श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
कर्मयोगशास्त्र ५५ धार्मिक कर्म हैं; जैसे व्रत, उपवास आदि । इनका विस्तृत प्रतिपादन पहलेपहल सिर्फ़ पुराणोंमें किया गया है, इसलिये इन्हें 'पौराणिक कर्म' कह सकेंगे । इन सब कर्मोंके औरभी तीन - नित्य, नैमित्तिक और काम्य - भेद किये गये हैं। स्नान, संध्या आदि जो हमेशा किये जानेवाले कर्म हैं, उन्हें नित्यकर्म कहते हैं । इनके करनेसे कुछ विशेष फल अथवा अर्थकी सिद्धि नहीं होती; परंतु न करनेसे दोष अवश्य लगता है । नैमित्तिक कर्म उन्हें कहते हैं, जिन्हें किसी कारणके उपस्थित हो जानेसे करना पड़ता है; जैसे अनिष्ट ग्रहोंकी शांति, प्रायश्चित्त आदि, जिसकेलिये हम शांति या प्रायश्चित्त करते हैं, वह निमित्त यदि पहले न हो गया हो, तो हमें नैमित्तिक कर्म करनेकी कोई आवश्यकता नहीं। जब हम कुछ विशेष इच्छा रखकर उसकी सफलताके लिये शास्त्रानुसार कोई कर्म करते हैं, तब उसे काम्य कर्म कहते हैं; जैसे वर्षा होनेके लिये या पुत्रप्राप्तिके लिये यज्ञ करना । नित्य, नैमित्तिक और काम्य कर्मोंके सिवा कुछ और कर्म हैं; जैसे मदिरापान इत्यादि, जिन्हें शास्त्रोंने त्याज्य कहा है। इसलिये ये कर्म निषिद्ध कहलाते हैं। नित्य कर्म कौन कौन हैं, नैमित्तिक कौन कौन हैं और काम्य तथा निषिद्ध कर्म कौन कौन हैं - ये सब बातें धर्मशास्त्रोंमें निश्चित कर दी गयी हैं। यदि कोई किसी धर्मशास्त्रीसे पूछे कि अमुक पुरुषका कर्म पुण्यप्रद है या पापकारक, तो वह सबसे पहले इस बातका विचार करेगा, कि शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार वह कर्म यज्ञार्थ है या पुरुषार्थ; नित्य है या नैमित्तिक; अथवा काम्य है या निषिद्ध; और इन बातोंका विचार करके फिर वह अपना निर्णय करेगा। परंतु भगवद्गीताकी दृष्टि उससेभी व्यापक और विस्तीर्ण है। मान लीजिये, कि अमुक एक कर्म शास्त्रोंमें निषिद्ध नहीं माना गया है; अथवा उसे विहित कर्मही कहा गया है - जैसे युद्धके समय क्षात्रधर्मही अर्जुनके लिये विहित कर्म था । पर इतनेहीसे यह सिद्ध नहीं होता, कि हमें वह कर्म हमेशा करतेही रहना चाहिये; अथवा उस कर्मका करना हमेशा श्रेयस्करही होगा। यह बात पिछले प्रकरणमें कही गयी है, कि कहीं कहीं तो शास्त्रकी आज्ञाएँभी परस्पर-विरुद्ध होती हैं। ऐसे समयमें मनुष्यको किम मार्ग स्वीकार करना चाहिये, इस बातका निर्णय करनेके लियें कोई युक्ति है या नहीं ? यदि है तो वह कौन-सी ? बस, यही गीताका प्रतिपाद्य विषय है। इस विषयमें कर्मके उपर्युक्त अनेक भेदोंपर ध्यान देनेकी कोई आवश्यकता नहीं। यज्ञ-याग आदि वैदिक कर्मों तथा चातुर्वर्ण्यके कर्मोंके विषयमें मीमांसकोंने जो सिद्धान्त किये हैं, वे गीतामें प्रतिपादित कर्मयोगसे कहाँतक मिलते हैं, यह दिखानेके लिये प्रसंगानुसार गीतामें मीमांसकोंके कथनकाभी कुछ विचार किया गया है; और अंतिम अध्याय (गीता १८. ६) में इसपरभी विचार किया है, कि ज्ञानी पुरुषको यज्ञयाग आदि कर्म करना चाहिये या नहीं। परंतु गीताके मुख्य प्रतिपाद्य विषयका क्षेत्र इससे व्यापक है । इसलिये गीताके प्रतिपादनमें 'कर्म' शब्दका "केवल श्रौत अथवा स्मार्त कर्म" इतनाही संकुचित अर्थ नहीं लिया जाना
५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चाहिये; किंतु उससे अधिक व्यापक रूप लेना चाहिये । सारांश, मनुष्य जो कुछ करता है – जैसे खाना, पीना, खेलना, रहना, उठना, बैठना, श्वोसोच्छ्वास करना, हँसना, रोना, सूंघना, देखना, बोलना, सुनना, चलना, देना, लेना, सोना, जागना, मारना, लड़ना, मनन और ध्यान करना, आज्ञा या निषेध करना, दान देना, यज्ञ-याग करना, खेती या व्यापारधंधा करना, इच्छा करना, निश्चय करना, चुप रहना इत्यादि इत्यादि – ये सब भगवद्गीताके अनुसार 'कर्म' ही हैं; चाहे वे कर्म कायिक हों, वाचिक हों अथवा मानसिक हों (गीता ५. ८, ९)। और तो क्या, जीना-मरनाभी कर्मही हैं । प्रसंग आनेपर यहभी विचार करना पड़ता ह कि 'जीना या मरना' इन दो कर्मोंमेंसे किसका स्वीकार किया जाये ? इस विचारके उपस्थित होनेपर कर्म शब्दका अर्थ 'कर्तव्य कर्म' अथवा 'विहित कर्म' हो जाता है । (गीता ४. १६) । मनुष्यके कर्मके विषयमें यहाँतक विचार हो गया । अब इससे आगे बढ़कर सब चर-अचर सृष्टिके – अचेतन वस्तुकेभी – व्यापारमें 'कर्म' शब्दहीका उपयोग होता है । इस विषयका विचार आगे कर्मविपाक-प्रक्रियामें किया जाएगा । कर्म शब्दसेभी अधिक भ्रमकारक शब्द 'योग' है । आजकल इस शब्दका रूढ़ार्थ "प्राणायामादिक साधनोंसे चित्तवृत्तियों या इंद्रियोंका निरोध करना" अथवा "पातंजल सूत्रोक्त समाधि या ध्यानयोग" हैं । उपनिषदोंमेंभी इसी अर्थमें इस शब्दका प्रयोग हुआ है (कठ. ६. ११)। परंतु ध्यानमें रखना चाहिये, कि ये संकुचित अर्थ भगवद्गीतामें विवक्षित नहीं है । 'योग' शब्द 'युज्' धातुसे बना है; जिसका अर्थ "जोड़, मेल, मिलाप, एकता, एकत्र अवस्थिति" इत्यादि होता है । और ऐसी स्थितिकी प्राप्तिके "उपाय, साधन, युक्ति या कर्म" कोभी योग कहते हैं । यही सब अर्थ अमरकोश (अ. ३. ३. २२) में इस तरहसे दिये हुए हैं – "योगः संहननोपायध्यानसंगतियुक्तिषु ।" फलित ज्योतिषमें कोई ग्रह यदि इष्ट अथवा अनिष्ट हों, तो उन ग्रहोंका 'योग' इष्ट या अनिष्ट कहलाता है; और 'योगक्षेम' पदमें 'योग' शब्दका अर्थ "अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करना" लिया गया है (गीता ९. २२) । भारतीय युद्धके समय द्रोणाचार्यको अजेय देखकर श्रीकृष्णने कहा है, कि "एको हि योगोऽस्य भवेद्वधाय" (मभा. द्रो. १८१. ३१) अर्थात् द्रोणाचार्य को जीतनेका एकही 'योग' (साधना या युक्ति) है; और आगे चलकर उन्होंने यहभी कहाना है कि हमने पूर्वकालमें धर्मकी रक्षाके लिये जरासंध आदि राजाओंको 'योग' हीसे मारा था । उद्योगपर्व (अ. १७२) में कहा गया है, कि जब भीष्मने अंबा, अंबिका और अंबालिकाको हरण किया, तब अन्य राजा लोग 'योग, योग' कहकर उनका पीछा करने लगे थे । महाभारतमें 'योग' शब्दका प्रयोग इसी अर्थमें अनेक स्थानोंपर हुआ है । गीतामें 'योग', 'योगी' अथवा योग शब्दसे बने हुए सामासिक शब्द लगभग अस्सी बार आये हैं; परंतु चार-पाँच स्थानोंको छोड़ (गीता ६. १२ और २३) योग शब्दसे 'पातंजल योग' अर्थ कहींभी अभिप्रेत नहीं
कर्मयोगशास्त्र ५७ है। सिर्फ 'युक्ति, साधन, कुशलता, उपाय, जोड़, मेल' ये ही अर्थ कुछ हेरफेरसे सारी गीतामें पाये जाते हैं। अतएव कह सकते हैं, कि गीताशास्त्रके व्यापक शब्दोंमेंसे 'योग'भी एक शब्द है; परंतु योग शब्दके उक्त सामान्य अर्थोंसेही - जैसे साधन, कुशलता, युक्ति आदिसेही - काम नहीं चल सकता। क्योंकि वक्ता इच्छाके अनुसार यह साधन संन्यासकाभी हो सकता है; कर्म और चित्तनिरोधका हो सकता है; मोक्षका अथवा औरभी किसीका हो सकता है। उदाहरणार्थ, गीतामें कहीं कहीं अनेक प्रकारकी व्यक्त सृष्टि निर्माण करनेकी भगवानकी ईश्वरी कुशलता और अद्भुत सामर्थ्यको 'योग' कहा गया है (गीता ७. २५; ९. ५; १०. ७; ११. ८) और इसी अर्थमें भगवानको 'योगेश्वर' कहा है (गीता १८. ७५)। परंतु यह गीताके 'योग' शब्दका मुख्य अर्थ नहीं है। इसलिये, वह बात स्पष्ट रीतिसे प्रकटकर देनेके लिये 'योग' शब्दसे किस विशेष प्रकारकी कुशलता, साधन, युक्ति अथवा उपायको गीतामें विवक्षित समझना चाहिये, उस ग्रंथमें योग शब्दकी व्याख्या- यों की गयी है - "योगः कर्मसु कौशलम्" (गीता २. ५०) अर्थात् कर्म करनेकी किसी विशेष प्रकारकी