भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

कर्मयोगशास्त्र ६१ सांख्य अथवा संन्यास मार्ग – अर्थात् वह मार्ग जिसका ज्ञान होनेपर कर्म करना छोड़ कर विरक्त होकर रहना पड़ता है; और दूसरा योग अथवा कर्ममार्ग – अर्थात् वह मार्ग, जिसमें कर्मोंका त्याग न करके ऐसी युक्तिसे नित्य कर्म करते रहना चाहिये जिससे मोक्ष-प्राप्तिमें कुछभी बाधा न हो। पहले मार्गका दूसरा नाम ‘ज्ञाननिष्ठा'भी है, जिसका विवेचन उपनिषदोंमें अनेक ऋषियोंने और ग्रंथकारोंनेभी किया है। परंतु ब्रह्मविद्याके अंतर्गत कर्मयोगका या योगशास्त्रका तात्त्विक विवेचन भगवद्गीताके सिवा अन्य ग्रंथोंमें नहीं है। इस बातका उल्लेख पहले किया जा चुका है, कि अध्याय-समाप्ति-दर्शक संकल्प गीताकी सब प्रतियोंमें पाया जाता है; और इससे प्रकट होता है, कि गीताकी सभी टीकाओंके रचे जानेके पहलेही उसकी रचना हुई होगी। इस संकल्पके रचयिताने इस संकल्पमें “ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे” इन दो पदोंको व्यर्थही नहीं जोड़ दिया है; किंतु उसने गीताशास्त्रके प्रतिपाद्य विषयकी अपूर्वता दिखानेहीके लिये उक्त पदोंको उस संकल्पमें माधार और हेतुसहित स्थान दिया है। अतः इस बातकाभी सहज निर्णय हो सकता है, कि गीतापर अनेक सांप्रदायिक टीकाओंके होनेके पहले गीताका तात्पर्य कैसे और क्या समझा जाता था। यह हमारे सौभाग्यकी बात है, कि इस कर्मयोगका प्रतिपादन स्वयं भगवान् श्रीकृष्णहीने किया है, जो इस योगमार्गके प्रवर्तक और सब योगोंके साक्षात् ईश्वर (योगेश्वर = योग × ईश्वर) हैं; और लोकहितके लिये उन्होंने अर्जुनको उसका रहस्य बतलाया है। गीताके 'योग' और 'योगशास्त्र' शब्दोंसे हमारे ‘कर्मयोग' और 'कर्मयोगशास्त्र' शब्द कुछ बड़े हैं सही; परंतु अब हमने कर्मयोगशास्त्र सरीखा बड़ा नामही इस ग्रंथ और प्रकरणको देना इसलिये पसंद किया है, कि जिससे गीताके प्रतिपाद्य विषयके संबंधमें कुछभी संदेह न रह जावे। एकही कर्म करनेके जो अनेक योग, साधन या मार्ग हैं, उनमेंसे सर्वोत्तम और शुद्ध मार्ग कौन है; उसके अनुसार नित्य आचरण किया जा सकता है या नहीं; नहीं किया जा सकता, तो कौन कौन अपवाद उत्पन्न होते हैं, और वे क्यों उत्पन्न होते हैं; जिस मार्गको हमने उत्तम मान लिया है, वह उत्तम क्यों हैं; जिस मार्गको हम बुरा समझते हैं, वह बुरा क्यों है; यह अच्छापन या बुरापन किसके द्वारा या किस आधारपर निश्चित किया जा सकता है; अथवा इस अच्छेपन या बुरेपनका रहस्य क्या है – इत्यादि बातें जिस शास्त्रके आधारसे निश्चित की जाती हैं, उसको ‘कर्मयोगशास्त्र' या गीताके संक्षिप्त रूपानुसार 'योगशास्त्र' कहते हैं। 'अच्छा' और 'बुरा' दोनों साधारण शब्द हैं। इन्हींके समान अर्थमें कभी कभी शुभ-अशुभ, हितकर-अहितकर, श्रेयस्कर-अश्रेयस्कर, पाप-पुण्य, धर्म्य-अधर्म्य इत्यादि शब्दोंका उपयोग हुआ करता है। कार्य-अकार्य, कर्तव्य-अकर्तव्य, न्याय्य- अन्याय्य इत्यादि शब्दोंकाभी अर्थ वैसेही होता है। तथापि इन शब्दोंका उपयोग करनेवालोंके सृष्टिरचनाविषयक मत भिन्न भिन्न होनेके कारण 'कर्मयोग'शास्त्रके