भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

निरूपणके पंथभी भिन्न भिन्न हो गये हैं। किसीभी शास्त्रको लीजिये; उसके विषयोंकी चर्चा साधारणतः तीन प्रकारसे की जाती है। (१) इस जड़ सृष्टिके पदार्थ ठीक वैसेही हैं, जैसे कि वे हमारी इंद्रियोंको गोचर होते हैं। इसके परे उनमें और कुछ नहीं है - इस दृष्टिसे उनके विषयमें विचार करनेकी एक पद्धति है, जिसे आधिभौतिक विवेचन कहते हैं। उदाहरणार्थ, सूर्यको देवता न मानकर केवल पांचभौतिक जड़ पदार्थोंका एक गोला माने; और उष्णता, प्रकाश, वजन दूरी, और आकर्षण इत्यादि उसके केवल गुणधर्मोहीकी परीक्षा करें; तो उसे सूर्यका आधिभौतिक विवेचन कहेंगे। दूसरा उदाहरण पेड़का लीजिये। इसका विचार न करके, कि पेड़के पत्ते निकलना, फूलना, फलना आदि क्रियाएँ किस अंतर्गत शक्तिके द्वारा होती हैं, जब केवल बाहरी दृष्टिसे विचार किया जाता है, कि जमीनमें बीज बोनेसे अंकुर फूटते हैं, फिर वे बढ़ते हैं; और उसीसे पत्ते, शाखा, फूल इत्यादि दृश्य विकार प्रकट होते हैं, तब उसे पेड़का आधिभौतिक विवेचन कहते हैं। रसायनशास्त्र, पदार्थविज्ञानशास्त्र, विद्युच्छास्त्र इत्यादि आधुनिक शास्त्रोंका विवेचन इसी ढंगका होता है। ओर तो क्या, आधिभौतिक पंडितभीको यह मानते हैं, कि उक्त रीतिसे किसी वस्तुके दृश्य गुणोंका विचार कर लेनेपर उनका काम पूरा हो जाता है - सृष्टिके पदार्थोंका इससे अधिक विचार करना निष्फल है। (२) जब उक्त दृष्टिको छोड़कर इस बातका विचार किया जाता है, कि जड़ सृष्टिके पदार्थोंके मूलमें क्या है; क्या, इन पदार्थोंका व्यवहार केवल उनके गुण-धर्मोहीसे होता है, या उसके लिये किसी तत्त्वका आधारभी है; तो केवल आधिभौतिक विवेचनसेही काम नहीं चलता, हमको कुछ आगे बढ़ना पड़ता है। उदाहरणार्थ, जब हम यह मानते हैं, कि पांचभौतिक सूर्यके जड़ या अचेतन गोलेमें सूर्य नामक एक देवताका अधिष्ठान है; और इसीके द्वारा इस अचेतन गोले (सूर्य) के सब व्यापार या व्यवहार होते रहते हैं, तब उसको उस विषयका आधिदैविक विवेचन कहते हैं। इस मतके अनुसार यह माना जाता है, कि पेड़में, पानीमें, हवामें अर्थात् सब पदार्थोंमें, अनेक देवता हैं; जो उन जड तथा अचेतन पदार्थोंसे भिन्न तो हैं, किंतु उनके व्यवहारोंको वे ही चलाते हैं। (३) परंतु जब यह माना जाता है, कि सृष्टिके हजारों जड़ पदार्थोंमें हजारों स्वतंत्र देवता नहीं हैं; किंतु बाहरी सृष्टिके सब व्यवहारोंको चलानेवाली, मनुष्यके शरीरमें आत्मस्वरूपसे रहनेवाली, और मनुष्यको सारी सृष्टिका ज्ञान प्राप्त करा देनेवाली एकही चित्-शक्ति है,. जो कि इंद्रियातीत है ओर जिसके द्वाराही इस जगतका सारा व्यवहार चल रहा है; तब उस विचार-पद्धतिको आध्यात्मिक विवेचन कहते हैं। उदाहरणार्थ, अध्यात्मवादियोंका मत है, कि सूर्य- चंद्र आदिका व्यवहार, यहाँतक कि वृक्षोंके पत्तोंका हिलनाभी, इसी अचित्य शक्तिकी प्रेरणासे हुआ करता है। सूर्य-चंद्र आदिमें या अन्य स्थानोंमें भिन्न भिन्न तथा स्वतंत्र देवता नहीं हैं। प्राचीन कालसे किसीभी विषयका विवेचन करनेके