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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

आधिभौतिक सुखवाद [७९]

मतका केवल उल्लेख करनाही उसका खंडन करना कहा जा सकता है। दूसरोंके हित-अनहितकी कुछभी परवाह न करके सिर्फ अपने खुदके विषयोपभोग-सुखको परम-पुरुषार्थ मान कर नीतिमत्ता और धर्मको ठुकरा देनेवाले आधिभौतिक वादियोंकी यह अत्यंत कनिष्ठ श्रेणी कर्मयोगशास्त्रके सब ग्रंथकारोंके द्वारा, और सामान्य लोगोंके द्वाराभी बहुतही अनीति की, त्याज्य और गर्ह्य मानी गई है। अधिक क्या कहा जाय, यह पंथ नीतिशास्त्र अथवा नीतिविवेचनके नामकोभी पात्र नहीं है। इसलिये इसके बारेमें अधिक विचार न करके आधिभौतिक सुखवादियोंके दूसरे वर्गकी ओर ध्यान देना चाहिये। खुल्लमखुल्ला या प्रकट स्वार्थ संसारमें चल नहीं सकता। क्योंकि यह प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है, कि यद्यपि आधिभौतिक विषयसुख प्रत्येकको इष्ट होता है; तथापि जब हमारा सुख अन्य लोगोंके सुखोपभोगमें बाधा डालता है, तब वे लोग बिना विघ्न उपस्थित किये नहीं रहते। इसलिये दूसरे कई आधिभौतिक पंडित प्रतिपादन किया करते हैं, कि यद्यपि स्वयं अपना सुख या स्वार्थ-साधनही हमेशा उद्देश्य है, तथापि सब लोगोंको अपनेही समान रियायत दिये बिना सुखका मिलना संभव नहीं है। इसलिये अपने सुखके लियेही दूरदर्शिताके साथ अन्य लोगोंके सुखकी ओरभी ध्यान देना चाहिये। इन आधिभौतिकवादियोंकी गणना हम दूसरे वर्गमें करते हैं। बल्कि यह कहना चाहिये, कि नीतिकी आधिभौतिक उपपत्तिका यथार्थ आरंभ यहींसे होता है। क्योंकि इस वर्गके लोग चार्वाकके मतानुसार यह नहीं कहते, कि समाज-सुधारके लिये नीतिके बंधनोंकी कुछ आवश्यकताही नहीं है। किंतु इन लोगोंने अपनी विचारदृष्टिसे इस बातका कारण बतलाया है, कि सभी लोगोंको उनका पालन क्यों करना चाहिये। इनका कहना यह है, कि यदि इस बातका सूक्ष्म विचार किया जाय, कि संसारमें अहिंसा-धर्म कैसे चला और लोग उसका पालन क्यों करते हैं, तो यही मालूम होगा, कि ऐसे स्वार्थमूलक भयके सिवा उसका दूसरा कोई कारण नहीं है, जो इस वाक्यसे प्रकट होता है - "यदि मैं लोगोंको मारूँगा तो वे मुझेभी मार लेंगे; और फिर मुझे अपने सुखोंसे हाथ धोना पड़ेगा।" अहिंसा-धर्मके अनुसारही अन्य सब धर्मभी इसी या ऐसेही स्वार्थ- मूलक कारणोंसे प्रचलित हुए हैं। हमें दुःख हुआ, तो हम रोते हैं; और दूसरोंको हुआ, तो हमें दया आती है। क्यों ? इसी लिये न, कि हमारे मनमें यह डर पैदा होता है, कि कहीं भविष्यमें हमारीभी ऐसीही दुःखमय अवस्था न हो जाय। परोपकार, उदारता, दया, ममता, कृतज्ञता, नम्रता, मित्रता इत्यादि जो गुण लोगोंके सुखके लिये आवश्यक मालूम देते हैं, वे सब - यदि उनका मूलस्वरूप देखा जाय तो - अपनेही सुखके लिये या अपनेही दुःखनिवारणार्थ हैं। कोई किसीकी सहायता करता है, या कोई किसीको दान देता है। क्यों ? इसीलिये न कि जब हमपरभी आ बीतेगी, तब वे हमारी सहायता करेंगे। हम अन्य लोगोंको इसलिये प्यार करते

८० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

हैं, कि वेभी हमको प्यार करें। और कुछ नहीं तो हमारे मनमें यह स्वार्थमूलक हेतु अवश्य रहता है कि लोग हमें अच्छा कहें। परोपकार और परार्थ दोनों शब्द केवल भ्रांतिमूलक हैं। यदि कुछ सच्चा है तो स्वार्थ; और स्वार्थ कहते हैं अपने लिये सुख-प्राप्ति या अपने दुःख-निवारणको । माता बच्चेको दूध पिलाती है; इसका कारण यह नहीं है, कि वह बच्चेसे प्रेम करती हो; सच्चा कारण तो यही है, कि उसके स्तनोंमें दूध भर जानेसे उसे जो दुःख होता है, उसे कम करनेके लिये - अथवा भविष्यमें यही लड़का मुझे प्यार करके सुख देगा, इस स्वार्थ-सिद्धिके लियेही वह उपाय करती है - इस प्रकार उक्त कथनका अर्थ होता है। इस बातको दूसरे वर्गके आधिभौतिकवादी मानते हैं, कि स्वयं अपनेही सुखके लियेभी क्यों न हो, परंतु भविष्यपर दृष्टि रखकर ऐसे नीतिधर्मका पालन करना चाहिये, कि जिससे दूसरोंको भी सुख हो । बस, यही इस मतमें और चार्वाकके मतमें भेद है। तथापि चार्वाक मतके अनुसार इस मतमेंभी यह माना जाता है, कि मनुष्य केवल विषय-सुखमें, रूप स्वार्थमें ढला हुआ एक पुतला है। इंग्लैंडमें हॉब्स और फ्रान्समें हेल्वेशिअसने इस बातका प्रतिपादन किया है। परंतु इस मतके अनुयायी अब न तो इंग्लैंडमेंही और न कही बाहरभी अधिक मिलेंगे। हॉब्सके नीतिधर्मकी इस उपपत्तिके प्रसिद्ध होनेपर बटलरसरीखे* विद्वानोंने उसका खंडन करके सिद्ध किया, कि मनुष्य-स्वभाव केवल स्वार्थी नहीं है; स्वार्थके समानही उसमें जन्मसेही भूतदया, प्रेम, कृतज्ञता आदि सद्गुणभी कुछ अंशमें रहते हैं। इसलिये किसी व्यवहार या कर्मका नैतिक दृष्टिसे विचार करते समय केवल स्वार्थ या दूरदर्शी स्वार्थकी ओर ही ध्यान न दे कर मनुष्य-स्वभावकी दो स्वाभाविक प्रवृत्तियों ( अर्थात् स्वार्थ और परार्थ ) की ओर नित्य ध्यान देना चाहिये। जब हम देखते हैं कि व्याघ्र सरीखे क्रूर जानवरभी अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये प्राण देनेको तैयार हो जाते हैं, तब हम यह कभी नही कह सकते कि मनुष्यके हृदयमें प्रेम और परोपकारबुद्धि जैसे सद्गुण केवल स्वार्थहीसे उत्पन्न हुए हैं। इससे सिद्ध होता है, कि धर्म-अधर्मकी परीक्षा केवल दूरदर्शी स्वार्थसे करना शास्त्रकी दृष्टिसेभी उचित नहीं है। यह बात हमारे प्राचीन पंडितोंकोभी अच्छी तरहसे मालूम थी, कि केवल संसारमें लिप्त रहनेके कारण जिस मनुष्यकी बुद्धि शुद्ध नहीं रहती है, वह मनुष्य जो कुछ परोपकारके नामसे करता है, बहुधा अपनेही हितके लिये करता है। महाराष्ट्रमें तुकाराम महाराज एक बड़े भारी भगवद्भक्त हो गये हैं। वे कहते हैं, कि " बह


  • हॉब्सका मत उसके Leviathan नामक ग्रंथमें संग्रहीत है, तथा बटलरका मत उसके Sermon on Human Nature नामक निबंधमें है। हेल्वेशिअसकी पुस्तकका सारांश मोर्लेने अपने Diderot विषयक ग्रंथ (Vol. II, Chap. V) में दिया है।

आधिभौतिक सुखवाद ८१ दिखलानेके लिये तो रोती है सासके हितके लिये; परंतु हृदयका भाव कुछ औरही रहता है। (तु. गा. ३५८३. २)" बहुतसे पंडित तो हेल्वेशिअमसेभी आगे बढ़ गये हैं। उदाहरणार्थ, "मनुष्यकी स्वार्थप्रवृत्ति तथा परार्थप्रवृत्तिभी दोषमय होती है" - "प्रवर्त्तनालक्षणा दोषाः" इस गौतम-न्यायसूत्र (१. १. १८) के आधारपर ब्रह्मसूत्रभाष्यमें श्रीशंकराचार्यने जो कुछ कहा है (वे. सू. शां. भा. २. २. ३), उसपर टीका करते हुए आनंदगिरि लिखते हैं, कि "जब हमारे हृदयमें कारुण्यवृत्ति जागृत होती है, और हमको उससे जो दुःख होता है, उस दुःखको हटानेके लिये हम अन्य लोगोंपर दया या परोपकार किया करते हैं।" आनंदगिरिका यही युक्तिवाद प्रायः हमारे सब संन्यासमार्गीय ग्रंथोंमें पाया जाता है; जिससे यह सिद्ध करनेका प्रयत्न दीख पड़ता है, कि सब कर्म स्वार्थमूलक होनेके कारण त्याज्य हैं। परंतु बृह- दारण्यकोपनिषद् (बृ. २. ४. ४. ५) में याज्ञवल्क्य और उनकी पत्नी मैत्रेयीका जो संवाद दो स्थानोंपर है, उसमें इसी युक्तिवादका उपयोग एक दूसरीही अद्भुत रीतिसे किया गया है। मैत्रेयीने पूछा "हम अमर कैसे बनेंगे?" इस प्रश्नका उत्तर देते समय याज्ञवल्क्य उससे कहते हैं, "हे मैत्रेयी! स्त्री अपने पतिको चाहती है, वह पतिहीके लिये नहीं किंतु वह अपनी आत्माके लिये उसे चाहती है। इसी तरह हम अपने पुत्रसे उसके हितार्थ प्रेम नहीं करते; किंतु हम स्वयं अपनेही लिये उससे प्रेम करते हैं।* द्रव्य, पशु और अन्य वस्तुओंके लियेभी यही न्याय उपयुक्त है। "आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति" - अपने आत्माके प्रीत्यर्थही सब पदार्थ हमें प्रिय लगते हैं। और यदि इस तरह सब प्रेम आत्ममूलक है, तो क्या हमको सबसे पहलें यह जाननेका प्रयत्न नहीं करना चाहिये, कि आत्मा (हम) क्या है?" यह कहकर अंतमें याज्ञवल्क्यने यही उपदेश दिया है, "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यः" - अर्थात् "सबसे पहले यह देखो, कि आत्मा कौन है, फिर उसके विषयमें सुनो और उसका मनन तथा ध्यान करो।" इस उपदेशके अनुसार एक बार आत्माके सच्चे स्वरूपकी पहचान होनेपर सब जगत् आत्ममय दिख पड़ने लगता है; और स्वार्थ तथा परार्थका भेदही मनमें रहने नहीं पाता। याज्ञवल्क्यका यह युक्तिवाद दिखनेमें तो हॉब्सके मतानुसारही है; परंतु यह बातभी किसीसे छिपी नहीं है, कि इन दोनोंके निकाले गये अनुमान एक दूसरेके विरुद्ध हैं। हॉब्स स्वार्थहीको प्रधान मानता है; और सब परार्थोंको दूरदर्शी स्वार्थ का ही

