भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 99

तीसरा प्रकरण कर्मयोगशास्त्र तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् । * — गीता २. ५० यदि किसी मनुष्यको किसी शास्त्रके जाननेकी इच्छा पहलेहीसे न हो, तो वह उस शास्त्रके ज्ञानको पानेका अधिकारी नहीं हो सकता । ऐसे अधिकार- रहित मनुष्यको उस शास्त्रकी शिक्षा देना मानों चलनीमें दूध दुहनाही है । शिष्यको तो इस शिक्षासे कुछ लाभ होता नहीं; परंतु गुरुकोभी निरर्थक श्रम करके समय नष्ट करना पड़ता है । जैमिनी और बादरायणके सूत्रोंके आरंभमें इसी कारणसे “ अथातो धर्मजिज्ञासा ” और “ अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ” कहा हुआ है। जैसे ब्रह्मो- पदेश मुमुक्षुओंको और धर्मोपदेश धर्मेच्छुओंको देना चाहिये; वैसेही कर्मशास्त्रोपदेश उसी मनुष्यको देना चाहिये, जिसे यह जाननेकी इच्छा या जिज्ञासा हो, कि संसारमें कर्म कैसे करना चाहिये । इसीलिये हमने पहले प्रकरणमें, 'अथातो' कहकर, दूसरे प्रकरणमें 'कर्मजिज्ञासा' का स्वरूप और कर्मयोगशास्त्रका महत्त्व बतलाया है । जबतक पहलेहीसे इस बातका अनुभव न कर लिया जाय, कि अमुक काममें अमुक रुकावट है, तबतक उस रुकावटसे छुटकारा पानेकी शिक्षा देनेवाले शास्त्रका महत्त्व ध्यानमें नहीं आता; और महत्त्वको न जाननेसे केवल रटा हुआ शास्त्र समयपर ध्यानमें रहताभी नहीं है। यही कारण है, कि जो सद्गुरु हैं, वे पहले यह देखते हैं, कि शिष्यके मनमें जिज्ञासा है या नहीं; और यदि जिज्ञासा न हो, तो वे पहले उसीको जागृत करनेका प्रयत्न किया करते हैं । गीतामें कर्मयोगशास्त्रका विवेचन इसी पद्धतिसे किया गया है । जब अर्जुनके मनमें यह शंका आई, कि जिस लड़ाईमें मेरे हाथसे पितृवध और गुरुवध होगा, तथा जिसमें सभी राजाओं और अपने सब बंधुओंका नाश हो जाएगा, उसमें शामिल होना उचित है या अनुचित; और जब वह युद्धसे पराङ्मुख होकर संन्यास लेनेको तैयार हुआ; और जब भगवानके इस सामान्य युक्तिवादसेभी उसके मनका समाधान नहीं हुआ, कि “समयपर किये जानेवाले

  • “इसलिये तू योगका आश्रय ले । कर्म करनेकी जो रीति, चतुराई या कुशलता है उसे योग कहते हैं” यह 'योग' शब्दकी व्याख्या अर्थात लक्षण है। इसके संबंधमे अधिक विचार इसी प्रकरणमे आगे चलकर किया है।