कुशलता, युक्ति, चतुराई अथवा शैलीको योग कहते हैं। शांकरभाष्यमेंभी 'कर्मसु कौशलम्' का यही अर्थ लिया गया है- "कर्ममें स्वभावसिद्ध रहनेवाले बंधकत्वको तोड़नेकी युक्ति"। यदि सामान्यतः देखा जाय, तो एकही कर्मको करनेके लिये अनेक 'योग' या 'उपाय' होते हैं। परंतु उनमेंसे जो उपाय या साधन उत्तम हो उसीको 'योग' कहते हैं। जैसे द्रव्य उपार्जन करना एक कर्म है। इसके अनेक उपाय या साधन हैं- जैसे : चोरी करना, जालसाजी करना, भीख मांगना, सेवा करना, ऋण लेना, मेहनत करना आदि। यद्यपि धातुके अर्थानुसार इनमेंसे हरएकको 'योग' कह सकते हैं, तथापि यथार्थ 'द्रव्यप्राप्ति-योग' उसी उपाय कहते हैं, जिससे हम अपनी "स्वतंत्रता कायम रखकर मेहनत करते हुए धन प्राप्त कर सके।" जब स्वयं भगवानने गीतामें 'योग' शब्दकी निश्चित और स्वतंत्र व्याख्या कर दी है (योगः कर्मसु कौशलम् - अर्थात् कर्म करनेकी एक प्रकारकी विशेष युक्तिको योग कहते हैं), तब सच पूछो, तो इस शब्दके मुख्य अर्थके विषयमें कुछभी शंका नहीं रहनी चाहिये; परंतु स्वयं भगवानकी बतलाई हुई इस व्याख्यापर ध्यान न दे कर टीकाकारोंने गीताका मथितार्थभी मनमाना निकाला है। अतएव इस भ्रमको दूर करनेके लिये 'योग' शब्दका कुछ अधिक स्पष्टीकरण होना चाहिये। यह शब्द पहलेपहल गीताके दूसरे अध्यायमें आया है; और वहीं इसका स्पष्ट अर्थभी बतला दिया है। भगवानने अर्जुनको पहले सांख्यशास्त्रके अनुसार यह समझा दिया, कि युद्ध क्यों करना चाहिये; इसके बाद उन्होंने कहा, कि "अब हम तुझे योगके अनुसार उपपत्ति बतलाते हैं" (गीता २. ३९)। और फिर इसका वर्णन किया है, कि जो लोग हमेशा यज्ञ-यागादि काम्य कर्मोंमें निमग्न रहते हैं और उनकी
५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बुद्धि फलाशासे कैसे व्यग्र हो जाती है (गीता २.४१-४६)। इसके पश्चात् उन्होंने यह उपदेश दिया है, कि बुद्धिको अव्यग्र, स्थिर या शांत रखकर, “आसक्तिको छोड़ दे; परंतु कर्मोंको छोड़ देनेके आग्रहमें न पड़” और “योगस्थ होकर कर्मोंका आचरण कर” (गीता २.४८)। यहींपर पहले पहल 'योग' शब्दका अर्थभी स्पष्ट कर दिया है, कि “सिद्धि और असिद्धि दोनोंमें समत्वबुद्धि रखनेको योग कहते हैं।” इसके बाद यह कहकर, कि “फलकी आशासे काम करनेकी अपेक्षा समत्वबुद्धिका यह योगही श्रेष्ठ है” (गीता २.४९) और बुद्धिकी समता हो जानेपर कर्म करनेवालेको कर्मसंबंधी पाप-पुण्यकी बाधा नहीं होती। इसलिये तू इस 'योग'को प्राप्त कर।' तुरंतही योगका यह लक्षण फिरभी बतलाया है कि “योगः कर्मसु कौशलम्” (गीता २.५०)। इससे सिद्ध होता है, कि पाप-पुण्यसे अलिप्त रहकर कर्म करनेकी जो समत्वबुद्धिरूप विशेष युक्ति पहले बतलाई गई है, वही 'कौशल' है; और इसी कुशलता अर्थात् युक्तिसे कर्म करनेको गीतामें 'योग' कहा है। इसी अर्थको अर्जुनने आगे चलकर “योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन” (गीता ६.३३) – समताका अर्थात् समत्व-बुद्धिका यह योग जो आपने बतलाया – इस श्लोकमें स्पष्ट कर दिया है। इसके संबंधमें, कि ज्ञानी मनुष्यको इस संसारमें कैसे बर्ताव करना चाहिये, श्रीशंकराचार्यके पूर्वही प्रचलित हुए वैदिक धर्मके अनुसार दो मार्ग हैं : एक मार्ग यह है, कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर सब कर्मोंका संन्यास अर्थात् त्यागकर दें; और दूसरा यह, कि ज्ञानकी प्राप्ति हो जाने परभी कर्मोंको न छोड़ें – उनको जन्मभर ऐसी युक्ति के साथ करते रहें, कि उनके पाप-पुण्यकी बाधा न होने पावे। इन्हीं दो मार्गोंको गीतामें संन्यास और कर्म-योग कहा है (गीता ५.२)। संन्यास कहते हैं त्यागको, और योग कहते हैं मेल को। अर्थात् कर्मके त्याग और कर्मके मेलहीके उक्त दो भिन्न मार्ग हैं। इन्हीं दो भिन्न मार्गोंको लक्ष्य करके आगे (गीता ५.४) (सांख्य और योग) 'सांख्ययोगी' ये संक्षिप्त नामभी दिये गये हैं। बुद्धिको स्थिर करनेके लिये पातंजलयोग-शास्त्रके आसनोंका वर्णन छठे अध्यायमें है सही; परंतु वह किसके लिये है? तपस्वीके लिये नहीं; किंतु वह कर्मयोगी - अर्थात् युक्तिपूर्वक कर्म करनेवाले मनुष्यको 'समता' की युक्ति सिद्ध करनेके लिये बतलाया गया है। नहीं तो फिर “तपस्विभ्योऽधिको योगी” इस वाक्यका कुछ अर्थ ही नहीं हो सकता। इसी तरह इस अध्यायके अंत (६.४६) में अर्जुनको जो उपदेश दिया गया है, कि 'तस्माद्योगी भवार्जुन' उसका अर्थ ऐसा नहीं हो सकता, कि “हे अर्जुन ! तू पातंजल-योगका अभ्यास करनेवाला बन जा।” इसलिये उक्त उपदेशका अर्थ “योगस्थः कुरु कर्माणि” (२.४८), “तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्” (गीता २.५०), 'योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत' (४.४२) इत्यादि वचनोंके अर्थके समानही होना चाहिये। अर्थात् उसका यही अर्थ लेना उचित है कि, “हे अर्जुन ! तू युक्तिसे कर्म करनेवाला योगी अर्थात्
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कर्मयोगी बन जा।" क्योंकि यह कहनाही संभव नहीं कि, "तू पातंजल योगका आश्रय लेकर युद्धके लिये तैयार रह।" इसके पहलेही साफ़ साफ़ कहा गया है, कि "कर्मयोगेण योगिनाम्" (गीता ३. ३) अर्थात् योगी पुरुष कर्म करनेवाले होते हैं। महाभारतके (मभा. शां. ३४८. ५६) नारायणीय अथवा भागवत धर्मके विवेचनमेंभी कहा गया है, कि इस धर्मके लोग अपने कर्मोंका त्याग किये बिनाही युक्तिपूर्वक कर्म करके (सुप्रयुक्तेन कर्मणा) परमेश्वरकी प्राप्ति कर लेते हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है, कि 'योगी' और 'कर्मयोगी' दोनों शब्द गीतामें समानार्थक हैं; और इनका अर्थ "युक्तिसे कर्म करनेवाला" होता है; तथा 'कर्मयोग' शब्दका प्रयोग करनेके बदले, गीता और महाभारतमें छोटेसे 'योग' शब्दकाही अधिक उपयोग किया गया है। "मैंने तुझे जो यह योग बतलाया है, इसीको पूर्वकालमें विवस्वानसे कहा था (गीता ४. १); और विवस्वानने मनुको बतलाया था; परंतु उस योगके बादमें नष्टसा हो जानेपर फिर वही योग तुझसे कहना पड़ा" - इस अवतरणमें भगवानने जो 'योग' शब्दका तीन बार उच्चारण किया है, उसमें पातंजल-योगका विवक्षित होना नहीं पाया जाता; किंतु "कर्म करनेकी किसी प्रकारकी विशेष युक्ति, साधन या मार्ग" अर्थ ही लिया जा सकता है। इसी तरह जब संजय गीताके कृष्ण-अर्जुन संवादको 'योग' कहता है। (गीता १८.७५) तबभी यही अर्थ पाया जाता है। श्रीशंकराचार्य स्वयं संन्यासमार्गवाले थे। तोभी उन्होंने अपने गीता- भाष्यके आरंभमेंही वैदिकधर्मके दो भेद - प्रवृत्ति और निवृत्ति - बतलाये हैं; और 'योग' शब्दका अर्थ श्रीभगवानकी की हुई व्याख्याके अनुसार कभी 'सम्यक्- दर्शनोपायकर्मानुष्ठानम्' (गीता ४४. २) और कभी "योगः युक्तिः" (गीता १०.७) किया है। इसी तरह महाभारतमेंभी 'योग' और 'ज्ञान' दोनों शब्दोंके विषयमें स्पष्ट लिखा है, कि "प्रवृत्तिलक्षणो योगः ज्ञानं संन्यासलक्षणम्" (मभा. अश्व. ४३.२५)। अर्थात् योगका अर्थ प्रवृत्तिमार्ग और ज्ञानका अर्थ संन्यास या निवृत्ति- मार्ग है। शांतिपर्वके अंतमें, नारायणीयोपाख्यानमें 'सांख्य' और 'योग' शब्द तो इसी अर्थमें अनेक बार आये हैं; और इसकाभी वर्णन किया गया है, कि ये दोनों मार्ग सृष्टिके आरंभमें भगवानने क्यों और कैसे निर्माण किये। (मभा. शां. २४० और ३४८)। पहले प्रकरणमें महाभारतसे जो वचन उद्धृत किये गये हैं, उनसे यह स्पष्टतया मालूम हो गया है, कि यही नारायणीय अथवा भागवतधर्म भगवद्गीताका प्रतिपाद्य तथा प्रधान विषय है। इसलिये कहना पड़ता है, कि 'सांख्य' और 'योग' शब्दोंका जो प्राचीन और पारिभाषिक अर्थ (सांख्य = निवृत्ति; योग = प्रवृत्ति) नारायणीय धर्ममें दिया गया है, वही अर्थ गीतामेंभी विवक्षित है। यदि इसमें किसीको शंका हो, तो गीतामें दी हुई इस व्याख्यासे - "समत्वं योग उच्यते" या "योगः कर्मसु कौशलम्" - तथा उपर्युक्त "कर्मयोगेन योगिनाम्" इत्यादि गीताके वचनोंसे उसे शंकाका समाधान हो सकता है। इसलिये अब यह निर्विवाद सिद्ध है, कि