  • "What say you of natural affection? Is that also a species of self-love? Yes; All is self-love. Your children are loved only because they are yours. Your friend for a like reason. And Your country engages you only so far as it has a connection with Yourself" ह्यूमनेभी इसी युक्तिवादका उल्लेख अपने Of the Dignity or Meanness of Human Nature नामक निबंधमें किया है। स्वयं ह्यूमका मत इससे भिन्न है। गी. र. ६

८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र एक स्वरूप मानकर कहता है, कि इस संसारमें स्वार्थके सिवा और कुछ नहीं। याज्ञवल्क्य 'स्वार्थ' शब्दके 'स्व' (अपना) पदके आधारपर दिखलाते हैं, कि अध्यात्मदृष्टिसे अपने एकही आत्मामें सब भूतोंका और सब भूतोंमें अपने आत्माका, अविरोध भावसे समावेश कैसे होता है। यह दिखला कर उन्होंने स्वार्थ और परार्थमें दिखनेवाले द्वैतके झगड़ेकी जड़हीको काट डाला है। याज्ञवल्क्यके उक्त मत और संन्यासमार्गीय मतपर अधिक विचार आगे किया जायगा। यहाँपर याज्ञवल्क्य आदियोंके मतोंका उल्लेख यही दिखलानेके लिये किया गया है, कि "सामान्य मनुष्योंकी प्रवृत्ति स्वार्थ-विषयक अर्थात् आत्मसुखविषयक होती है"

  • इस एकही बातको थोड़ा-बहुत महत्त्व दे कर, अथवा इसी एक बातको सर्वथा अपवाद-रहित मान कर, हमारे प्राचीन ग्रंथकारोंने उसी बातसे हॉब्सके विरुद्ध दूसरे अनुमान कैसे निकाले हैं। जब यह बात सिद्ध हो चुकी, कि मनुष्यका स्वभाव केवल स्वार्थमूलक अर्थात् तमोगुणी या राक्षसी नहीं है - जैसा कि अंग्रेजी ग्रंथकार हॉब्स और फ्रेंच पंडित हेल्वैशियस कहते हैं- किंतु मनुष्य-स्वभावमें स्वार्थके साथही परोपकारबुद्धिकी सात्त्विक मनोवृत्तिभी जन्मसे स्वतंत्र रूपसे पाई जाती है। अर्थात् जब यह सिद्ध हो चुका कि परोपकार केवल दूरदर्शी स्वार्थ नहीं है, तब स्वार्थ अर्थात् स्वसुख और परार्थ अर्थात् दूसरोंका सुख, इन दोनों तत्त्वोंपर समदृष्टि रखकर कार्य-अकार्य व्यवस्थाशास्त्रकी रचना करनेकी आवश्यकता प्रतीत हुई। यही आधिभौतिक- वादियोंका तीसरा वर्ग है। इस पक्षमेंभी यह आधिभौतिक मत मान्य है, कि स्वार्थ- परार्थ दोनों सांसारिक सुखवाचक हैं। सांसारिक सुखके परे कुछभी नहीं है। भेद केवल इतनाही है, कि इस पंथके लोग स्वार्थबुद्धिके समान परार्थबुद्धिकोभी स्वाभा- विक मानते हैं। इसलिये वे कहते हैं कि नीतिका विचार करते समय स्वार्थके समान परार्थकी ओरभी ध्यान देना चाहिये। सामान्यतः स्वार्थ और परार्थमें विरोध उत्पन्न नहीं होता; इसलिये मनुष्य जो कुछ करता है, वह सब प्रायः समाजकेभी हितका होता है। यदि किसीने धनसंचय किया, तो उससे समस्त समाजकाभी हित होता है; क्योंकि, अनेक व्यक्तियोंके समूहको समाज कहते हैं; और यदि उस समाजका प्रत्येक व्यक्ति दूसरेकी हानि न कर यदि अपना लाभ करने लगे, तो उसमें कुल समाजका हितही होगा। अतएव इस पंथके लोगोंने निश्चित किया है, कि अपने सुखकी ओर दुर्लक्ष न करके यदि कोई मनुष्य लोकहितका कुछ काम कर सके, तो ऐसा करना उसका कर्तव्य है। परंतु इस पक्षके लोग परार्थकी श्रेष्ठताको स्वीकार नहीं करते; किंतु वे यही कहते हैं, कि हर समय अपनी बुद्धिके अनुसार इस बातका विचार करते रहो, कि स्वार्थ श्रेष्ठ है या परार्थ। इसका परिणाम यह होता है कि जब स्वार्थ और परार्थमें विरोध उत्पन्न होता है, तब इस प्रश्नका निर्णय करने समय बहुधा मनुष्य स्वार्थहीकी ओर अधिक झुक जाया करता है,

