भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अब वह रेल और तार सरीखे उपयोगी आविष्कारोंको ढूंढ़ कर सृष्टिपर अपना अधिक प्रभाव जमाने लग गया है। इस मार्गको कोंटने 'आधिभौतिक' नाम दिया है। उसने निश्चित किया है, कि किसीभी शास्त्रया विषयका विवेचन करनेके लिये अन्य मार्गोंकी अपेक्षा यही आधिभौतिक मार्ग अधिक श्रेष्ठ और लाभकारी है। कोंटके मतानुसार समाजशास्त्र या कर्मयोगशास्त्रका तात्विक विचार करनेके लिये इसी आधिभौतिक मार्गका अवलंब करना चाहिये। इस मार्गका अवलंब करके इस पंडितने इतिहासकी आलोचना की; और सब व्यवहारशास्त्रोंका यही मथितार्थ निकाला है, कि इस संसारमें प्रत्येक मनुष्यका परम धर्म यही है, कि वह समस्त मानव-जातिसे प्रेम करें और सब लोगोंके कल्याणके लिये सदैव प्रयत्न करता रहे। मिल और स्पेन्सर आदि अंग्रेज पंडित इसी मतके पुरस्कर्ता कहे जा सकते हैं। इसके उलटे कांट, हेगेल, शोपेनहौएर आदि जर्मन तत्त्वज्ञानी पुरुषोंने, नीति- शास्त्रके विवेचनके लिये इस आधिभौतिक पद्धतिको अपूर्ण माना है और हमारे वेदान्तियोंकी नाईं अध्यात्मबुद्धिसेही नीतिके समर्थन करने के मार्गको आजकल उन्होंने युरोपमें फिर स्थापित किया है। इसके विषयमें और अधिक आगे चलकर लिखा जाएगा। एकही अर्थके विवक्षित होनेपरभी 'अच्छा और बुरा'के पर्यायवाची भिन्न भिन्न शब्दों का - जैसे 'कार्य-अकार्य' और 'धर्म्य-अधर्म्य'का - उपयोग क्यों होने लगा ? इसका कारण यही है, कि विषय-प्रतिपादनका मार्ग या दृष्टि प्रत्येककी भिन्न भिन्न होती है। अर्जुनके सामने यह प्रश्न था, कि जिस युद्धमें भीष्म, द्रोण आदिका वध करना पड़ेगा, उसमें शामिल होना उचित है या नही (गीता. २. ७ ) और यदि इसी प्रश्नका उत्तर देनेका प्रसंग किसी आधिभौतिक पंडितपर आता, तो वह पहले इस बातका विचार करता, कि भारतीय युद्धसे स्वयं अर्जुनको दृश्य हानि या लाभ कितना होगा; और कुल समाजपर उसका क्या परिणाम होगा। यह विचार करके तब उसने निश्चय किया होता, कि युद्ध करना 'न्याय्य' है या 'अन्याय्य'। इसका कारण यह है कि किसी कर्मके अच्छेपन या बुरेपनका निर्णय करते समय ये आधिभौतिक पंडित यही सोचा करते हैं, कि इस संसारमें उस कर्मका आधिभौतिक परिणाम अर्थात् प्रत्यक्ष बाह्य परिणाम क्या होगा - ये लोग इस आधि- भौतिक कसौटीके सिवा और किसी साधन या कसौटीको नहीं मानते। परंतु ऐसे उत्तरसे अर्जुनका समाधान होना संभव नहीं था। उसकी दृष्टि उससेभी अधिक व्यापक थी। उसे केवल अपने सांसारिक हितका विचार नहीं करना था; किंतु उसे पारलौकिक दृष्टिसेभी यह निर्णय कर लेना था, कि इस युद्धका परिणाम मेरी आत्मा के लिये श्रेयस्कर होगा या नही। उसे इस बातकी कुछभी शंका नहीं थी, कि युद्धमें भीष्म-द्रोण आदियोंका वध होनेपर तथा राज्य प्राप्ति होनेपर मुझे ऐहिक सुख मिलेगा या नहीं; और मेरा शासन लोगोंको दुर्योधनसे अधिक सुख-