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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र है। मनुष्य जो कुछ करता है, वह सब यज्ञके लिये करता है। यदि उसे धन कमाना है, तो यज्ञके लिये और धान्य-संग्रह करना है, तो यज्ञहीके लिये (महा. शां. २६. २५)। जबकि यज्ञ करनेकी आज्ञा वेदोंहीने दी है, तब यज्ञके लिये मनुष्य कुछभी कर्म करे; वह उसको बंधक नहीं होगा। वह कर्म यज्ञका एक साधन है - वह स्वतंत्र रीतिसे साध्य वस्तु नहीं है। इसलिगे यज्ञसे जो फल मिलनेवाला हे, उसीमें उस कर्मके फलकाभी समावेश हो जाता है - उस कर्मका कोई अलग फल नहीं होता। परंतु यज्ञके लिये किये गये ये कर्म यद्यपि स्वतंत्र फल देनेवाले नहीं हैं, तथापि स्वयं यज्ञसे स्वर्गप्राप्ति (अर्थात् मीमांसकोंके मतानुसार एक प्रकारकी सुखप्राप्ति) होती है; और इस स्वर्गप्राप्तिके लियेही यज्ञकर्ता मनुष्य बड़े चावसे यज्ञ करता है। इसीसे स्वयं यज्ञकर्म 'पुरुषार्थ' कहलाता है; क्योंकि जिस वस्तुसे किसी मनुष्यकी प्रीति होती है और जिसे पानेकी उसके मनमें इच्छा होती है; उसे 'पुरुषार्थ' कहते हैं (जै. सू. ४. १. १. और २)। यज्ञका पर्यायवाची 'ऋतु' शब्द है। इसलिये 'यज्ञार्थ' के बदले 'ऋत्वर्थ' भी कहा करते हैं। इस प्रकार सब कर्मोंके दो वर्ग हो गये : एक 'यज्ञार्थ' (ऋत्वर्थ) कर्म, अर्थात् जो स्वतंत्र रीतिसे फल नहीं देते, अतएव अबंधक हैं; और दूसरे 'पुरुषार्थ' कर्म, अर्थात् जो पुरुषको लाभकारी होनेके कारण बंधक है। संहिता और ब्राह्मण ग्रंथोंमें सारा वर्णन यज्ञ-यागादिकोंकाही है। ऋग्वेद संहितामें इंद्र आदि देवताओंकी स्तुति-संबंधी सूक्त हैं, तथापि मीमांसकगण कहते हैं, कि सब श्रुतिग्रंथ यज्ञ आदि कर्मोंहीके प्रतिपादक हैं, क्योंकि उनका विनियोग यज्ञके समयमेंही किया जाता है। इन कर्मठ, याज्ञिक या केवल कर्मवादियोंका कहना है, कि वेदोक्त यज्ञ-याग आदि कर्म करनेसेही स्वर्गप्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं होती। चाहे ये यज्ञ-याग अज्ञानसे किये जायें या ब्रह्मज्ञान से। यद्यपि उपनिषदोंमें ये यज्ञ ग्राह्य माने गये हैं, तथापि इनकी योग्यता ब्रह्मज्ञानसे कम ठहराई गयी है। इसलिये निश्चय किया गया है, कि यज्ञ-यागसे स्वर्गप्राप्ति भलेही हो जाय; परंतु इनके द्वारा सच्चा मोक्ष नहीं मिल सकता। मोक्षप्राप्तिके लिये ब्रह्मज्ञानहीकी नितान्त आवश्यकता है। भगवद्गीताके दूसरे अध्यायमें जिन यज्ञ-याग आदि काम्य कर्मोंका वर्णन किया है - "वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः" (गीता २. ४२)

  • वे ब्रह्मज्ञानके बिना किये जानेवाले उपर्युक्त यज्ञ-याग आदि कर्मही हैं। इसी तरह यहभी मीमांसकोंहीके मतका अनुवाद है, कि "यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः" (गीता ३. ९) अर्थात् यज्ञार्थ किये गये कर्म बंधक नहीं हैं; शेष सब कर्म बंधक हैं। इन यज्ञ-याग आदि वैदिक कर्मोंके अतिरिक्त, अर्थात् श्रौत कर्मोंके अति- रिक्त औरभी चातुर्वर्ण्यके भेदानुसार दूसरे आवश्यक धार्मिक कर्म मनुस्मृति आदि धर्मग्रंथोंमें वर्णित हैं; जैसे क्षत्रियके लिये युद्ध और वैश्यके लिये वाणिज्य। पहले पहल इन वर्णाश्रम-कर्मोंका प्रतिपादन स्मृति-ग्रंथोंमें किया गया था। इसलिये इन्हें 'स्मार्त कर्म' या 'स्मार्त यज्ञ' भी कहते हैं। इन श्रौत-स्मार्त कर्मोंके सिवा औरभी