आधिभौतिक सुखवाद ८३ कि लोक-सुखके लिये अपने कितने सुखका त्याग करना चाहिये । उदाहरणार्थ, यदि स्वार्थ और परार्थको एक समान प्रबल मान लें, तो सत्यके लिये प्राण देने और राज्य खो देनेकी बात तो दूरही रही; परंतु इस पंथके मतसे यहभी निर्णय नहीं हो सकता, कि बहुतसी द्रव्यकी बहुतसी हानिभी सहनी चाहिये या नहीं। यदि कोई उदार मनुष्य परार्थके लिये प्राण दे दें, तो इस पंथवाले कदाचित् उसकी स्तुति कर देंगे; परंतु जब उनपर आबीतेगी तब स्वार्थ-परार्थ दोनोंहीका आश्रय करनेवाले ये लोग स्वार्थकी ओरही अधिक झुकेंगे। ये लोग, हॉब्सके समान परार्थको एक प्रकारका दूरदर्शी स्वार्थ नहीं मानते, किंतु ये समझते हैं, कि हम स्वार्थ और परार्थको तराजूमें तोल कर उनके तारतम्य अर्थात् उनकी न्यूनाधिकताका विचार करके बड़ी चतुराईसे अपने स्वार्थका निर्णय किया करते हैं। अतएव ये लोग अपने मार्गको 'उदात्त' या बुद्धिमान स्वार्थ (परंतु है तो स्वार्थही) कहकर उसकी बड़ाई मारते हैं;* परंतु देखिये, भर्तृहरिने क्या कहा है :- एके सत्पुरुषाः परार्थघटकाः स्वार्थान् परित्यज्य ये। सामान्यास्तु परार्थमुद्यमभृतः स्वार्थाऽविरोधेन ये ।। तेऽमी मानवराक्षसाः परहितं स्वार्थाय निघ्नन्ति ये । ये तु घ्नन्ति निरर्थकं परहितं ते के न जानीमहे ।। “जो अपने लाभको त्याग कर दूसरोंका हित करते हैं, वेही सच्चे सत्पुरुष हैं। स्वार्थको न छोड़ कर जो लोग लोकहितके लिये प्रयत्न करते हैं, वे पुरुष सामान्य हैं और अपने लाभके लिये जो दूसरोंका नुकसान करते हैं वे केवल नीच मनुष्यही नहीं हैं, उनको मनुष्याकृति राक्षस समझना चाहिये। परंतु एक प्रकारके मनुष्य औरभी हैं, जो लोकहितका निरर्थक नाश किया करते हैं - मालूम नहीं पड़ता कि ऐसे मनुष्योंको क्या नाम दिया जाय” (भर्तृ. नी. श. ७४) इसी तरह राजधर्मकी उत्तम स्थितिका वर्णन करते समय कालिदासनेभी कहा है - स्वसुखनिरभिलाषः खिद्यसे लोकहेतोः । प्रतिदिनमथवा ते वृत्तिरेवंविधैव ।। अर्थात् “तू अपने सुखकी परवाह न करके लोकहितके लिये प्रतिदिन कष्ट उठाया करता है! अथवा तेरी वृत्ति (पेशा) ही यही है” (शाकुं. ५. ७) भर्तृहरि या कालिदास यह जानना नहीं चाहते थे, कि कर्मयोगशास्त्रमें स्वार्थ और परार्थको स्वीकार करके उन दोनों तत्त्वोंके तारतम्य-भावसे धर्म-अधर्म या कर्म-अकर्मका निर्णय कैसे करना चाहिये; तथापि परार्थके लिये स्वार्थ छोड़ देनेवाले पुरुषोंको उन्होंने जो प्रथम स्थान दिया है; वही नीतिकी दृष्टिसेभी न्याय्य है। इसपर

  • अंग्रेजीमें इसे enlightened self-interest कहते हैं। enlightened क भाषांतर 'उदात्त' या बुद्धिमान शब्दोंसे किया है।

