श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर्मयोगशास्त्र ५५ धार्मिक कर्म हैं; जैसे व्रत, उपवास आदि । इनका विस्तृत प्रतिपादन पहलेपहल सिर्फ़ पुराणोंमें किया गया है, इसलिये इन्हें 'पौराणिक कर्म' कह सकेंगे । इन सब कर्मोंके औरभी तीन - नित्य, नैमित्तिक और काम्य - भेद किये गये हैं। स्नान, संध्या आदि जो हमेशा किये जानेवाले कर्म हैं, उन्हें नित्यकर्म कहते हैं । इनके करनेसे कुछ विशेष फल अथवा अर्थकी सिद्धि नहीं होती; परंतु न करनेसे दोष अवश्य लगता है । नैमित्तिक कर्म उन्हें कहते हैं, जिन्हें किसी कारणके उपस्थित हो जानेसे करना पड़ता है; जैसे अनिष्ट ग्रहोंकी शांति, प्रायश्चित्त आदि, जिसकेलिये हम शांति या प्रायश्चित्त करते हैं, वह निमित्त यदि पहले न हो गया हो, तो हमें नैमित्तिक कर्म करनेकी कोई आवश्यकता नहीं। जब हम कुछ विशेष इच्छा रखकर उसकी सफलताके लिये शास्त्रानुसार कोई कर्म करते हैं, तब उसे काम्य कर्म कहते हैं; जैसे वर्षा होनेके लिये या पुत्रप्राप्तिके लिये यज्ञ करना । नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्मोंके सिवा कुछ और कर्म हैं; जैसे मदिरापान इत्यादि, जिन्हें शास्त्रोंने त्याज्य कहा है। इसलिये ये कर्म निषिद्ध कहलाते हैं। नित्य कर्म कौन कौन हैं, नैमित्तिक कौन कौन हैं और काम्य तथा निषिद्ध कर्म कौन कौन हैं - ये सब बातें धर्मशास्त्रोंमें निश्चित कर दी गयी हैं। यदि कोई किसी धर्मशास्त्रीसे पूछे कि अमुक पुरुषका कर्म पुण्यप्रद है या पापकारक, तो वह सबसे पहले इस बातका विचार करेगा, कि शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार वह कर्म यज्ञार्थ है या पुरुषार्थ; नित्य है या नैमित्तिक; अथवा काम्य है या निषिद्ध; और इन बातोंका विचार करके फिर वह अपना निर्णय करेगा। परंतु भगवद्गीताकी दृष्टि उससेभी व्यापक और विस्तीर्ण है। मान लीजिये, कि अमुक एक कर्म शास्त्रोंमें निषिद्ध नहीं माना गया है; अथवा उसे विहित कर्मही कहा गया है - जैसे युद्धके समय क्षात्रधर्मही अर्जुनके लिये विहित कर्म था । पर इतनेहीसे यह सिद्ध नहीं होता, कि हमें वह कर्म हमेशा करतेही रहना चाहिये; अथवा उस कर्मका करना हमेशा श्रेयस्करही होगा। यह बात पिछले प्रकरणमें कही गयी है, कि कहीं कहीं तो शास्त्रकी आज्ञाएँभी परस्पर-विरुद्ध होती हैं। ऐसे समयमें मनुष्यको किम मार्ग स्वीकार करना चाहिये, इस बातका निर्णय करनेके लियें कोई युक्ति है या नहीं ? यदि है तो वह कौन-सी ? बस, यही गीताका प्रतिपाद्य विषय है। इस विषयमें कर्मके उपर्युक्त अनेक भेदोंपर ध्यान देनेकी कोई आवश्यकता नहीं। यज्ञ-याग आदि वैदिक कर्मों तथा चातुर्वर्ण्यके कर्मोंके विषयमें मीमांसकोंने जो सिद्धान्त किये हैं, वे गीतामें प्रतिपादित कर्मयोगसे कहाँतक मिलते हैं, यह दिखानेके लिये प्रसंगानुसार गीतामें मीमांसकोंके कथनकाभी कुछ विचार किया गया है; और अंतिम अध्याय (गीता १८. ६) में इसपरभी विचार किया है, कि ज्ञानी पुरुषको यज्ञयाग आदि कर्म करना चाहिये या नहीं। परंतु गीताके मुख्य प्रतिपाद्य विषयका क्षेत्र इससे व्यापक है । इसलिये गीताके प्रतिपादनमें 'कर्म' शब्दका "केवल श्रौत अथवा स्मार्त कर्म" इतनाही संकुचित अर्थ नहीं लिया जाना