६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गीतामें 'योग' शब्द प्रवृत्तिमार्ग अर्थात् 'कर्मयोग'के अर्थहीमें प्रयुक्त हुआ है। वैदिक धर्म-ग्रंथोंकी कौन कहे, यह 'योग' शब्द, पाली और संस्कृत भाषाओंके बौद्ध- धर्म-ग्रंथोंमेंभी, इसी अर्थमें प्रयुक्त है। उदाहरणार्थ, संवत् ३३५ के लगभग लिखे 'मिलिंदप्रश्न' नामक पालीग्रंथमें 'पुब्बयोगो' (पूर्वयोग) शब्द आया है; और वहाँ उसका अर्थ 'पुब्बकम्म' ( पूर्वकर्म ) किया गया है (मि. प्र. १. ४)। इसी तरह अश्वघोष कविकृत-जो शालिवाहन शकके आरंभमें हो गया है-'बुद्धचरित' नामक संस्कृत काव्यके पहले सर्गके पचासवें श्लोकमें यह वर्णन है - आचार्यकं योगविधौ द्विजानामप्राप्तमन्यैर्जनको जगाम । अर्थात् “ब्राह्मणोंको योगविधिकी शिक्षा देने राजा जनक आचार्य ( उपदेष्टा ) हो गये। इनके पहले यह आचार्यत्व किसीकोभी प्राप्त नहीं हुआ था”। यहाँपर 'योग-विधि'का अर्थ निष्काम-कर्मयोगकी विधिही समझना चाहिये। क्योंकि गीता आदि अनेक ग्रंथ मुक्त कंठसे कह रहे हैं कि जनकजीके बर्तावका यही रहस्य है; और अश्वघोषने अपने 'बुद्धचरित' (मु. च. ९.१९ और २०) में यह दिखलानेके लिये, कि “गृहस्थाश्रममें रहकरभी मोक्षकी प्राप्ति कैसे की जा सकती है" जनक- हीका उदाहरण दिया है। जनकके दिखलाये हुए मार्गका नाम 'योग' था; और यह बात बौद्ध-धर्म-ग्रंथोंसेभी सिद्ध होती है। इसलिये गीताके 'योग' शब्दकाभी यही अर्थ लगाना पड़ता है। क्योंकि गीताहीके कथनानुसार ( गीता ३.२० ) जनककाही मार्ग उसमें प्रतिपादित किया गया है। सांख्य और योग इन दो मार्गोंके विषयमें अधिक विचार आगे किया जाएगा। प्रस्तुत प्रश्न यही है, कि गीतामें 'योग' शब्दका उपयोग किस अर्थमें किया गया है। जब एक बार यह सिद्ध हो गया कि गीतामें 'योग'का प्रधान अर्थ कर्मयोग और 'योगी'का प्रधान अर्थ कर्मयोगी है, तो फिर यह कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि भगवद्गीताका प्रतिपाद्य विषय क्या है। स्वयं भगवान् अपने उपदेशको 'योग' कहते हैं ( गीता ४.१-३ ); बल्कि छठे ( गीता ६. ३३ ) अध्यायमें अर्जुनने और गीताके अंतिम उपसंहार (गीता १८.७५) में संजयनेभी गीताके उपदेशको 'योग'ही कहा है। इसी तरह गीताके प्रत्येक अध्यायके अंतमें, जो अध्याय-समाप्ति- दर्शक संकल्प है, उसमेंभी साफ़ साफ़ कह दिया है, कि गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय 'योगशास्त्र'ही है। परंतु जान पड़ता है, कि उक्त संकल्पके शब्दोंके अर्थपर टीकाकारोंने ध्यान नहीं दिया। आरंभके दो पदों - “ श्रीमद्भगवद्गीतासु उप- निषत्सु 'के बाद इस संकल्पमें दो शब्द “ ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे " औरभी जोड़े गये हैं। पहले दो शब्दोंका अथ है- “भगवानसे गाये गये उपनिषदमें”; और पिछले दो शब्दोंका अर्थ “ब्रह्मविद्याका योगशास्त्र अर्थात् कर्मयोग-शास्त्र" है, जो कि इस गीताका विषय है। ब्रह्मविद्या और ब्रह्मज्ञान एकही बात है; और इसके प्राप्त हो जानेपर ज्ञानी पुरुषके लिये दो निष्ठाएं या मार्ग खुले होते हैं (गीता ३.३)। एक
कर्मयोगशास्त्र ६१ सांख्य अथवा संन्यास मार्ग – अर्थात् वह मार्ग जिसका ज्ञान होनेपर कर्म करना छोड़ कर विरक्त होकर रहना पड़ता है; और दूसरा योग अथवा कर्ममार्ग – अर्थात् वह मार्ग, जिसमें कर्मोंका त्याग न करके ऐसी युक्तिसे नित्य कर्म करते रहना चाहिये जिससे मोक्ष-प्राप्तिमें कुछभी बाधा न हो। पहले मार्गका दूसरा नाम ‘ज्ञाननिष्ठा'भी है, जिसका विवेचन उपनिषदोंमें अनेक ऋषियोंने और ग्रंथकारोंनेभी किया है। परंतु ब्रह्मविद्याके अंतर्गत कर्मयोगका या योगशास्त्रका तात्त्विक विवेचन भगवद्गीताके सिवा अन्य ग्रंथोंमें नहीं है। इस बातका उल्लेख पहले किया जा चुका है, कि अध्याय-समाप्ति-दर्शक संकल्प गीताकी सब प्रतियोंमें पाया जाता है; और इससे प्रकट होता है, कि गीताकी सभी टीकाओंके रचे जानेके पहलेही उसकी रचना हुई होगी। इस संकल्पके रचयिताने इस संकल्पमें “ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे” इन दो पदोंको व्यर्थही नहीं जोड़ दिया है; किंतु उसने गीताशास्त्रके प्रतिपाद्य विषयकी अपूर्वता दिखानेहीके लिये उक्त पदोंको उस संकल्पमें माधार और हेतुसहित स्थान दिया है। अतः इस बातकाभी सहज निर्णय हो सकता है, कि गीतापर अनेक सांप्रदायिक टीकाओंके होनेके पहले गीताका तात्पर्य कैसे और क्या समझा जाता था। यह हमारे सौभाग्यकी बात है, कि इस कर्मयोगका प्रतिपादन स्वयं भगवान् श्रीकृष्णहीने किया है, जो इस योगमार्गके प्रवर्तक और सब योगोंके साक्षात् ईश्वर (योगेश्वर = योग × ईश्वर) हैं; और लोकहितके लिये उन्होंने अर्जुनको उसका रहस्य बतलाया है। गीताके 'योग' और 'योगशास्त्र' शब्दोंसे हमारे ‘कर्मयोग' और 'कर्मयोगशास्त्र' शब्द कुछ बड़े हैं सही; परंतु अब हमने कर्मयोगशास्त्र सरीखा बड़ा नामही इस ग्रंथ और प्रकरणको देना इसलिये पसंद किया है, कि जिससे गीताके प्रतिपाद्य विषयके संबंधमें कुछभी संदेह न रह जावे। एकही कर्म करनेके जो अनेक योग, साधन या मार्ग हैं, उनमेंसे सर्वोत्तम और शुद्ध मार्ग कौन है; उसके अनुसार नित्य आचरण किया जा सकता है या नहीं; नहीं किया जा सकता, तो कौन कौन अपवाद उत्पन्न होते हैं, और वे क्यों उत्पन्न होते हैं; जिस मार्गको हमने उत्तम मान लिया है, वह उत्तम क्यों हैं; जिस मार्गको हम बुरा समझते हैं, वह बुरा क्यों है; यह अच्छापन या बुरापन किसके द्वारा या किस आधारपर निश्चित किया जा सकता है; अथवा इस अच्छेपन या बुरेपनका रहस्य क्या है – इत्यादि बातें जिस शास्त्रके आधारसे निश्चित की जाती हैं, उसको ‘कर्मयोगशास्त्र' या गीताके संक्षिप्त रूपानुसार 'योगशास्त्र' कहते हैं। 'अच्छा' और 'बुरा' दोनों साधारण शब्द हैं। इन्हींके समान अर्थमें कभी कभी शुभ-अशुभ, हितकर-अहितकर, श्रेयस्कर-अश्रेयस्कर, पाप-पुण्य, धर्म्य-अधर्म्य इत्यादि शब्दोंका उपयोग हुआ करता है। कार्य-अकार्य, कर्तव्य-अकर्तव्य, न्याय्य- अन्याय्य इत्यादि शब्दोंकाभी अर्थ वैसेही होता है। तथापि इन शब्दोंका उपयोग करनेवालोंके सृष्टिरचनाविषयक मत भिन्न भिन्न होनेके कारण 'कर्मयोग'शास्त्रके
