श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] कर्मयोगशास्त्र ५९
कर्मयोगी बन जा।" क्योंकि यह कहनाही संभव नहीं कि, "तू पातंजल योगका आश्रय लेकर युद्धके लिये तैयार रह।" इसके पहलेही साफ़ साफ़ कहा गया है, कि "कर्मयोगेण योगिनाम्" (गीता ३. ३) अर्थात् योगी पुरुष कर्म करनेवाले होते हैं। महाभारतके (मभा. शां. ३४८. ५६) नारायणीय अथवा भागवत धर्मके विवेचनमेंभी कहा गया है, कि इस धर्मके लोग अपने कर्मोंका त्याग किये बिनाही युक्तिपूर्वक कर्म करके (सुप्रयुक्तेन कर्मणा) परमेश्वरकी प्राप्ति कर लेते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है, कि 'योगी' और 'कर्मयोगी' दोनों शब्द गीतामें समानार्थक हैं; और इनका अर्थ "युक्तिसे कर्म करनेवाला" होता है; तथा 'कर्मयोग' शब्दका प्रयोग करनेके बदले, गीता और महाभारतमें छोटेसे 'योग' शब्दकाही अधिक उपयोग किया गया है। "मैंने तुझे जो यह योग बतलाया है, इसीको पूर्वकालमें विवस्वानसे कहा था (गीता ४. १); और विवस्वानने मनुको बतलाया था; परंतु उस योगके बादमें नष्टसा हो जानेपर फिर वही योग तुझसे कहना पड़ा" - इस अवतरणमें भगवानने जो 'योग' शब्दका तीन बार उच्चारण किया है, उसमें पातंजल-योगका विवक्षित होना नहीं पाया जाता; किंतु "कर्म करनेकी किसी प्रकारकी विशेष युक्ति, साधन या मार्ग" अर्थ ही लिया जा सकता है। इसी तरह जब संजय गीताके कृष्ण-अर्जुन संवादको 'योग' कहता है। (गीता १८.७५) तबभी यही अर्थ पाया जाता है। श्रीशंकराचार्य स्वयं संन्यासमार्गवाले थे। तोभी उन्होंने अपने गीता- भाष्यके आरंभमेंही वैदिकधर्मके दो भेद - प्रवृत्ति और निवृत्ति - बतलाये हैं; और 'योग' शब्दका अर्थ श्रीभगवानकी की हुई व्याख्याके अनुसार कभी 'सम्यक्- दर्शनोपायकर्मानुष्ठानम्' (गीता ४४. २) और कभी "योगः युक्तिः" (गीता १०.७) किया है। इसी तरह महाभारतमेंभी 'योग' और 'ज्ञान' दोनों शब्दोंके विषयमें स्पष्ट लिखा है, कि "प्रवृत्तिलक्षणो योगः ज्ञानं संन्यासलक्षणम्" (मभा. अश्व. ४३.२५)। अर्थात् योगका अर्थ प्रवृत्तिमार्ग और ज्ञानका अर्थ संन्यास या निवृत्ति- मार्ग है। शांतिपर्वके अंतमें, नारायणीयोपाख्यानमें 'सांख्य' और 'योग' शब्द तो इसी अर्थमें अनेक बार आये हैं; और इसकाभी वर्णन किया गया है, कि ये दोनों मार्ग सृष्टिके आरंभमें भगवानने क्यों और कैसे निर्माण किये। (मभा. शां. २४० और ३४८)। पहले प्रकरणमें महाभारतसे जो वचन उद्धृत किये गये हैं, उनसे यह स्पष्टतया मालूम हो गया है, कि यही नारायणीय अथवा भागवतधर्म भगवद्गीताका प्रतिपाद्य तथा प्रधान विषय है। इसलिये कहना पड़ता है, कि 'सांख्य' और 'योग' शब्दोंका जो प्राचीन और पारिभाषिक अर्थ (सांख्य = निवृत्ति; योग = प्रवृत्ति) नारायणीय धर्ममें दिया गया है, वही अर्थ गीतामेंभी विवक्षित है। यदि इसमें किसीको शंका हो, तो गीतामें दी हुई इस व्याख्यासे - "समत्वं योग उच्यते" या "योगः कर्मसु कौशलम्" - तथा उपर्युक्त "कर्मयोगेन योगिनाम्" इत्यादि गीताके वचनोंसे उसे शंकाका समाधान हो सकता है। इसलिये अब यह निर्विवाद सिद्ध है, कि