्म' और उसका प्रतियोगी 'अधर्म' ये दोनों शब्द अपने व्यापक अर्थके कारण कभी कभी भ्रम उत्पन्न कर दिया करते हैं। इसलिये यहाँपर इस बातकी कुछ अधिक मीमांसा करना आवश्यक है कि कर्मयोगशास्त्रमें इन शब्दोंका उपयोग मुख्यतः किस अर्थमें किया जाता है। नित्य व्यवहारमें 'धर्म' शब्दका उपयोग केवल "पारलौकिक सुखका मार्ग" इसी अर्थमें किया जाता है। जब हम किसीसे प्रश्न करते हैं, कि "तेरा कौनमा धर्म है?" तब उससे हमारे पूछनेका यही हेतु होता हैकि तू अपने पारलौकिक कल्याणके लिये किस मार्ग - वैदिक, बौद्ध, जैन, ईसाई, मुहम्मदी या पारसी - पर चलता है; और वह हमारे प्रश्नके अनुसारही उत्तर देता है। इसी तरह स्वर्ग- प्राप्तिके लिये साधनभूत यज्ञ-याग आदि वैदिक विषयोंकी मीमांसा करते समय "अथातो धर्मजिज्ञासा" आदि धर्मसूत्रोंमेंभी धर्म शब्दका यही अर्थ लिया गया है; परंतु 'धर्म' शब्दका इतनाही संकुचित अर्थ नहीं है। इसके सिवा राजधर्म, प्रजाधर्म, देशधर्म, कुलधर्म, मित्रधर्म इत्यादि सांसारिक नीति-बंधनोंकोभी 'धर्म' कहते हैं। धर्म शब्दके इन दो अर्थोंको यदि पृथक् करके दिखलाना हो, तो पार- लौकिक धर्मको 'मोक्षधर्म' अथवा सिर्फ 'मोक्ष' और व्यावहारिक धर्म अथवा केवल नीतिको केवल 'धर्म' कहा करते हैं। उदाहरणार्थ, चतुर्विध पुरुषार्थकी गणना करते समय हम लोग 'धर्म अर्थ, काम, मोक्ष' कहा करते हैं। इसके पहले शब्द 'धर्म'मेंही यदि मोक्षका समावेश हो जाता, तो अंतमें मोक्षको पृथक् पुरुषार्थ बतलानेकी आवश्यकता न रहती। अर्थात् यह कहना पड़ता है, कि 'धर्म'पदसे इस स्थानपर संसारके सैकड़ों नीतिधर्मही शास्त्रकारोंको अभिप्रेत हैं। उन्हींको हम लोग आज- कल कर्तव्यकर्म, नीति, नीतिधर्म अथवा सदाचरण कहते हैं; परंतु प्राचीन संस्कृत ग्रंथोंमें 'नीति' अथवा 'नीतिशास्त्र' शब्दोंका उपयोग विशेष करके राजनीतिहीके लिये किया जाता है। इसलिये पुराने ज़मानेमें कर्तव्यकर्म अथवा सदाचारके सामान्य विवेचनको 'नीतिप्रवचन' न कहकर 'धर्मप्रवचन' कहा करते थे। परंतु 'नीति' और 'धर्म' इन दो शब्दोंका यह पारिभाषिक भेद सभी संस्कृत-ग्रंथोंमें नहीं माना गया है। इसलिये हमनेभी इस ग्रंथमें 'नीति', 'कर्तव्य' और 'धर्म' शब्दोंका उपयोग एकही अर्थमें किया है; और मोक्षका विचार जिन स्थानोंपर करना है, उन प्रकरणोंके 'अध्यात्म' और 'भक्तिमार्ग' ये स्वतंत्र नाम रखे हैं। महाभारतमें गी. र. ५