निरूपणके पंथभी भिन्न भिन्न हो गये हैं। किसीभी शास्त्रको लीजिये; उसके विषयोंकी चर्चा साधारणतः तीन प्रकारसे की जाती है। (१) इस जड़ सृष्टिके पदार्थ ठीक वैसेही हैं, जैसे कि वे हमारी इंद्रियोंको गोचर होते हैं। इसके परे उनमें और कुछ नहीं है - इस दृष्टिसे उनके विषयमें विचार करनेकी एक पद्धति है, जिसे आधिभौतिक विवेचन कहते हैं। उदाहरणार्थ, सूर्यको देवता न मानकर केवल पांचभौतिक जड़ पदार्थोंका एक गोला माने; और उष्णता, प्रकाश, वजन दूरी, और आकर्षण इत्यादि उसके केवल गुणधर्मोहीकी परीक्षा करें; तो उसे सूर्यका आधिभौतिक विवेचन कहेंगे। दूसरा उदाहरण पेड़का लीजिये। इसका विचार न करके, कि पेड़के पत्ते निकलना, फूलना, फलना आदि क्रियाएँ किस अंतर्गत शक्तिके द्वारा होती हैं, जब केवल बाहरी दृष्टिसे विचार किया जाता है, कि जमीनमें बीज बोनेसे अंकुर फूटते हैं, फिर वे बढ़ते हैं; और उसीसे पत्ते, शाखा, फूल इत्यादि दृश्य विकार प्रकट होते हैं, तब उसे पेड़का आधिभौतिक विवेचन कहते हैं। रसायनशास्त्र, पदार्थविज्ञानशास्त्र, विद्युच्छास्त्र इत्यादि आधुनिक शास्त्रोंका विवेचन इसी ढंगका होता है। ओर तो क्या, आधिभौतिक पंडितभीको यह मानते हैं, कि उक्त रीतिसे किसी वस्तुके दृश्य गुणोंका विचार कर लेनेपर उनका काम पूरा हो जाता है - सृष्टिके पदार्थोंका इससे अधिक विचार करना निष्फल है। (२) जब उक्त दृष्टिको छोड़कर इस बातका विचार किया जाता है, कि जड़ सृष्टिके पदार्थोंके मूलमें क्या है; क्या, इन पदार्थोंका व्यवहार केवल उनके गुण-धर्मोहीसे होता है, या उसके लिये किसी तत्त्वका आधारभी है; तो केवल आधिभौतिक विवेचनसेही काम नहीं चलता, हमको कुछ आगे बढ़ना पड़ता है। उदाहरणार्थ, जब हम यह मानते हैं, कि पांचभौतिक सूर्यके जड़ या अचेतन गोलेमें सूर्य नामक एक देवताका अधिष्ठान है; और इसीके द्वारा इस अचेतन गोले (सूर्य) के सब व्यापार या व्यवहार होते रहते हैं, तब उसको उस विषयका आधिदैविक विवेचन कहते हैं। इस मतके अनुसार यह माना जाता है, कि पेड़में, पानीमें, हवामें अर्थात् सब पदार्थोंमें, अनेक देवता हैं; जो उन जड तथा अचेतन पदार्थोंसे भिन्न तो हैं, किंतु उनके व्यवहारोंको वे ही चलाते हैं। (३) परंतु जब यह माना जाता है, कि सृष्टिके हजारों जड़ पदार्थोंमें हजारों स्वतंत्र देवता नहीं हैं; किंतु बाहरी सृष्टिके सब व्यवहारोंको चलानेवाली, मनुष्यके शरीरमें आत्मस्वरूपसे रहनेवाली, और मनुष्यको सारी सृष्टिका ज्ञान प्राप्त करा देनेवाली एकही चित्-शक्ति है,. जो कि इंद्रियातीत है ओर जिसके द्वाराही इस जगतका सारा व्यवहार चल रहा है; तब उस विचार-पद्धतिको आध्यात्मिक विवेचन कहते हैं। उदाहरणार्थ, अध्यात्मवादियोंका मत है, कि सूर्य- चंद्र आदिका व्यवहार, यहाँतक कि वृक्षोंके पत्तोंका हिलनाभी, इसी अचित्य शक्तिकी प्रेरणासे हुआ करता है। सूर्य-चंद्र आदिमें या अन्य स्थानोंमें भिन्न भिन्न तथा स्वतंत्र देवता नहीं हैं। प्राचीन कालसे किसीभी विषयका विवेचन करनेके
कर्मयोगशास्त्र ६३ लिये ये तीन मार्ग प्रचलित हैं; और इनका उपयोग उपनिषद्-ग्रंथोंमेंभी किया गया है। उदाहरणार्थ, ज्ञानेंद्रियाँ श्रेष्ठ हैं या प्राण श्रेष्ठ हैं, इस बातका विचार करते समय बृहदारण्यक आदि उपनिषदोंमें एक बार उक्त इंद्रियोंके अग्नि आदि देवता- ओंको और दूसरी बार उनके सूक्ष्म रूपों (अध्यात्म) को ले कर उनके बलाबल का विचार किया गया है (बृ. १. ५. २१ और २२; छां. १. २ और ३; कौषी. २. ८); और, गीताके सातवें अध्यायके अंतमें तथा आठवेंके आरंभमें ईश्वरके स्वरूपका जो विचार बतलाया गया है, वहभी इसी दृष्टिसे किया गया है। “अध्यात्मविद्या विद्यानाम्” (गीता १०. ३२) इस वाक्यके अनुसार हमारे शास्त्रकारोंने उक्त तीन मार्गोंमेंसे, आध्यात्मिक विवरणकोही अधिक महत्त्व दिया है। परंतु आजकल उप- र्युक्त तीन शब्दों (आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक) के अर्थको थोड़ा-सा बदलकर प्रसिद्ध आधिभौतिक फ्रेंच पंडित कोंटने* आधिभौतिक विवेचनकोही अधिक महत्त्व दिया है। उसका कहना है, कि सृष्टिके मूल-तत्त्वको खोजते रहनेसे कुछ लाभ नहीं; यह तत्त्व अगम्य है। अर्थात् इसको समझ लेना कभीभी संभव नहीं। इसलिये इसकी कल्पित नींवपर किसी शास्त्रकी इमारतको खड़ा कर देना न तो संभव है और न उचित। असभ्य और जंगली मनुष्योंने पहले पहल जब पेड़, बादल और ज्वालामुखी पर्वत आदि हिलते-चलते पदार्थोंको देखा, तब उन लोगों ने अपने भोलेपनसे इन सब पदार्थोंको देवताही मान लिया। यह कोंटके मतानुसार, 'आधिदैविक' विचार हुआ; परंतु मनुष्योंने उक्त कल्पनाको शीघ्रही त्याग दिया और वे समझने-लगें कि इन सब पदार्थोंमें कुछ-न-कुछ आत्मतत्त्व अवश्य भरा हुआ है। कोंटके मतानुसार मानवी ज्ञानकी उन्नतिकी यह दूसरी सीढ़ी है। इसे वह 'आध्यात्मिक' कहता है; परंतु जब इस रीतिसे सृष्टिका विचार करने परभी प्रत्यक्ष उपयोगी शास्त्रीय ज्ञानकी कुछ वृद्धि नहीं हो सकी, तब अंतमें मनुष्य सृष्टिके पदार्थोंके दृश्य गुण-धर्मोंहीका और अधिक विचार करने लगा; जिससे
- फ्रान्स देशमें ऑगस्ट कोंट (Auguste Comte) नामक एक बड़ा पंडित गतशताब्दीमें हो चुका है। इसने समाजशास्त्रपर एक बहुत बड़ा ग्रंथ लिखकर बतलाया है, कि समाजरचनाका शास्त्रीय रीतिसे किस प्रकार विवेचन करना चाहिये। अनेक शास्त्रोंकी आलोचना करके इसने यह निश्चित किया है, कि किसीभी शास्त्रको लो, उसका विवेचन पहले पहल Theological पद्धतिसे किया जाता है; फिर Meta- physical पद्धतिसे होता है; और अंतमें उसको Positive स्वरूप मिलता है। उन्हीं तीन पद्धतियोंको हमने इस ग्रंथमें आधिदैविक, आध्यात्मिक और आधिभौतिक ये तीन प्राचीन नाम दिये हैं। ये पद्धतियाँ कुछ कोंटकी निकाली हुई नहीं हैं; ये सब पुरानीही हैं तथापि उसने उनका ऐतिहासिक क्रम नई रीतिसे बाँधा है; और उनमें आधिभौतिक (Positive) पद्धतिकोही श्रेष्ठ बतलाया है; बस इतनाही कोंटका नया शोध है। कोंटके अनेक ग्रंथोंका अंग्रेजीमें अनुवाद हो गया है।
६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अब वह रेल और तार सरीखे उपयोगी आविष्कारोंको ढूंढ़ कर सृष्टिपर अपना अधिक प्रभाव जमाने लग गया है। इस मार्गको कोंटने 'आधिभौतिक' नाम दिया है। उसने निश्चित किया है, कि किसीभी शास्त्रया विषयका विवेचन करनेके लिये अन्य मार्गोंकी अपेक्षा यही आधिभौतिक मार्ग अधिक श्रेष्ठ और लाभकारी है। कोंटके मतानुसार समाजशास्त्र या कर्मयोगशास्त्रका तात्विक विचार करनेके लिये इसी आधिभौतिक मार्गका अवलंब करना चाहिये। इस मार्गका अवलंब करके इस पंडितने इतिहासकी आलोचना की; और सब व्यवहारशास्त्रोंका यही मथितार्थ निकाला है, कि इस संसारमें प्रत्येक मनुष्यका परम धर्म यही है, कि वह समस्त मानव-जातिसे प्रेम करें और सब लोगोंके कल्याणके लिये सदैव प्रयत्न करता रहे। मिल और स्पेन्सर आदि अंग्रेज पंडित इसी मतके पुरस्कर्ता कहे जा सकते हैं। इसके उलटे कांट, हेगेल, शोपेनहौएर आदि जर्मन तत्त्वज्ञानी पुरुषोंने, नीति- शास्त्रके विवेचनके लिये इस आधिभौतिक पद्धतिको अपूर्ण माना है और हमारे वेदान्तियोंकी नाईं अध्यात्मबुद्धिसेही नीतिके समर्थन करने के मार्गको आजकल उन्होंने युरोपमें फिर स्थापित किया है। इसके विषयमें और अधिक आगे चलकर लिखा जाएगा। एकही अर्थके विवक्षित होनेपरभी 'अच्छा और बुरा'के पर्यायवाची भिन्न भिन्न शब्दों का - जैसे 'कार्य-अकार्य' और 'धर्म्य-अधर्म्य'का - उपयोग क्यों होने लगा ? इसका कारण यही है, कि विषय-प्रतिपादनका मार्ग या दृष्टि प्रत्येककी भिन्न भिन्न होती है। अर्जुनके सामने यह प्रश्न था, कि जिस युद्धमें भीष्म, द्रोण आदिका वध करना पड़ेगा, उसमें शामिल होना उचित है या नही (गीता. २. ७ ) और यदि इसी प्रश्नका उत्तर देनेका प्रसंग किसी आधिभौतिक पंडितपर आता, तो वह पहले इस बातका विचार करता, कि भारतीय युद्धसे स्वयं अर्जुनको दृश्य हानि या लाभ कितना होगा; और कुल समाजपर उसका क्या परिणाम होगा। यह विचार करके तब उसने निश्चय किया होता, कि युद्ध करना 'न्याय्य' है या 'अन्याय्य'। इसका कारण यह है कि किसी कर्मके अच्छेपन या बुरेपनका निर्णय करते समय ये आधिभौतिक पंडित यही सोचा करते हैं, कि इस संसारमें उस कर्मका आधिभौतिक परिणाम अर्थात् प्रत्यक्ष बाह्य परिणाम क्या होगा - ये लोग इस आधि- भौतिक कसौटीके सिवा और किसी साधन या कसौटीको नहीं मानते। परंतु ऐसे उत्तरसे अर्जुनका समाधान होना संभव नहीं था। उसकी दृष्टि उससेभी अधिक व्यापक थी। उसे केवल अपने सांसारिक हितका विचार नहीं करना था; किंतु उसे पारलौकिक दृष्टिसेभी यह निर्णय कर लेना था, कि इस युद्धका परिणाम मेरी आत्मा के लिये श्रेयस्कर होगा या नही। उसे इस बातकी कुछभी शंका नहीं थी, कि युद्धमें भीष्म-द्रोण आदियोंका वध होनेपर तथा राज्य प्राप्ति होनेपर मुझे ऐहिक सुख मिलेगा या नहीं; और मेरा शासन लोगोंको दुर्योधनसे अधिक सुख-
