भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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कर्मयोगशास्त्र ५३ कमका त्याग करना मूर्खता और दुर्बलताका सूचक है; इससे तुझे स्वर्ग तो मिलेगाही नहीं, उलटे दुष्कीर्ति अवश्य होगी।" तब श्रीभगवानने पहले "अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे" अर्थात् जिस बातका शोक नहीं करना चाहिये, उसीका तो तू शोक कर रहा है; और साथ साथ ब्रह्मज्ञानकीभी बड़ी बड़ी बातें छाँट रहा है - कहकर अर्जुनका कुछ थोड़ा-सा उपहास किया; और फिर उसको कर्मके ज्ञानका उपदेश दिया। अर्जुनकी शंका निराधार नहीं थी। गत प्रकरणमें हमने यह दिखलाया है, कि अच्छे अच्छे पंडितोंकीभी कभी कभी "क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये?" यह प्रश्न चक्करमें डाल देता है। परंतु कर्म-अकर्मकी चिंतामें अनेक अड़चनें आती हैं, इसलिये कर्म छोड़ देना उचित नहीं है। विचारवान् पुरुषोंको ऐसी युक्ति अर्थात् 'योग'का स्वीकार करना चाहिये, जिससे सांसारिक कर्मोंका लोप तो होने न पावे, और कर्माचरण करनेवाला किसी पाप या बंधनमेंभी न फँसे; - यह कहकर श्रीकृष्णने अर्जुनको पहले यही उपदेश दिया है, "तस्माद्योगाय युज्यस्व" - अर्थात् तृभी इसी युक्तिका स्वीकार कर। यही 'योग' कर्मयोगशास्त्र है। और जब कि यह बात प्रगट है, कि अर्जुनपर आया हुआ संकट कुछ लोक-विलक्षण या अनोखा नहीं था - ऐसे अनेक छोटे-बड़े संकट संसारमें सभी लोगोंपर आया करते हैं - तब तो यह बात आव- श्यक है, कि इस कर्मयोगशास्त्रका जो विवेचन भगवद्गीतामें किया है, उसे हर- एक मनुष्य सीखे। किसीभी शास्त्रके प्रतिपादनमें कुछ मुख्य और गूढ़ अर्थको प्रकट करनेवाले शब्दोंका प्रयोग किया जाता है। अतएव उनके सरल अर्थको पहले जान लेना चाहिये; और यहभी देख लेना चाहिये, कि उस शास्त्रके प्रतिपादनकी मूल शैली कैसी है। नहीं तो फिर उसके समझनेमें कई प्रकारकी आपत्तियाँ और बाधाएँ उत्पन्न होती हैं। इसलिये कर्मयोगशास्त्रके कुछ मुख्य मुख्य शब्दोंके अर्थकी परीक्षा यहाँपर की जाती है। सबसे पहला शब्द 'कर्म' है। 'कर्म' शब्द 'कृ' धातुसे बना है। उसका अर्थ 'करना, व्यापार, हलचल' होता है; और इसी सामान्य अर्थमें गीतामें उसका उप- योग हुआ है - अर्थात् यही अर्थ गीतामें विवक्षित है। ऐसा कहनेका कारण यही है, कि मीमांसाशास्त्रमें और अन्य स्थानोंपरभी इस शब्दके जो संकुचित अर्थ दिये गये हैं, उनके कारण पाठकोंके मनमें कुछ भ्रम उत्पन्न न होने पावे। किसीभी धर्मको लीजिये; उसमें ईश्वर प्राप्तिके लिये कुछ-न-कुछ कर्म करनेके लिये कहा है। प्राचीन वैदिक धर्मके अनुसार देखा जाय, तो यज्ञयागही वह कर्म है; जिससे ईश्वरकी प्राप्ति होती है। वैदिक ग्रंथोंमें यज्ञ-यागकी विधि बताई गयी हैं; परंतु इसके विषयमें कहीं कहीं परस्पर-विरोधी वचनभी पाये जाते हैं। अतएव उनकी एकता और मेल दिखलानेकेही लिये जैमिनीके पूर्वमीमांसाशास्त्रका प्रचार हुआ है। जैमिनीके मतानुसार वैदिक या श्रौत यज्ञ-याग करनाही प्रधान और प्राचीन धर्म