श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मयोगशास्त्र ५७ है। सिर्फ 'युक्ति, साधन, कुशलता, उपाय, जोड़, मेल' ये ही अर्थ कुछ हेरफेरसे सारी गीतामें पाये जाते हैं। अतएव कह सकते हैं, कि गीताशास्त्रके व्यापक शब्दोंमेंसे 'योग'भी एक शब्द है; परंतु योग शब्दके उक्त सामान्य अर्थोंसेही - जैसे साधन, कुशलता, युक्ति आदिसेही - काम नहीं चल सकता। क्योंकि वक्ता इच्छाके अनुसार यह साधन संन्यासकाभी हो सकता है; कर्म और चित्तनिरोधका हो सकता है; मोक्षका अथवा औरभी किसीका हो सकता है। उदाहरणार्थ, गीतामें कहीं कहीं अनेक प्रकारकी व्यक्त सृष्टि निर्माण करनेकी भगवानकी ईश्वरी कुशलता और अद्भुत सामर्थ्यको 'योग' कहा गया है (गीता ७. २५; ९. ५; १०. ७; ११. ८) और इसी अर्थमें भगवानको 'योगेश्वर' कहा है (गीता १८. ७५)। परंतु यह गीताके 'योग' शब्दका मुख्य अर्थ नहीं है। इसलिये, वह बात स्पष्ट रीतिसे प्रकटकर देनेके लिये 'योग' शब्दसे किस विशेष प्रकारकी कुशलता, साधन, युक्ति अथवा उपायको गीतामें विवक्षित समझना चाहिये, उस ग्रंथमें योग शब्दकी व्याख्या- यों की गयी है - "योगः कर्मसु कौशलम्" (गीता २. ५०) अर्थात् कर्म करनेकी किसी विशेष प्रकारकी कुशलता, युक्ति, चतुराई अथवा शैलीको योग कहते हैं। शांकरभाष्यमेंभी 'कर्मसु कौशलम्' का यही अर्थ लिया गया है- "कर्ममें स्वभावसिद्ध रहनेवाले बंधकत्वको तोड़नेकी युक्ति"। यदि सामान्यतः देखा जाय, तो एकही कर्मको करनेके लिये अनेक 'योग' या 'उपाय' होते हैं। परंतु उनमेंसे जो उपाय या साधन उत्तम हो उसीको 'योग' कहते हैं। जैसे द्रव्य उपार्जन करना एक कर्म है। इसके अनेक उपाय या साधन हैं- जैसे : चोरी करना, जालसाजी करना, भीख मांगना, सेवा करना, ऋण लेना, मेहनत करना आदि। यद्यपि धातुके अर्थानुसार इनमेंसे हरएकको 'योग' कह सकते हैं, तथापि यथार्थ 'द्रव्यप्राप्ति-योग' उसी उपाय कहते हैं, जिससे हम अपनी "स्वतंत्रता कायम रखकर मेहनत करते हुए धन प्राप्त कर सके।" जब स्वयं भगवानने गीतामें 'योग' शब्दकी निश्चित और स्वतंत्र व्याख्या कर दी है (योगः कर्मसु कौशलम् - अर्थात् कर्म करनेकी एक प्रकारकी विशेष युक्तिको योग कहते हैं), तब सच पूछो, तो इस शब्दके मुख्य अर्थके विषयमें कुछभी शंका नहीं रहनी चाहिये; परंतु स्वयं भगवानकी बतलाई हुई इस व्याख्यापर ध्यान न दे कर टीकाकारोंने गीताका मथितार्थभी मनमाना निकाला है। अतएव इस भ्रमको दूर करनेके लिये 'योग' शब्दका कुछ अधिक स्पष्टीकरण होना चाहिये। यह शब्द पहलेपहल गीताके दूसरे अध्यायमें आया है; और वहीं इसका स्पष्ट अर्थभी बतला दिया है। भगवानने अर्जुनको पहले सांख्यशास्त्रके अनुसार यह समझा दिया, कि युद्ध क्यों करना चाहिये; इसके बाद उन्होंने कहा, कि "अब हम तुझे योगके अनुसार उपपत्ति बतलाते हैं" (गीता २. ३९)। और फिर इसका वर्णन किया है, कि जो लोग हमेशा यज्ञ-यागादि काम्य कर्मोंमें निमग्न रहते हैं और उनकी