कर्मयोगशास्त्र ६५ दायक होगा या नहीं। उसे यही देखना था, कि में जो कर रहा हूँ वह 'धर्म्य' है या 'अधर्म्य'; अथवा 'पुण्य' है या 'पाप'; और गीताका विवेचनभी इसी दृष्टिसे किया गया है। केवल गीतामेंही नहीं; किंतु महाभारतमें कई स्थानोंपरभी कर्म- अकर्मका जो विवेचन है, वह पारलौकिक और अध्यात्मदृष्टिसेही किया गया है। और वहाँ किसीभी कर्मका अच्छापन या बुरापन दिखलानेके लिये प्रायः सर्वत्र 'धर्म' और 'अधर्म' इन दो शब्दोंका उपयोग किया गया है। परंतु 'धर्म' और उसका प्रतियोगी 'अधर्म' ये दोनों शब्द अपने व्यापक अर्थके कारण कभी कभी भ्रम उत्पन्न कर दिया करते हैं। इसलिये यहाँपर इस बातकी कुछ अधिक मीमांसा करना आवश्यक है कि कर्मयोगशास्त्रमें इन शब्दोंका उपयोग मुख्यतः किस अर्थमें किया जाता है। नित्य व्यवहारमें 'धर्म' शब्दका उपयोग केवल "पारलौकिक सुखका मार्ग" इसी अर्थमें किया जाता है। जब हम किसीसे प्रश्न करते हैं, कि "तेरा कौनमा धर्म है?" तब उससे हमारे पूछनेका यही हेतु होता हैकि तू अपने पारलौकिक कल्याणके लिये किस मार्ग - वैदिक, बौद्ध, जैन, ईसाई, मुहम्मदी या पारसी - पर चलता है; और वह हमारे प्रश्नके अनुसारही उत्तर देता है। इसी तरह स्वर्ग- प्राप्तिके लिये साधनभूत यज्ञ-याग आदि वैदिक विषयोंकी मीमांसा करते समय "अथातो धर्मजिज्ञासा" आदि धर्मसूत्रोंमेंभी धर्म शब्दका यही अर्थ लिया गया है; परंतु 'धर्म' शब्दका इतनाही संकुचित अर्थ नहीं है। इसके सिवा राजधर्म, प्रजाधर्म, देशधर्म, कुलधर्म, मित्रधर्म इत्यादि सांसारिक नीति-बंधनोंकोभी 'धर्म' कहते हैं। धर्म शब्दके इन दो अर्थोंको यदि पृथक् करके दिखलाना हो, तो पार- लौकिक धर्मको 'मोक्षधर्म' अथवा सिर्फ 'मोक्ष' और व्यावहारिक धर्म अथवा केवल नीतिको केवल 'धर्म' कहा करते हैं। उदाहरणार्थ, चतुर्विध पुरुषार्थकी गणना करते समय हम लोग 'धर्म अर्थ, काम, मोक्ष' कहा करते हैं। इसके पहले शब्द 'धर्म'मेंही यदि मोक्षका समावेश हो जाता, तो अंतमें मोक्षको पृथक् पुरुषार्थ बतलानेकी आवश्यकता न रहती। अर्थात् यह कहना पड़ता है, कि 'धर्म'पदसे इस स्थानपर संसारके सैकड़ों नीतिधर्मही शास्त्रकारोंको अभिप्रेत हैं। उन्हींको हम लोग आज- कल कर्तव्यकर्म, नीति, नीतिधर्म अथवा सदाचरण कहते हैं; परंतु प्राचीन संस्कृत ग्रंथोंमें 'नीति' अथवा 'नीतिशास्त्र' शब्दोंका उपयोग विशेष करके राजनीतिहीके लिये किया जाता है। इसलिये पुराने ज़मानेमें कर्तव्यकर्म अथवा सदाचारके सामान्य विवेचनको 'नीतिप्रवचन' न कहकर 'धर्मप्रवचन' कहा करते थे। परंतु 'नीति' और 'धर्म' इन दो शब्दोंका यह पारिभाषिक भेद सभी संस्कृत-ग्रंथोंमें नहीं माना गया है। इसलिये हमनेभी इस ग्रंथमें 'नीति', 'कर्तव्य' और 'धर्म' शब्दोंका उपयोग एकही अर्थमें किया है; और मोक्षका विचार जिन स्थानोंपर करना है, उन प्रकरणोंके 'अध्यात्म' और 'भक्तिमार्ग' ये स्वतंत्र नाम रखे हैं। महाभारतमें गी. र. ५
धर्म शब्द अनेक स्थानोंपर आया है; और जिस स्थानमें कहा गया हैं, कि "किसी- को कोई काम करना धर्म-संगत है", उस स्थानमें धर्म शब्दसे कर्तव्यशास्त्र अथवा तत्कालीन समाज-व्यवस्थाशास्त्रहीका अर्थ पाया जाता है; तथा जिस स्थानमें पारलौकिक कल्याणके मार्ग बतलानेका प्रसंग आया है, उस स्थानपर अर्थात् शांतिपर्वके उत्तरार्धमें 'मोक्षधर्म' इस विशिष्ट शब्दकी योजना की गई है। इसी तरह मन्वादि स्मृति-ग्रंथोंमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके विशिष्ट कर्मों अर्थात् चारों वर्णोंके कर्मोंका वर्णन करते समय केवल 'धर्म' शब्दकाही अनेक स्थानोंपर कई बार उपयोग किया गया है। और भगवद्गीतामेंभी जब भगवान् अर्जुनसे यह कहकर लड़नेके लिये कहते हैं, कि "स्वधर्ममपि चाऽवेक्ष्य" (गीता २. ३१) तब
- और उसके बाद "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः" (गीता ३. ३५) इस स्थानपरभी - 'धर्म' शब्द 'इस लोकके चातुर्वर्ण्यके धर्म' अर्थमेंही प्रयुक्त हुआ है। पुराने जमानेके ऋषियोंने श्रम-विभागरूप चातुर्वर्ण्य-संस्था इसलिये चलाई थी, कि समाजके सब व्यवहार सरलतासे होते जावें, किसी एक विशिष्ट व्यक्ति या वर्गपरही सारा बोझ न पड़ने पावे, और समाजका सभी दिशाओंसे संरक्षण और पोषण भलीभाँति होता रहे। यह बात भिन्न है, कि कुछ समयके बाद चारों वर्णोंके लोग केवल जातिमात्रोपजीवी हो गये; अर्थात् सच्चे स्वकर्मको भूलकर वे केवल नामधारी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र हो गये। इसमें संदेह नहीं, कि आरंभमें यह व्यवस्था समाजधारणार्थही की गई थी। और यदि चारों वर्णोंमेंसे कोईभी एक वर्ण अपना धर्म अर्थात् कर्तव्य छोड़ दे, यदि कोई वर्ण समूल नष्ट हो जाय और उसकी स्थानपूर्ति दूसरे लोगोंसे न की जाय, तो कुल समाज उतनाही पंगु होकर धीरे धीरे नष्टभी होने लग जाता है; अथवा वह निकृष्ट अवस्थाको तो अवश्यही पहुँच जाता है। यद्यपि यह बात सच है, कि यूरोपमें ऐसे समाज हैं, जिनका अभ्युदय चातुर्वर्ण्य-व्यवस्थाके बिनाही हुआ है; तथापि स्मरण रहे, कि उन देशोंमें चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था चाहे न हो; परंतु चारों वर्णोंके सब धर्मजातिरूपसे नहीं तो गुण-विभागरूपहीसे जागृत अवश्य रहते हैं। सारांश, जब हम धर्म शब्दका उपयोग व्यावहारिक दृष्टिसे करते हैं, तब हम यही देखा करते हैं कि, सब समाजका धारण और पोषण कैसे होता है। मनुने कहा है - "असुखोदर्क अर्थात् जिसका परिणाम दुःखकारक होता है, उस धर्मको छोड़ दें" (मनु. ४. १७६) और शांति- पर्वके सत्यानृताध्याय (महा. शां. १०९. १२) में धर्म-अधर्मका विवेचन करते हुए भीष्म और उसकेपूर्व कर्णपर्वमे श्रीकृष्ण कहते हैं :- धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः। यत्स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥ "धर्म शब्द धृ (= धारण करना) धातुसे बना है। धर्मसेही सब प्रजा बँधी हुई है। यह निश्चय किया गया है, कि जिससे (सब प्रजाका) धारण होता है वही धर्म
