श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मयोगशास्त्र ६३ लिये ये तीन मार्ग प्रचलित हैं; और इनका उपयोग उपनिषद्-ग्रंथोंमेंभी किया गया है। उदाहरणार्थ, ज्ञानेंद्रियाँ श्रेष्ठ हैं या प्राण श्रेष्ठ हैं, इस बातका विचार करते समय बृहदारण्यक आदि उपनिषदोंमें एक बार उक्त इंद्रियोंके अग्नि आदि देवता- ओंको और दूसरी बार उनके सूक्ष्म रूपों (अध्यात्म) को ले कर उनके बलाबल का विचार किया गया है (बृ. १. ५. २१ और २२; छां. १. २ और ३; कौषी. २. ८); और, गीताके सातवें अध्यायके अंतमें तथा आठवेंके आरंभमें ईश्वरके स्वरूपका जो विचार बतलाया गया है, वहभी इसी दृष्टिसे किया गया है। “अध्यात्मविद्या विद्यानाम्” (गीता १०. ३२) इस वाक्यके अनुसार हमारे शास्त्रकारोंने उक्त तीन मार्गोंमेंसे, आध्यात्मिक विवरणकोही अधिक महत्त्व दिया है। परंतु आजकल उप- र्युक्त तीन शब्दों (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) के अर्थको थोड़ा-सा बदलकर प्रसिद्ध आधिभौतिक फ्रेंच पंडित कोंटने* आधिभौतिक विवेचनकोही अधिक महत्त्व दिया है। उसका कहना है, कि सृष्टिके मूल-तत्त्वको खोजते रहनेसे कुछ लाभ नहीं; यह तत्त्व अगम्य है। अर्थात् इसको समझ लेना कभीभी संभव नहीं। इसलिये इसकी कल्पित नींवपर किसी शास्त्रकी इमारतको खड़ा कर देना न तो संभव है और न उचित। असभ्य और जंगली मनुष्योंने पहले पहल जब पेड़, बादल और ज्वालामुखी पर्वत आदि हिलते-चलते पदार्थोंको देखा, तब उन लोगों ने अपने भोलेपनसे इन सब पदार्थोंको देवताही मान लिया। यह कोंटके मतानुसार, 'आधिदैविक' विचार हुआ; परंतु मनुष्योंने उक्त कल्पनाको शीघ्रही त्याग दिया और वे समझने-लगें कि इन सब पदार्थोंमें कुछ-न-कुछ आत्मतत्त्व अवश्य भरा हुआ है। कोंटके मतानुसार मानवी ज्ञानकी उन्नतिकी यह दूसरी सीढ़ी है। इसे वह 'आध्यात्मिक' कहता है; परंतु जब इस रीतिसे सृष्टिका विचार करने परभी प्रत्यक्ष उपयोगी शास्त्रीय ज्ञानकी कुछ वृद्धि नहीं हो सकी, तब अंतमें मनुष्य सृष्टिके पदार्थोंके दृश्य गुण-धर्मोंहीका और अधिक विचार करने लगा; जिससे
- फ्रान्स देशमें ऑगस्ट कोंट (Auguste Comte) नामक एक बड़ा पंडित गतशताब्दीमें हो चुका है। इसने समाजशास्त्रपर एक बहुत बड़ा ग्रंथ लिखकर बतलाया है, कि समाजरचनाका शास्त्रीय रीतिसे किस प्रकार विवेचन करना चाहिये। अनेक शास्त्रोंकी आलोचना करके इसने यह निश्चित किया है, कि किसीभी शास्त्रको लो, उसका विवेचन पहले पहल Theological पद्धतिसे किया जाता है; फिर Meta- physical पद्धतिसे होता है; और अंतमें उसको Positive स्वरूप मिलता है। उन्हीं तीन पद्धतियोंको हमने इस ग्रंथमें आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक ये तीन प्राचीन नाम दिये हैं। ये पद्धतियाँ कुछ कोंटकी निकाली हुई नहीं हैं; ये सब पुरानीही हैं तथापि उसने उनका ऐतिहासिक क्रम नई रीतिसे बाँधा है; और उनमें आधिभौतिक (Positive) पद्धतिकोही श्रेष्ठ बतलाया है; बस इतनाही कोंटका नया शोध है। कोंटके अनेक ग्रंथोंका अंग्रेजीमें अनुवाद हो गया है।