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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बुद्धि फलाशासे कैसे व्यग्र हो जाती है (गीता २.४१-४६)। इसके पश्चात् उन्होंने यह उपदेश दिया है, कि बुद्धिको अव्यग्र, स्थिर या शांत रखकर, “आसक्तिको छोड़ दे; परंतु कर्मोंको छोड़ देनेके आग्रहमें न पड़” और “योगस्थ होकर कर्मोंका आचरण कर” (गीता २.४८)। यहींपर पहले पहल 'योग' शब्दका अर्थभी स्पष्ट कर दिया है, कि “सिद्धि और असिद्धि दोनोंमें समत्वबुद्धि रखनेको योग कहते हैं।” इसके बाद यह कहकर, कि “फलकी आशासे काम करनेकी अपेक्षा समत्वबुद्धिका यह योगही श्रेष्ठ है” (गीता २.४९) और बुद्धिकी समता हो जानेपर कर्म करनेवालेको कर्मसंबंधी पाप-पुण्यकी बाधा नहीं होती। इसलिये तू इस 'योग'को प्राप्त कर।' तुरंतही योगका यह लक्षण फिरभी बतलाया है कि “योगः कर्मसु कौशलम्” (गीता २.५०)। इससे सिद्ध होता है, कि पाप-पुण्यसे अलिप्त रहकर कर्म करनेकी जो समत्वबुद्धिरूप विशेष युक्ति पहले बतलाई गई है, वही 'कौशल' है; और इसी कुशलता अर्थात् युक्तिसे कर्म करनेको गीतामें 'योग' कहा है। इसी अर्थको अर्जुनने आगे चलकर “योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन” (गीता ६.३३) – समताका अर्थात् समत्व-बुद्धिका यह योग जो आपने बतलाया – इस श्लोकमें स्पष्ट कर दिया है। इसके संबंधमें, कि ज्ञानी मनुष्यको इस संसारमें कैसे बर्ताव करना चाहिये, श्रीशंकराचार्यके पूर्वही प्रचलित हुए वैदिक धर्मके अनुसार दो मार्ग हैं : एक मार्ग यह है, कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर सब कर्मोंका संन्यास अर्थात् त्यागकर दें; और दूसरा यह, कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जाने परभी कर्मोंको न छोड़ें – उनको जन्मभर ऐसी युक्ति के साथ करते रहें, कि उनके पाप-पुण्यकी बाधा न होने पावे। इन्हीं दो मार्गोंको गीतामें संन्यास और कर्म-योग कहा है (गीता ५.२)। संन्यास कहते हैं त्यागको, और योग कहते हैं मेल को। अर्थात् कर्मके त्याग और कर्मके मेलहीके उक्त दो भिन्न मार्ग हैं। इन्हीं दो भिन्न मार्गोंको लक्ष्य करके आगे (गीता ५.४) (सांख्य और योग) 'सांख्ययोगी' ये संक्षिप्त नामभी दिये गये हैं। बुद्धिको स्थिर करनेके लिये पातंजलयोग-शास्त्रके आसनोंका वर्णन छठे अध्यायमें है सही; परंतु वह किसके लिये है? तपस्वीके लिये नहीं; किंतु वह कर्मयोगी - अर्थात् युक्तिपूर्वक कर्म करनेवाले मनुष्यको 'समता' की युक्ति सिद्ध करनेके लिये बतलाया गया है। नहीं तो फिर “तपस्विभ्योऽधिको योगी” इस वाक्यका कुछ अर्थ ही नहीं हो सकता। इसी तरह इस अध्यायके अंत (६.४६) में अर्जुनको जो उपदेश दिया गया है, कि 'तस्माद्योगी भवार्जुन' उसका अर्थ ऐसा नहीं हो सकता, कि “हे अर्जुन ! तू पातंजल-योगका अभ्यास करनेवाला बन जा।” इसलिये उक्त उपदेशका अर्थ “योगस्थः कुरु कर्माणि” (२.४८), “तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्” (गीता २.५०), 'योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत' (४.४२) इत्यादि वचनोंके अर्थके समानही होना चाहिये। अर्थात् उसका यही अर्थ लेना उचित है कि, “हे अर्जुन ! तू युक्तिसे कर्म करनेवाला योगी अर्थात्