कर्मयोगशास्त्र ६७ है” (महा. कर्ण. ६९. ५९)। यदि यह धर्म छूट जाय, तो समझ लेना चाहिये, कि समाजके सारे बंधनभी टूट गये; और यदि समाजके बंधन टूटे, तो आकर्षण- शक्तिके बिना आकाशके सूर्यादि ग्रहमालाओंकी जो दशा हो जाती है, अथवा समुद्रमे मल्लाहके बिना नावकी जो दशा होती है, ठीक वही दशा समाजकीभी हो जाती है। इसलिये उक्त शोचनीय अवस्थासे समाजको नाशसे बचानेके लिये व्यासजीने कई स्थानोंपर कहा है, कि यदि अर्थ या द्रव्य पानेकी इच्छा हो, तो 'धर्मके द्वारा' अर्थात् समाजकी रचनाको न बिगाड़ने हुए प्राप्त करो; और यदि काम आदि वासनाओंको तृप्त करना हो, तो वह भी 'धर्मसेही' करो। महाभारतके अंतमें यही कहा है कि :- ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति माम् । धर्मादर्थश्च कामश्च स धर्मः किं न सेव्यते ॥ “अरे ! भुजा उठा कर मैं चिल्ला रहा हूँ, (परंतु) कोईभी मेरी नहीं सुनता ! धर्मसेही अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है, (इसलिये) इस प्रकारके धर्मका आचरण तुम क्यों नहीं करते हो ?” अब इससे पाठकोंके ध्यानमें यह बात अच्छी तरह जम जायगी, कि महाभारतको जिस धर्म-दृष्टिसे पाँचवां वेद अथवा 'धर्मसंहिता' मानते हैं, उस 'धर्मसंहिता' शब्दके 'धर्म' शब्दका मुख्य अर्थ क्या है। यही कारण है, कि पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा इन दोनों पारलौकिक अर्थके प्रतिपादक ग्रंथोंके साथही - धर्मग्रंथके नातेसे - 'नारायणं नमस्कृत्य' इन प्रतीक शब्दोंके द्वारा - महाभारतकाभी समावेश ब्रह्मयज्ञके नित्यपाठमें कर दिया है। धर्म-अधर्मके उपर्युक्त निरूपणको सुनकर कोई यह प्रश्न करे कि, यदि तुम्हें 'समाज-धारण' और दूसरे प्रकरणके सत्यानृतविवेकमें कथित 'सर्वभूतहित' ये दोनों तत्त्व मान्य हैं, तो तुम्हारी दृष्टिमें और आधिभौतिक दृष्टिमें भेदही क्या है ? क्योंकि ये दोनों तत्त्व बाह्यतः प्रत्यक्ष दिखनेवाले या आधिभौतिकही हैं। इस प्रश्नका विस्तृत विचार अगले प्रकरणोंमें किया गया है। यहाँ इतनाही कहना बस है, कि यद्यपि हमको यह तत्त्व मान्य है, कि समाज-धारणही धर्मका मुख्य बाह्य उपयोग है, तथापि हमारे मतकी विशेषता यह है, कि वैदिक अथवा अन्य सब धर्मों- का जो परम उद्देश्य आत्म-कल्याण या मोक्ष है, उसपरभी हमारी दृष्टि बनी है। समाज-धारणको लीजिये, चाहे सर्वभूतहितहीको, यदि ये बाह्योपयोगी तत्त्व हमारे आत्म-कल्याणके मार्गमें बाधा डालें, तो हमें इनकी ज़रूरत नहीं। हमारे आयुर्वेदग्रंथ यदि यह प्रतिपादन करते हैं, कि वैद्यकशास्त्रभी शरीररक्षाके द्वारा मोक्षप्राप्तिका साधन होनेके कारण संग्रहणीय है, तो यह कदापि संभव नहीं, कि जिस शास्त्रमें इस महत्त्वके विषयका विचार किया गया है, कि सांसारिक व्यवहार किस प्रकार करना चाहिये, उस कर्मयोगशास्त्रको हमारे शास्त्रकार आध्यात्मिक मोक्षज्ञानसे अलग बतलावें। इसीलिये हम समझते हैं, कि जो कर्म हमारे मोक्ष अथवा हमारी
६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आध्यात्मिक उन्नतिके अनुकूल हो, वही पुण्य है, वही धर्म और वही शुभकर्म है; और जो कर्म उसके प्रतिकूल वही पाप, अधर्म अथवा अशुभ है। यही कारण है, कि हम 'कर्तव्य-अकर्तव्य', 'कार्य-अकार्य' शब्दोंके बदले 'धर्म' और 'अधर्म' शब्दोंकाही ( यद्यपि वे दो अर्थके अतएव कुछ संदिग्ध हों, तोभी ) अधिक उपयोग करते हैं। यद्यपि बाह्य-सृष्टिके व्यावहारिक कर्मों अथवा व्यापारोंका विचार करनाही प्रधान विषय हो, तोभी उक्त कर्मोंके बाह्य परिणामके विचारके साथही साथ यह विचारभी हम लोग हमेशा करते हैं, कि ये व्यापार हमारी आत्माके कल्याणके अनुकूल हैं या प्रतिकूल । यदि आधिभौतिकवादीसे कोई यह प्रश्न करे, कि " मैं अपना हित छोड़कर लोगोंका हित क्यों करूँ ? " तो वह इसके सिवा और क्या समाधानकारक उत्तर दे सकता है, कि " यह तो सामान्यतः मनुष्यस्वभावही है।" हमारे शास्त्र- कारोंकी दृष्टि इससे परे पहुँची हुई है; और उस व्यापक आध्यात्मिक दृष्टिहीसे महाभारतमें कर्मयोगशास्त्रका विचार किया गया है; एवं श्रीमद्भगवद्गीतामें वेदान्तका निरूपणभी इतनेहीके लिये किया गया है। प्राचीन यूनानी पंडितोंकीभी यही राय है, कि ' अत्यंत हित' अथवा ' सद्गुणकी पराकाष्ठा 'के समान कुछ-न-कुछ परम उद्देश्य कल्पित करके फिर उसी दृष्टिसे कर्म-अकर्मका विवेचन करना चाहिये । और ॲरिस्टॉटलने अपने नीतिशास्त्रके ग्रंथ ( १. ७, ८) में कहा है, कि आत्माके हितमेंही इन सब बातोंका समावेश हो जाता है। तथापि इस विषयमें आत्माके हितको जितनी प्रधानता देनी चाहिये थी, उतनी ॲरिस्टॉटलने नहीं दी है। हमारे शास्त्रकारोंकी बात इस प्रकार नहीं है। उन्होंने निश्चित किया है कि, आत्माका कल्याण अथवा आध्यात्मिक पूर्णावस्थाहो प्रत्येक मनुष्यका पहला और परम उद्देश्य है। अन्य प्रकारके हितोंकी अपेक्षा उसीको प्रधान जानना चाहिये और तदनुसार कर्म-अकर्मका विचार करना चाहिये । अध्यात्म-विद्याको छोड़कर कर्म-अकर्मका विचार करना ठीक नहीं है। जान पड़ता है कि वर्तमान समयमें पश्चिमी देशोंके कुछ पंडितोंनेभी कर्म-अकर्मके विवेचनकी इसी पद्धतिको स्वीकार किया है। उदा- हरणार्थ, जर्मन तत्त्वज्ञानी कांटने पहले "शुद्ध (व्यवसायात्मक) बुद्धिकी मीमांसा" नामक आध्यात्मिक ग्रंथ लिखकर फिर उसकी पूतिके लिए "व्यावहारिक (वासनात्मक) बुद्धिकी मीमांसा" नामका नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथ लिखा है* और इंग्लैंडमेंके ग्रीनने अपने "नीतिशास्त्रके उपोद्घात" का सृष्टिके मूलभूत आत्म- तत्त्वसेही आरंभ किया है। परंतु इन ग्रंथोंके बदले केवल आधिभौतिक पंडितोंकेही
- कांट एक जर्मन तत्त्वज्ञानी था । इसे अर्वाचीन तत्त्वज्ञानशास्त्रका जनक समझते हैं। इसके Critique of Pure Reason ( शुद्ध बुद्धिकी मीमांसा ) और Critique of Practical Reason ( वासनात्मक बुद्धिकी मीमांसा ) ये दो ग्रंथ प्रसिद्ध हैं। ग्रीनके ग्रंथका नाम Prolegomena to Ethics है।
कर्मयोगशास्त्र ६९
नीतिग्रंथ आजकल हमारे यहाँकी अंग्रेजी पाठशालाओंमें पढ़ाये जाते हैं, जिसका परि- णाम यह दीख पड़ता है, कि गीतामें बतलाये गये कर्मयोगशास्त्रके मूलतत्त्वोंका - हमारे अंग्रेजी सीखे हुये कुछ विद्वानोंकोभी - स्पष्ट बोध नहीं होता। उक्त विवेचनसे ज्ञात हो जायगा, कि व्यावहारिक नीतिबंधनोंके लिये अथवा समाज-धारणकी व्यवस्थाके लिये हम 'धर्म' शब्दका उपयोग क्यों करते हैं। महाभारत, भगवद्गीता आदि संस्कृत ग्रंथोंमे, तथा प्राकृत भाषा ग्रंथोंमेंभी, व्यावहारिक कर्तव्य अथवा नियमके अर्थमें धर्म शब्दका हमेशा उपयोग किया जाता है। कुलधर्म और कुलाचार, दोनों शब्द समानार्थक समझे जाते हैं। भारतीय युद्धमें एक समय कर्णके रथका पहिया पृथ्वीने निगल लिया था; उसको उठा कर ऊपर लानेके लिये जब कर्ण अपने रथसे नीचे उतरा तब अर्जुन उसका वध करनेके लिये उद्युक्त हुआ। यह देखकर कर्णने कहा, "निःशस्त्र शत्रुको मारना धर्मयुद्ध नहीं है।" इसे सुनकर श्रीकृष्णने कर्णको पिछली कई बातोंका स्मरण दिलाया; जैसे कि द्रौपदीका वस्त्रहरण और सब लोगोंने मिलकर अकेले अभिमन्युका किया वध इत्यादि। और प्रत्येक प्रसंगपर यह प्रश्न किया कि "हे कर्ण! उस समय तेरा धर्म कहाँ गया था ?" इन सब बातोंका वर्णन महाराष्ट्र-कवि मोरोपंतने किया है। और महाभारतमेंभी इस प्रसंगपर "क्व ते धर्मस्तदा गतः"में 'धर्म' शब्दकाही प्रयोग किया गया है। तथा अंतमें कहा गया है, कि जो इस प्रकार अधर्म करे उसके साथ शठं प्रति शाठ्यंका बर्ताव करनाही उसको उचित दंड देना है। सारांश, क्या संस्कृत और क्या प्राकृत सभी ग्रंथोंमें 'धर्म' शब्दका प्रयोग उन सब नीति-नियमोंके लिये किया गया है, जो समाज-धारणके लिये शिष्टजनोंके द्वारा अध्यात्म-दृष्टिसे बनाये गये हैं। इसलिये उसी शब्दका उपयोग हमनेभी इस ग्रंथमें किया है। उक्त दृष्टिसे विचार करनेपर नीतिके उन नियमों अथवा 'शिष्टाचारों'को धर्मकी बुनियाद कह सकते हैं, जो समाज-धारणके लिये शिष्टजनोंके द्वारा प्रचलित किये गये हों; और जो सर्वमान्य हो चुके हों। और, इसलिये महाभारत (अनु. १०४. १५७) में एवं स्मृति-ग्रंथोंमें 'आचारप्रभवो धर्मः' अथवा 'आचारः परमो धर्मः' (मनु. १. १०८), अथवा धर्मका मूल बतलाते समय 'वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः' (मनु. २. १२) इत्यादि वचन कहे हैं। परंतु कर्मयोगशास्त्रमें इतनेहीसे काम नहीं चल सकता; इस बातकाभी पूरा और मार्मिक विचार करना पड़ता है, (जैसे कि दूसरे प्रकरणमें किया है।) कि उक्त आचारकी प्रवृत्तिही क्यों हुई - इस आचारकी प्रवृत्तिका कारण क्या है। 'धर्म' शब्दकी दूसरी जो व्याख्या प्राचीन ग्रंथोंमें दी गई है, उसकाभी यहाँ थोड़ा विचार करना चाहिये। यह व्याख्या मीमांसकोंकी है: 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः' (जै. सू. १. १. २)। अर्थात् 'चोदना' याने प्रेरणा किसी अधिकारी पुरुषका यह कहना तू 'अमुक कर' अथवा 'मत कर' जबतक इस प्रकार कोई प्रबंध