८४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इस पंथके लोगोंका यह कहना है, कि "यद्यपि तात्त्विक दृष्टिसे परार्थ श्रेष्ठ है, तथापि परम सीमाकी शुद्ध नीतिकी ओर न देखकर हमें सिर्फ यही निश्चित करना है, कि साधारण व्यवहारमें 'सामान्य' मनुष्योंको कैसे चलना चाहिये । और इसलिये हम 'बुद्धिमान स्वार्थ' को जो अग्रस्थान देते हैं, वही व्यावहारिक दृष्टिसे उचित है !"* परंतु हमारी समझके अनुसार इस युक्तिवादसे कुछ लाभ नहीं है। बाज़ारमें जितने माप-तौल नित्य उपयोगमें लाये जाते हैं, उनमें थोड़ाबहुत फ़र्क रहताही है; बस, यही कारण बतला कर यदि प्रमाणभूत सरकारी माप-तौलमेंभी कुछ न्यूनाधिकता रखी जाय तो क्या उनके खोटे-पनके लिये हम अधिकारियोंको दोष नहीं देंगे ? इसी न्यायका उपयोग कर्मयोगशास्त्रमेंभी किया जा सकता है। नीति- धर्मके पूर्ण, शुद्ध और नित्य स्वरूपका शास्त्रीय निर्णय करनेके लिये ही नीतिशास्त्रकी प्रवृत्ति हुई है; और इस कामको यदि नीतिशास्त्र नहीं करेगा, तो हमें उसको निष्फल कहना पड़ेगा । सिज्विकका यह कथन सत्य है, कि 'बुद्धिमान् स्वार्थ' सामान्य मनुष्योंका मार्ग है। भर्तृहरिका मतभी ऐसाही है ! परंतु यदि इस बातकी खोज की जाय, कि पराकाष्ठाकी नीतिमत्ताके विषयमें उक्त सामान्य लोगोंका क्या मत है; तो यह मालूम होगा कि, सिज्विकने बुद्धिमान स्वार्थको जो महत्त्व दिया है, वह ग़लत है। क्योंकि साधारण लोगभी यही कहते हैं, कि निष्कलंक नीतिके तथा सत्पुरुषोंके आचरणके लिये यह कामचलाऊ मार्ग श्रेयस्कर नहीं है। इसी बातका वर्णन भर्तृहरिने उक्त श्लोकमें किया है। आधिभौतिक सुखवादियोंके निम्नलिखित तीन वर्गोंका अबतक वर्णन किया गया :- (१) केवल स्वार्थी; (२) दूरदर्शी स्वार्थी; और (३) उभयवादी अर्थात् बुद्धिमान स्वार्थी । इन तीन वर्गोंके मुख्य दोषभी बतला दिये गये हैं; परंतु इतनेहीसे सब आधिभौतिक पंथ पूरे नहीं हो जाते । उसके आगे का - और सब आधिभौतिक पंथों में श्रेष्ठ पंथ वह है - जिसमें कुछ सात्त्विक तथा आधिभौतिक पंडितोंने† यह प्रतिपादन किया है, कि "एकही मनुष्यके सुखको न देखकर - सब मनुष्यजातिके आधिभौतिक सुख-दुःखके तारतम्यको देखकरही - नैतिक कार्य-अकार्यका निर्णय करना चाहिये ।" एकही कृत्यसे, एकही समयमें, समाजके या संसारके सब लोगोंको सुख होना असंभव है। कोई एक बात किसीको सुखकारक मालूम होती

  • Sidgwick's Methods of Ethics, Book I, Chap. II § 2. pp. 18-29; also, Book IV, Chap. IV § 3 p. 474. यह तीसरा पंथ कुछ सिज्विकका निकाला हुआ नहीं है; सामान्य सुशिक्षित अंग्रेज़ी लोक प्रायः इसी पंथके अनुयायी हैं। इसे Common-sense morality कहते हैं । † बेंथेम, मिल आदि पंडित इस पंथके अगुआ हैं। Greatest good of the greatest number का हमने "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" यह भाषांतर किया है।

