भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गीतामें 'योग' शब्द प्रवृत्तिमार्ग अर्थात् 'कर्मयोग'के अर्थहीमें प्रयुक्त हुआ है। वैदिक धर्म-ग्रंथोंकी कौन कहे, यह 'योग' शब्द, पाली और संस्कृत भाषाओंके बौद्ध- धर्म-ग्रंथोंमेंभी, इसी अर्थमें प्रयुक्त है। उदाहरणार्थ, संवत् ३३५ के लगभग लिखे 'मिलिंदप्रश्न' नामक पालीग्रंथमें 'पुब्बयोगो' (पूर्वयोग) शब्द आया है; और वहाँ उसका अर्थ 'पुब्बकम्म' ( पूर्वकर्म ) किया गया है (मि. प्र. १. ४)। इसी तरह अश्वघोष कविकृत-जो शालिवाहन शकके आरंभमें हो गया है-'बुद्धचरित' नामक संस्कृत काव्यके पहले सर्गके पचासवें श्लोकमें यह वर्णन है - आचार्यकं योगविधौ द्विजानामप्राप्तमन्यैर्जनको जगाम । अर्थात् “ब्राह्मणोंको योगविधिकी शिक्षा देने राजा जनक आचार्य ( उपदेष्टा ) हो गये। इनके पहले यह आचार्यत्व किसीकोभी प्राप्त नहीं हुआ था”। यहाँपर 'योग-विधि'का अर्थ निष्काम-कर्मयोगकी विधिही समझना चाहिये। क्योंकि गीता आदि अनेक ग्रंथ मुक्त कंठसे कह रहे हैं कि जनकजीके बर्तावका यही रहस्य है; और अश्वघोषने अपने 'बुद्धचरित' (मु. च. ९.१९ और २०) में यह दिखलानेके लिये, कि “गृहस्थाश्रममें रहकरभी मोक्षकी प्राप्ति कैसे की जा सकती है" जनक- हीका उदाहरण दिया है। जनकके दिखलाये हुए मार्गका नाम 'योग' था; और यह बात बौद्ध-धर्म-ग्रंथोंसेभी सिद्ध होती है। इसलिये गीताके 'योग' शब्दकाभी यही अर्थ लगाना पड़ता है। क्योंकि गीताहीके कथनानुसार ( गीता ३.२० ) जनककाही मार्ग उसमें प्रतिपादित किया गया है। सांख्य और योग इन दो मार्गोंके विषयमें अधिक विचार आगे किया जाएगा। प्रस्तुत प्रश्न यही है, कि गीतामें 'योग' शब्दका उपयोग किस अर्थमें किया गया है। जब एक बार यह सिद्ध हो गया कि गीतामें 'योग'का प्रधान अर्थ कर्मयोग और 'योगी'का प्रधान अर्थ कर्मयोगी है, तो फिर यह कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि भगवद्गीताका प्रतिपाद्य विषय क्या है। स्वयं भगवान् अपने उपदेशको 'योग' कहते हैं ( गीता ४.१-३ ); बल्कि छठे ( गीता ६. ३३ ) अध्यायमें अर्जुनने और गीताके अंतिम उपसंहार (गीता १८.७५) में संजयनेभी गीताके उपदेशको 'योग'ही कहा है। इसी तरह गीताके प्रत्येक अध्यायके अंतमें, जो अध्याय-समाप्ति- दर्शक संकल्प है, उसमेंभी साफ़ साफ़ कह दिया है, कि गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय 'योगशास्त्र'ही है। परंतु जान पड़ता है, कि उक्त संकल्पके शब्दोंके अर्थपर टीकाकारोंने ध्यान नहीं दिया। आरंभके दो पदों - “ श्रीमद्भगवद्गीतासु उप- निषत्सु 'के बाद इस संकल्पमें दो शब्द “ ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे " औरभी जोड़े गये हैं। पहले दो शब्दोंका अथ है- “भगवानसे गाये गये उपनिषदमें”; और पिछले दो शब्दोंका अर्थ “ब्रह्मविद्याका योगशास्त्र अर्थात् कर्मयोग-शास्त्र" है, जो कि इस गीताका विषय है। ब्रह्मविद्या और ब्रह्मज्ञान एकही बात है; और इसके प्राप्त हो जानेपर ज्ञानी पुरुषके लिये दो निष्ठाएं या मार्ग खुले होते हैं (गीता ३.३)। एक