७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नहीं कर दिया जाता, तबतक कोईभी काम किसीकोभी करनेकी स्वतंत्रता होती है। इसका आशय यही है, कि पहलेपहल निर्बंध या प्रबंधके कारण धर्म निर्माण हुआ। धर्मकी यह व्याख्या कुछ अंशमें, प्रसिद्ध अंग्रेज ग्रंथकार हॉब्सके मतसे मिलती है। असभ्य तथा जंगली अवस्थामें प्रत्येक मनुष्यका आचरण, समय-समयपर उत्पन्न होनेवाली उसकी मनोवृत्तियोंकी प्रबलताके अनुसार हुआ करता है। परंतु कुछ समयके बाद यह मालूम होने लगता है, कि इस प्रकारका मनमाना बर्ताव श्रेयस्कर नहीं है; और यह विश्वास होने लगता है, कि इंद्रियोंके स्वाभाविक व्यापारोंकी कुछ मर्यादा निश्चित करके उसके अनुसार बर्ताव करनेहीमें सब लोगोंका कल्याण है। तब प्रत्येक मनुष्य ऐसी मर्यादाओंका पालन कायदेके तौरपर करने लगता है; जो शिष्टाचारसे, या अन्य रीतिसे सुदृढ हो जाया करती हैं। और जब इस प्रकारकी मर्यादाओंकी संख्या बहुत बढ़ जाती है, तब उन्हींका एक शास्त्र बन जाता है। पिछले प्रकरणमें बतलाया गया है कि पूर्वसमयमें विवाहव्यवस्थाका प्रचार नहीं था। पहलेपहल उसे श्वेतकेतुने चलाया: और शुक्राचार्यने मदिरापानको निषिद्ध ठहराया। यह न देखकर, कि इन मर्यादाओंको निश्चित करनेमें श्वेतकेतु अथवा शुक्राचार्यका क्या हेतु था; केवल इसी एक बातपर ध्यान देकर, कि इन मर्यादाओंके निश्चित करनेका काम या कर्तव्य इन लोगोंको करना पड़ा: धर्म शब्दकी "चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः" व्याख्या बनाई गई है। धर्मभी हुआ तो पहले उसका महत्त्व किसी व्यक्तिके ध्यानमें आता है, और तभी उसकी प्रवृत्ति होती है। "खाओ-पीओ, मौज करो" ये बातें किसीको सिखलानी नहीं पड़तीं; क्योंकि ये इंद्रियोंके स्वाभाविक धर्मही हैं। मनुजीने जो कहा है, कि "न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने" (मनु. ५. ५६)
- अर्थात् मांस भक्षण करना अथवा मद्यपान और मैथुन करना कोई (सृष्टि- कर्म-विरुद्ध) दोष नहीं है - उसका तात्पर्यभी यही है। ये सब बातें मनुष्यहीके लिये नहीं, किंतु प्राणिमात्रके लिये स्वाभाविक हैं - "प्रवृत्तिरेषा भूतानाम्।" समाज-धारणके लिये अर्थात् सब लोगोंके सुखके लिये इस स्वाभाविक आचरणका उचित प्रतिबंध करनाही धर्म है। महाभारतके शांतिपर्व (मभा. शां. २९४. २९) मेंभी कहा है - आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥ अर्थात् "आहार, निद्रा, भय और मैथुन मनुष्यों और पशुओंके लिये एकही समान स्वाभाविक हैं। मनुष्यों और पशुओंमें कुछ भेद है तो केवल धर्मका (अर्थात् इन स्वाभाविक वृत्तियोंको मर्यादित करनेका)। जिस मनुष्यमें यह धर्म नहीं है, वह पशुके समानही है।" आहारादि स्वाभाविक वृत्तियोंको मर्यादित करनेके विषयमें भागवतका श्लोक पिछले प्रकरणमें दिया गया है। इसी प्रकार भगवद्गीतामेंभी जब अर्जुनसे भगवान् कहते हैं (गीता ३. ३४) :-
कर्मयोगशास्त्र ७१ इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपंथिनौ ॥ " इंद्रियों तथा इन इंद्रियोंमें अपने उपभोग्य अथवा त्याज्य पदार्थके विषयमें, जो प्रीति अथवा द्वेष होता है, वह स्वभावतः सिद्ध है । इनके वशमें हमें नहीं होना चाहिये । क्योंकि राग और द्वेष दोनों हमारे शत्रु हैं" - तब भगवानको धर्मका वही लक्षण अभिप्रेत है, जो स्वाभाविक तथा स्वैर मनोवृत्तियोंको मर्यादित करनेके विषयमें ऊपर दिया गया है। मनुष्यकी इंद्रियाँ उसे पशुके समान आचरण करनेके लिये कहा करती हैं, और उसकी बुद्धि उसको विरुद्ध दिशामें खींचा करती है। इस कलहाग्निमें जो लोग अपने शरीरमें संचार करनेवाले पशुत्वका यज्ञ करके कृतकृत्य (सफल) होते हैं, उन्हेंही सच्चा याज्ञिक कहना चाहिये, और वेही धन्य हैं। धर्मको 'आचार-प्रभव' कहिये, 'धारणात्' धर्म मानिये अथवा 'चोदनालक्षण' धर्म समझिये; धर्मकी यानी व्यावहारिक नीतिबंधनोंकी कोईभी व्याख्या अपनाइये; परंतु जब धर्म-अधर्मका संशय उत्पन्न होता है, तब उसका निर्णय करनेके लिये उपर्युक्त तीनों लक्षणोंका कुछ उपयोग नहीं होता। पहली व्याख्यासे सिर्फ यह मालूम होता है, कि धर्मका मूलस्वरूप क्या है; उसका बाह्य उपयोग दूसरी व्याख्यासे मालूम होता है; और तीसरी व्याख्यासे यही बोध होता है, कि पहले पहल किसीने धर्मकी मर्यादा निश्चित कर दी है। परंतु अनेक आचारोंमें भेद पाया जाता है; इतनाही नहीं तो एकही कर्मके अनेक परिणाम होते हैं; और अनेक ऋषियोंकी आज्ञाएँ अर्थात् 'चोदना'भी भिन्न भिन्न हैं। इन कारणोंसे संशयके समय धर्मनिर्णयके लिये किसी दूसरे मार्गको ढूँढनेकी आवश्यकता होती है। यह मार्ग कौन-सा है ? यही प्रश्न यक्षने युधिष्ठिरसे किया था। उसपर युधिष्ठिरने उत्तर दिया है कि :- तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्नाः नैको ऋषिर्यस्य वचः प्रमाणम् । धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पंथाः ॥ "यदि तर्कको देखें तो वह चंचल है, अर्थात् जिसकी बुद्धि जैसी तीव्र होती है वैसेही अनेक प्रकारके अनेक अनुमान तर्कसे निष्पन्न हो जाते हैं। श्रुति अर्थात् वेदाज्ञाएँ देखी जायें तो वेभी भिन्न भिन्न हैं, और यदि स्मृतिशास्त्रको देखें तो ऐसा एकभी ऋषि नहीं है, जिसका वचन अन्य ऋषियोंकी अपेक्षा अधिक प्रमाणभूत समझा जाय । अच्छा, ( इस व्यावहारिक ) धर्मका मूलभूततत्त्व देखा जाय, तो वहभी अंधकारमें छिपा हुआ है अर्थात् वह साधारण मनुष्योंकी समझमें नहीं आ सकता ! इसलिये महाजन जिस मार्गसे गये हों, वही (धर्मका) मार्ग है" (मभा. वन. ३१२. ११५) ठीक है ! परंतु महाजन किसको कहना चाहिये ? उसका अर्थ "बड़ा अथवा बहुतसा जनसमूह" नहीं हो सकता । क्योंकि इन साधारण लोगोंके मनमें धर्म-अधर्मकी शंका कभी उत्पन्न नही होती, उनके बतलाये मार्गसे जाना मानो कठोपनिषद्में वर्णित 'अंधेनैव नीयमाना यथान्धाः'-वाली नीतिहीको चरितार्थ करना है। अब यदि