आधिभौतिक सुखवाद ८५

है, तो वही दूसरेको दुःखदायक हो जाती है। परंतु जैसे घुग्घूको प्रकाश नापसंद होनेके कारण कोई प्रकाशहीको त्याज्य नहीं कहता, उसी तरह यदि किसी विशिष्ट संप्रदायको कोई बात लाभदायक मालूम न हो तो कर्मयोगशास्त्रमेभी यह नहीं कहा जा सकता, कि वह सभी लोगोंको हितावह नहीं है। और, इसी लिये “सब लोगोंका सुख” इन शब्दोंका अर्थभी “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख” करना पड़ता है। इस पंथके मतका सारांश यह है, कि “जिसमें, अधिकांश लोगोंका अधिक सुख हो, उसी बातको नीतिकी दृष्टिसे उचित और ग्राह्य मानना चाहिये, और उसी प्रकारका आचरण करना इस संसारमें मनुष्यका सच्चा कर्तव्य है।” आधिभौतिक सुखवादियोंका उक्त तत्त्व आध्यात्मिक पंथको मंजूर है। यदि यह कहा जाय तोभी कोई आपत्ति नहीं कि आध्यात्मिकवादियोंनेही इस तत्त्वको अत्यंत प्राचीन कालमें ढूंढ निकाला था। और भेद इतनाही है, कि अब आधिभौतिकवा- दियोंने उसका एक विशिष्ट रीतिसे उपयोग किया है। तुकाराममहाराजने कहा है, कि “संतजनोंकी विभूतियाँ केवल जगतके कल्याणके लिये हैं - वे लोग परोपकार करनेमें अपने शरीरको कष्ट दिया करते हैं।” अर्थात् इस तत्त्वकी सच्चाई और योग्यताके विषयमें कुछभी संदेह नहीं है। स्वयं श्रीमद्भगवद्गीतामेंभी, पूर्ण योगयुक्त अर्थात् कर्मयोगयुक्त ज्ञानी पुरुषोंके लक्षणोंका वर्णन करते हुए, यह बात दो बार स्पष्ट कही गई है, कि वे लोग ‘सर्वभूतहिते रताः’ अर्थात् सब प्राणियोंका कल्याण करनेहीमें निमग्न रहा करते हैं (गी. ५. २५; १२. ४)। इस बातका पता दूसरे प्रकरणमें दिये हुए महाभारतके “यद्भूतहितमत्यंतं तत् सत्यमिति धारणा” वचनसे स्पष्टतया चलता है, कि धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये हमारे शास्त्रकार इस तत्त्वको हमेशा ध्यानमें रखते थे। परंतु हमारे शास्त्रकारोंके कथनानुसार ‘सर्वभूतहित’ को ज्ञानी पुरुषोंके आचरणका बाह्य लक्षण समझ कर धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके किसी विशेष प्रसंगपर स्थूलमानसे उस तत्त्वका उपयोग करना एक बात है, और उसीको नीतिमत्ताका सर्वस्व मान कर - दूसरी किसी बातका विचार न करके - केवल इसी नींव पर नीतिशास्त्रका भव्य भवन निर्माण करना दूसरी बात है। इन दोनोंमें बहुत भिन्नता है। आधिभौतिक पंडित दूसरे मार्गको स्वीकार करके प्रतिपादन करते हैं, कि नीतिशास्त्रका अध्यात्मविद्यामें कुछभी संबंध नहीं है। इसलिये अब यह देखना चाहिये, कि उनका कहना कहाँ तक युक्तिसंगत है। 'सुख' और 'हित' दोनों शब्दोंके अर्थमें बहुत भेद है। परंतु यदि इस भेदपर ध्यान न दें; और 'सर्वभूतहितका अर्थ 'अधिकांश लोगोंका अधिक सुख' मान लें, और कार्य-अकार्य-निर्णयके काममें केवल इसी तत्त्वका उपयोग करें; तो यह साफ़ दीख पड़ेगा कि बड़ी बड़ी अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। मान लीजिये, कि इस तत्त्वका कोई आधिभौतिक पंडित अर्जुनको उपदेश देने लगता, तो वह अर्जुनसे क्या कहता? यही न; कि यदि युद्धमें जय मिलनेपर अधिकांश

लोगोंका अधिक सुख होना संभव है तो भीष्म पितामहकोभी मारकर युद्ध करना तेरा कर्तव्य है। दीखनेमें तो यह उपदेश बहुत सीधा और सहज दीख पडता है; परंतु कुछ विचार करनेपर इसकी अपूर्णता और कठिनाई समझमें आ जाती है। पहले यही सोचिये, कि अधिक यानी कितना? पांडवोंकी सात अक्षौहिणियाँ थीं और कौरवोंकी ग्यारह। इसलिये यदि पांडवोंकी हार हुई होती तो कौरवोंको सुख हुआ होता। क्या, इसी युक्तिवादसे पांडवोंका पक्ष अन्याय्य कहा जाता? भारतीय युद्धहीकी बात कौन कहे; औरभी अनेक अवसर ऐसे हैं कि जहाँ नीतिका निर्णय केवल संख्यासे कर बैठना बडी भारी भूल हैं। व्यवहारमें सब लोग यही समझते हैं कि लाखों दुर्जनोंको सुख होनेकी अपेक्षा एकही सज्जनको जिससे सुख हो, वही सच्चा सत्कार्य है। इस समझको सच बतलानेके लिये एकही सज्जनके सुखको लाख दुर्जनोंके सुखकी अपेक्षा अधिक मूल्यवान् मानना पडेगा; और ऐसा करनेपर "अधिकांश लोगोंका अधिक बाह्य" मुखवाला (जो कि नीतिमत्ताकी परीक्षाका एकमात्र साधन माना गया है) सिद्धान्त उतनाही शिथिल हो जायगा। इसलिये कहना पड़ता है कि, लोकसंख्याकी न्यूनाधिकताका नीतिमत्ताके साथ कोई नित्य-संबंध नहीं हो सकता। यह बातभी ध्यानमें रखनेयोग्य है, कि कभी जो बात साधारण लोगोंको सुखदायक मालूम होती है, वही बात किसी दूरदर्शी पुरुषको परिणाममें सबके लिये हानिप्रद दीख पड़ती है। उदाहरणार्थ, साक्रेटीज और ईसामसीहकोही लीजिये। दोनों अपने अपने मतसे परिणाममें कल्याणकारक समझ करही अपने देशबंधुओंको उपदेश करते थे; परंतु इनके देशबंधुओंने इन्हें “समाजके शत्रु” समझकर मौतकी सजा दी। इस विषयमें "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" इसी तत्त्वके अनुसार उस समय लोगोंने और उनके नेताओने मिल कर आचरण किया था; परंतु अब हम नहीं कह सकते कि उन लोगोंका बर्ताव न्याययुक्त था। सारांश, यदि “अधिकांश लोगोंके अधिक सुख” को ही क्षणभरके लिये नीतिका मूलतत्त्व मान लें, तोभी उससे ये प्रश्न हल नहीं हो सकते, कि लाखों-करोडों मनुष्योंका सुख किसमें है; उसका निर्णय कौन और कैसे करे? साधारण अवसरोंपर निर्णय करनेका यह काम उन्हीं लोगोंको सौंप दिया जा सकता है, कि जिनके बारेमें सुख-दुःखका प्रश्न उपस्थित हो। परंतु साधारण अवसरपर इतना प्रयत्न करनेकी कोई आवश्यकताही नहीं रहती। और जब विशेष कठिनाईका कोई समय आता है, तब साधारण मनुष्योंमें यह अचूक विचार-शक्ति नहीं रहती, कि हमारा सुख किस बातमें है। ऐसी अवस्थामें यदि इन साधारण और अनधिकारी लोगोंके हाथ यह नीतिका एकमेव तत्त्व “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख” लग जाय, तो वही भयानक परिणाम होगा; जो सैतानके हाथमें मशाल देनेसे होता है। यह बात उक्त दोनों उदाहरणों (साक्रेटीज और ईसामसीह) से भली भाँति प्रकट हो जाती है। इस उत्तरमें कुछ जान नहीं, कि “नीतिधर्मका

