श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चाहिये; किंतु उससे अधिक व्यापक रूप लेना चाहिये । सारांश, मनुष्य जो कुछ करता है – जैसे खाना, पीना, खेलना, रहना, उठना, बैठना, श्वोसोच्छ्वास करना, हँसना, रोना, सूंघना, देखना, बोलना, सुनना, चलना, देना, लेना, सोना, जागना, मारना, लड़ना, मनन और ध्यान करना, आज्ञा या निषेध करना, दान देना, यज्ञ-याग करना, खेती या व्यापारधंधा करना, इच्छा करना, निश्चय करना, चुप रहना इत्यादि इत्यादि – ये सब भगवद्गीताके अनुसार 'कर्म' ही हैं; चाहे वे कर्म कायिक हों, वाचिक हों अथवा मानसिक हों (गीता ५. ८, ९)। और तो क्या, जीना-मरनाभी कर्मही हैं । प्रसंग आनेपर यहभी विचार करना पड़ता ह कि 'जीना या मरना' इन दो कर्मोंमेंसे किसका स्वीकार किया जाये ? इस विचारके उपस्थित होनेपर कर्म शब्दका अर्थ 'कर्तव्य कर्म' अथवा 'विहित कर्म' हो जाता है । (गीता ४. १६) । मनुष्यके कर्मके विषयमें यहाँतक विचार हो गया । अब इससे आगे बढ़कर सब चर-अचर सृष्टिके – अचेतन वस्तुकेभी – व्यापारमें 'कर्म' शब्दहीका उपयोग होता है । इस विषयका विचार आगे कर्मविपाक-प्रक्रियामें किया जाएगा । कर्म शब्दसेभी अधिक भ्रमकारक शब्द 'योग' है । आजकल इस शब्दका रूढ़ार्थ "प्राणायामादिक साधनोंसे चित्तवृत्तियों या इंद्रियोंका निरोध करना" अथवा "पातंजल सूत्रोक्त समाधि या ध्यानयोग" हैं । उपनिषदोंमेंभी इसी अर्थमें इस शब्दका प्रयोग हुआ है (कठ. ६. ११)। परंतु ध्यानमें रखना चाहिये, कि ये संकुचित अर्थ भगवद्गीतामें विवक्षित नहीं है । 'योग' शब्द 'युज्' धातुसे बना है; जिसका अर्थ "जोड़, मेल, मिलाप, एकता, एकत्र अवस्थिति" इत्यादि होता है । और ऐसी स्थितिकी प्राप्तिके "उपाय, साधन, युक्ति या कर्म" कोभी योग कहते हैं । यही सब अर्थ अमरकोश (अ. ३. ३. २२) में इस तरहसे दिये हुए हैं – "योगः संहननोपायध्यानसंगतियुक्तिषु ।" फलित ज्योतिषमें कोई ग्रह यदि इष्ट अथवा अनिष्ट हों, तो उन ग्रहोंका 'योग' इष्ट या अनिष्ट कहलाता है; और 'योगक्षेम' पदमें 'योग' शब्दका अर्थ "अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करना" लिया गया है (गीता ९. २२) । भारतीय युद्धके समय द्रोणाचार्यको अजेय देखकर श्रीकृष्णने कहा है, कि "एको हि योगोऽस्य भवेद्वधाय" (मभा. द्रो. १८१. ३१) अर्थात् द्रोणाचार्य को जीतनेका एकही 'योग' (साधना या युक्ति) है; और आगे चलकर उन्होंने यहभी कहाना है कि हमने पूर्वकालमें धर्मकी रक्षाके लिये जरासंध आदि राजाओंको 'योग' हीसे मारा था । उद्योगपर्व (अ. १७२) में कहा गया है, कि जब भीष्मने अंबा, अंबिका और अंबालिकाको हरण किया, तब अन्य राजा लोग 'योग, योग' कहकर उनका पीछा करने लगे थे । महाभारतमें 'योग' शब्दका प्रयोग इसी अर्थमें अनेक स्थानोंपर हुआ है । गीतामें 'योग', 'योगी' अथवा योग शब्दसे बने हुए सामासिक शब्द लगभग अस्सी बार आये हैं; परंतु चार-पाँच स्थानोंको छोड़ (गीता ६. १२ और २३) योग शब्दसे 'पातंजल योग' अर्थ कहींभी अभिप्रेत नहीं