७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र महाजनका अर्थ “बड़े बड़े सदाचारी पुरुष” लिया जाय - और यही अर्थ उक्त श्लोकमें अभिप्रेत है - तो उन महाजनोंके आचरणमेंभी एकता कहाँ है ? निष्पाप श्रीरामचंद्रने अग्निद्वारा शुद्ध हो जानेपरभी अपनी पत्नीका त्याग केवल लोका- पवादके लिये किया, और सुग्रीवको अपने पक्षमें मिलानेके लिये उससे 'तुल्यारिमित्र' – अर्थात् जो तेरा शत्रु वही मेरा शत्रु, और जो तेरा मित्र वही मेरा मित्र, इस प्रकार समझौता करके बेचारे वालीका वध किया, यद्यपि उसने श्रीरामचंद्रका कुछ अपराध नहीं किया था। परशुरामने तो पिताकी आज्ञासे प्रत्यक्ष अपनी माताका शिरच्छेद कर डाला। यदि पांडवोंका आचरण देखा जाय तो पाँचोंकी एकही स्त्री थी। स्वर्गके देवताओंको देखें तो कोई अहल्याका सतीत्व भ्रष्ट करनेवाला है, और कोई (ब्रह्मा) मृगरूपसे अपनीही कन्याका अभिलाष करनेके कारण रुद्रके बाणसे विद्ध होकर आकाशमें पड़ा हुआ है। (ऐ. ब्रा. ३. ३३) इन्हीं बातोंको मनमें लाकर 'उत्तररामचरित' नाटकमें भवभूतिने लवके मुखसे कहलाया है, कि “वृद्धास्ते न विचारणीयचरिताः” - इन वृद्धोंके कृत्योंका बहुत विचार नहीं करना चाहिये। अंग्रेजीमें शैतानका इतिहास लिखनेवाले एक ग्रंथकारने लिखा है, कि शैतानके साथियों और देवदूतोंके झगडोंका हाल देखनेसे मालूम होता है, कि कई बार देवताओंने ही दैत्योंको कपटजालमें फँसा लिया है। इसी प्रकार कौषीतकी ब्राह्मणो- पनिषद् (कौषी. ३. १ और ऐ. ब्रा. ७. २८) में इंद्र प्रतर्दनसे कहता है कि “मैंने वृत्रको (यद्यपि वह ब्राह्मण था) मार डाला; अरुन्मुख संन्यासियोंके टुकड़े टुकड़े करके भेडियोंको (खानेके लिये) दिये; और अपनी कई प्रतिज्ञाओंका भंग करके प्रल्हादके नातेदारों और गोत्रजोंका तथा पौलोम और कालखंज नामक दैत्योंका वध किया। (इससे) मेरा एक बालभी बाँका नहीं हुआ – “तस्यमें तन्न लोम च मा मीयते!” यदि कोई कहे, कि "तुम्हें इन महात्माओंके बुरे कर्मोंकी ओर ध्यान देनेका कुछभी कारण नहीं है; जैसा कि तैत्तिरीयोपनिषद (तैत्ति. १. ११. २) में बतलाया है; उनके जो कर्म अच्छे हों, उन्हींका अनुकरण करो; बाकी सब छोड़ दो। उदाहरणार्थ, परशुरामके समान पिताकी आज्ञाका पालन करो; परंतु माताकी हत्या मत करो'; तो वही पहला प्रश्न फिरभी उठता है, कि बुरा कर्म और भला कर्म समझनेके लिये साधन क्या है? इसलिये अपनी करनीका उक्त प्रकारसे वर्णनकर इंद्र प्रतर्दनसे फिर कहता है, “जो पूर्ण आत्मज्ञानी है, उसे मातृवध, पितृवध भ्रूणहत्या अथवा स्तेय (चोरी) इत्यादि किसीभी कर्मका दोष नही लगता। इस बातको भलीभांति समझ ले, कि आत्मा किसे कहते हैं - ऐसा करनेसे तेरे सारे संशयोंकी निवृत्ति हो जायगी।” इसके बाद इंद्रने प्रतर्दनको आत्मविद्याका उपदेश दिया। सारांश यह है, कि "महाजनो येन गतः स पंथाः" यह युक्ति यद्यपि सामान्य लोगोंके लिये सरल है, तोभी सब बातोंमें इससे निर्वाह नहीं हो सकता; और अंतमें महाजनोंके आचरणका सच्चा तत्त्व कितनाभी गूढ हो, तोभी आत्मज्ञानमें
कर्मयोगशास्त्र ७३ घुसकर विचारवान् पुरुषोंको उसे ढूंढ़ निकालनाही पड़ता है। "न देवचरितं चरेत्" - देवताओंके केवल बाहरी चरित्रके अनुसार आचरण नहीं करना चाहिये
- इस उपदेशका रहस्यभी यही है। इसके सिवा, कर्म-अकर्मका निर्णय करनेके लिये कुछ लोगोंने एक और सरल युक्ति बतलाई है। उनका कहना है, कि कोईभी सद्गुण हो, उसकी अधिकता न होने देनेके लिये हमें हमेशा यत्न करते रहना चाहिये; क्योंकि इस अधिकतासेही अंतमें सद्गुण दुर्गुण बन बैठता है। जैसे, दान सचमुच सद्गुण है; परंतु 'अतिदानाद्बलिर्बद्धः' - दानकी अधिकता होनेसेही राजा बलिने धोखा खाया। प्रसिद्ध यूनानी पंडित ॲरिस्टॉटलने अपने नीतिशास्त्रके ग्रंथमें कर्म-अकर्मके निर्णयकी यही युक्ति बतलाई है; और स्पष्टतया दिखलाया है, कि प्रत्येक सद्गुणकी अधिकता होनेपर दुर्दशा कैसे हो जाती है। कालिदासनेभी रघुवंशमें वर्णन किया है, कि केवल शूरता व्याघ्र सरीखे श्वापदका क्रूर काम है, और केवल नीतिभी डर- पोकपन है; इसलिये अतिथि राजा तलवार और रणनीतिके योग्य मिश्रणसे अपने राज्यका प्रबंध करता था (रघु. १७.४७)। भर्तृहरि आदियोंनेभी कुछ गुण-दोषोंका वर्णन कर कहा है, कि यदि ज्यादा बोलना वाचालताका लक्षण है, और कम बोलना गुम्मापन है; ज्यादा खर्च करे तो उड़ाऊ और कम करे तो कंजूस, आगे बढ़े तो दुःसाहसी और पीछे हटे तो ढीला, अतिशय आग्रह करे तो जिद्दी और न करे तो चंचल, ज्यादा खुशामत करे तो नीच और ऐंठ दिखलावे तो घमंडी है; परंतु इस प्रकारकी स्थूल कसौटीसे अंततक निर्वाह नहीं हो सकता। क्योंकि, 'अति' किसे कहते हैं और 'नियमित' किसे कहते हैं- इसकाभी तो कुछ निर्णय होना चाहिये न; तथा, यह निर्णय कौन और किस प्रकार करे ? किसी एकको अथवा किसी एक समयपर जो बात 'अति' होगी वही दूसरेको, अथवा दूसरे समयपर कम हो जायगी। हनुमानजीको, पैदा होतेही सूर्यको पकड़नेके लिये उड़ान भरना कोई कठिन काम नहीं मालूम पड़ा (वा. रामा. ७. ३५); परंतु यही बात औरोंके लिये कठिन क्या असंभव जान पड़ती। इसलिये जब धर्म-अधर्मके विषयमें संदेह उत्पन्न हो, तब प्रत्येक मनुष्यको ठीक वैसाही निर्णय करना पड़ता है, जैसा श्येनने राजा शिबीसे कहा है :- अविरोधात्तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम। विरोधिषु महीपाल निश्चित्य गुरुलाघवम्। न बाधा विद्यते यत्र तं धर्मं समुपाचरेत् ॥ अर्थात् परस्पर-विरुद्ध धर्मोंका तारतम्य अथवा लघुता और गुरुता देखकरही, प्रत्येक प्रसंगपर, अपनी बुद्धिके द्वारा सच्चे धर्म अथवा कर्मका निर्णय करना चाहिये (मभा. वन. १३१. ११, १२ और मनु. ६. २९९)। परंतु इतनेहीसे यहभी नहीं कहा जा सकता, कि धर्म-अधर्मके सार-असारका विचार करनाही शंकाके समय, धर्म-निर्णयकी एक सच्ची कसौटी है। क्योकि व्यवहारमें अनेक बार देखा जाता है, कि अनेक पंडित लोग अपनी बुद्धिके अनुसार सार-असारका विचारभी
७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भिन्न भिन्न प्रकारसे किया करते है; और एकही बातकी नीतिमत्ताका निर्णयभी भिन्न भिन्नसे किया करते हैं। यही अर्थ उपर्युक्त 'तर्कोऽप्रतिष्ठ:' वचन प्रकारमें दिया गया है। इसलिये अब हमें यह जानना चाहिये, कि धर्म-अधर्म-संशयके इन प्रश्नोंका अचूक निर्णय करनेके लिये अन्य कोई साधन या उपाय हैं या नहीं; यदि हैं तो कौनसे हैं; और यदि अनेक उपाय हों तो उनमें श्रेष्ठ कौन है। बस, इस बातका निर्णय कर देनाही शास्त्रका काम है। शास्त्रका यही लक्षण है, कि "अनेक संशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम्"-अर्थात् अनेक शंकाओंके उत्पन्न होनेपर, सबसे पहले उन विषयोंके गुत्थमगुत्थेको सुलझा दे, जो समझमें नहीं आ सकते हैं; फिर उनके अर्थको सुगम और स्पष्ट कर दे और जो बातें आँखोंसे दीख न पड़ती हों उनका, अथवा आगे होनेवाली बातोंकाभी यथार्थ ज्ञान करा दे। जब हम इस बातको सोचते हैं, कि ज्योतिषशास्त्रके सीखनेसे आगे होनेवाले ग्रहणोंकाभी सब हाल मालूम हो जाता है, तब उक्त लक्षणके "परोक्षार्थस्य दर्शकम्" इस दूसरे भागकी सार्थकता अच्छी तरह दीख पड़ती है। परंतु अनेक संशयोंका समाधान करनेके लिये पहले यह जानना चाहिये, कि वे कौन-सी शंकाएँ हैं। इसीलिये प्राचीन और अर्वाचीन ग्रंथकारोंकी यह रीत है, कि किसीभी शास्त्रका सिद्धान्तपक्ष बत- लानेके पहले उस विषयमें जितने पक्ष हो गये हों, उनका विचार करके उनके दोष और उनकी न्यूनताएँ दिखलाई जाती हैं। इसी रीतिको स्वीकार करके गीतामें कर्म-अकर्म निर्णयके लिये प्रतिपादन किया हुआ सिद्धान्त-पक्षीय योग अर्थात् युक्ति बतलानेके पहले, इसी कामके लिये जो अन्य युक्तियाँ पंडित लोग बतलाया करते हैं, उनकाभी अब हम विचार करेंगे। यह बात सच है, कि ये युक्तियाँ हमारे यहाँ पहले विशेष प्रचारमें न थीं; और विशेष करके पश्चिमी पंडितोंनेही वर्तमान समयमें उनका प्रचार किया है; परंतु इतनेहीसे यह नहीं कहा जा सकता, कि उनकी चर्चा इस ग्रंथमें न की जावे। क्योंकि न केवल तुलनाहीके लिये, परंतु गीताके आध्यात्मिक कर्मयोगका महत्त्व ध्यानमें लानेके लियेभी इन युक्तियोंको-संक्षेपमेंभी क्यों न हो-जान लेना अत्यंत आवश्यक है।