आधिभौतिक सुखवाद ८७ हमारा तत्त्व शुद्ध और सच्चा है; मूर्ख लोगोंने उसका दुरुपयोग किया तो हम क्या कर सकते हैं?" कारण यह है, कि यद्यपि तत्त्व शुद्ध और सच्चा हो, तथापि उसका उपयोग करनेके अधिकारी कौन हैं, वे उसका उपयोग कब और कैसे करते हैं, इत्यादि बातोंकी मर्यादाभी, उसी तत्त्वके साथ देनी चाहिये। नहीं तो संभव है, कि हम अपनेको साक्रेटीजके सदृश्य नीति-निर्णय करनेमें समर्थ मानकर अर्थका अनर्थ कर बैठें। केवल संख्याकी दृष्टिसे नीतिका उचित निर्णय नहीं हो सकता; और इस तर्कका निश्चय करनेके लिये कोईभी बाहरी साधन नहीं कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुख किसमें है। इन दो आक्षेपोंके सिवा इस पंथपर औरभी बड़े बड़े आक्षेप किये जा सकते हैं। जैसे, विचार करनेपर यह अपने आप ही मालूम हो जायगा, कि किसी कामके केवल बाहरी परिणामसेही उसके न्याय्य अथवा अन्याय्य होनेका निर्णय करना बहुधा असंभव हो जाता है। हम लोग किसी घड़ीको, उसके ठीक ठीक समय बतलाने न बतलाने पर, अच्छी या खराब कहा करते हैं। परंतु इसी नीतिका उपयोग मनुष्यके कार्योंके संबंधमें करनेके पहले हमें यह बात अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिये, कि मनुष्य केवल घड़ी या यंत्र नहीं है। यह बात सच है, कि सब सत्पुरुष जगत्के कल्याणार्थ प्रयत्न किया करते हैं। परंतु इससे यह उलटा अनुमान निश्चयपूर्वक नहीं किया जा सकता, कि जोभी कोई लोगोंके कल्याणार्थ प्रयत्न करता है, उसे सत्पुरुषही होना चाहिये। इसलिये यह देखना चाहिये, कि मनुष्यका अंतः- करण कैसा है। यंत्र और मनुष्यमें यदि कुछ भेद है तो यही, कि एक हृदयहीन है, और दूसरा हृदययुक्त है; और इसीलिये अज्ञानसे या भूलसे किये गये अपराधको कायदेमें क्षम्य मानते हैं। तात्पर्य, कोई काम अच्छा है या बुरा, धर्म्य है या अधर्म्य, नीतिका है अथवा अनीति का, इत्यादि बातोंका सच्चा निर्णय उस कामके केवल बाहरी फल या परिणाम - अर्थात् वह अधिकांश लोगोंको अधिक सुख देगा कि नहीं इतनेही - से नहीं किया जा सकता। उसीके साथ साथ यहभी जानना चाहिये, कि उस कामको करनेवालेकी बुद्धि, वासना या हेतु कैसा है। एक समयकी बात है, कि अमरीकाके एक बड़े शहरमें सब लोगोंके सुख और उपयोगके लिये ट्रामवेकी बहुत आवश्यकता थी। परंतु सरकारी अधिकारियोंकी आज्ञा पाये बिना ट्रामवे नहीं बनाई जा सकती थी। सरकारी मंजूरी मिलनेमें बहुत देरी हुई। तब ट्रामवेके व्यवस्थापकने अधिकारियोंको रिश्वत देकर जल्द मंजूरी ले ली। ट्रामवे बन गई और उससे शहरके सब लोगोंकी सुभीता और फ़ायदा हुआ। कुछ दिनोंके बाद रिश्वतकी बात प्रकट हो गई; और उस व्यवस्थापकपर फ़ौजदारी मुकदमा चलाया गया। पहली ज्यूरी (पंचायत) का एकमत नहीं हुआ; इसलिये दूसरी ज्यूरी चुनी गई। दूसरी जूरीने व्यवस्थापकको दोषी ठहराया। अतएव उसे सज़ा दी गई। इस उदाहरणमें "अधिक लोगोंके अधिक सुख" वाले नीतितत्त्वसे काम

८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र चलने का नहीं। क्योंकि यद्यपि "घूस देनेसे ट्रामवे बन गई" यह बाहरी परिणाम अधिक सुखदायक था; तथापि इतनेहीसे घूस देना न्या य हो नहीं सकता।* दान करनेको अपना धर्म (दातव्य) समझ कर निष्काम-बुद्धिसे दान करना, और कीर्तिके लिये या अन्य फलकी आशासे दान करना, इन दो कृत्योंका बाहरी परिणाम यद्यपि एक-सा हो, तथापि श्रीमद्भगवद्गीतामें पहले दानको सात्त्विक और दूसरेको राजस कहा है (गीता १७. २०, २१)। और यहभी कहा गया है, कि यदि वही दान कुपात्रोंको दिया जाय, तो वह तामस अथवा गर्ह्य है। यदि किसी गरीबने एक- आध धर्म-कार्यके लिये चार पैसे दिये और किसी अमीरने उसीके लिये सौ रुपये दिये, तो लोगोंमें दोनोंकी नैतिक योग्यता एकही समझी जाती है। परंतु यदि केवल "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" किसमें है, इसी बाहरी साधनद्वारा विचार किया जाय तो ये दोनों दान नैतिक दृष्टिसे समान योग्यताके नहीं कहे जा सकते। "अधि- कांश लोगोंका अधिक सुख" इस आधिभौतिक नीति-तत्त्वमें जो बहुत बड़ा दोष है, वह यही है, कि इसमें कर्ताके मनके हेतु या भावका कुछभी विचार नहीं किया जाता। और यदि अंतःस्थ हेतुपर ध्यान दें, तो इस प्रतिज्ञासे विरोध खड़ा हो जाता है, कि अधिकांश लोगोंका अधिक सुखही नीतिमत्ताकी एकमात्र कसौटी है। कायदा- कानून बनानेवाली सभा अनेक व्यक्तियोंके समूहसे बनी होती है। इसलिये उक्त मतके अनुसार इस सभाके बनाये हुए कायदों या नियमोंकी योग्यता-अयोग्यता पर विचार करते समय यह जाननेकी कुछ आवश्यकताही नहीं, कि सभासदोंके अंतः- करणोंमें कैसा भाव था - हम लोगोंको अपना निर्णय केवल इस बाहरी विचारके आधारपर कर लेना चाहिये, कि इनके कायदोंसे अधिकोंको अधिक सुख हो सकेगा या नहीं। परंतु, उक्त उदाहरणसे यह साफ़ साफ़ ध्यानमें आ सकता है, कि सभी स्थानोंमें यह न्याय उपयुक्त हो नहीं सकता। हमारा यह कहना नहीं है, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख या हित" वाला तत्त्व बिलकुलही निरुपयोगी है। केवल बाह्य परिणामोंका विचार करना होता तो उससे बढ़कर दूसरा तत्त्व कहीं नहीं मिलेगा। परंतु हमारा यह कथन है, कि जब नीतिकी दृष्टिसे किसी बातको न्याय्य अथवा अन्याय्य कहना हो, तब केवल बाह्य परिणामोंको देखनेसे काम नहीं चल सकता। उसके लिये औरभी कई बातोंपर विचार करना पड़ता है। अतएव नीतिमत्ताका निर्णय करनेके लिये पूर्णतया इसी तत्त्वपर अवलंबित नहीं रह सकते। इसलिये इससेभी अधिक निश्चित और निर्दोष तत्त्वको खोज निकालना आवश्यक है। गीताके प्रारंभमें जो यह कहा गया है, कि "कर्मकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है।" (गीता २. ४९) उसकाभी यही अभिप्राय है। यदि केवल बाह्य

  • यह उदाहरण डॉक्टर पॉल केरसकी The Ethical Problem (pp. 58, 59, 2nd Ed.) नामक पुस्तकसे लिया है।

कर्मोंपर ध्यान दें, तो वे बहुधा भ्रामक होते हैं। "स्नान-संध्या, तिलक-माला" इत्यादि बाह्य कर्मोंके होते हुएभी 'पेटमें क्रोधाग्नि'का भड़कते रहना असंभव नहीं है, परंतु यदि हृदयका भाव शुद्ध हो, तो बाह्यकर्मोंका महत्त्व नहीं रहता।" "सुदामाके मुट्ठीभर चावल" सरीखे अत्यंत अल्पबाह्य कर्मकी धार्मिक और नैतिक योग्यता, अधिकांश लोगोंको अधिक सुख देनेवाले हजारों मन अनाजके बरा- बरही समझी जाती है। इसी लिये प्रसिद्ध जर्मन तत्त्वज्ञानी कांटने * कर्मके बाह्य और दृश्य परिणामोंके तारतम्य-विचारको गौण माना है। एवं नीतिशास्त्रके अपने विवेचनका प्रारंभकर्ताकी शुद्ध बुद्धि (शुद्ध भाव) हीसे किया है। यह नहीं समझना चाहिये, कि आधिभौतिक सुखवादकी यह न्यूनता बड़े बड़े आधिभौतिकवादियोंके ध्यानमें नहीं आई। ह्यूमने † स्पष्ट लिखा है - जब कि मनुष्यका कर्म (काम या कार्य) ही उसके शीलका द्योतक है, और जब लोगोंमें वही नीतिमत्ताका दर्शक भी माना जाता है, तब केवल बाह्य परिणामोंहीसे उस कर्मको प्रशंसनीय या गर्हणीय मान लेना असंभव है। यह बात मिल साहबको भी मान्य है, कि "किसी कर्मकी नीतिमत्ता कर्ताके हेतुपर अर्थात् वह उसे जिस बुद्धि या भावसे करता है, उसपर पूर्णतया अवलंबित रहती है!" परंतु अपने पक्षमंडनके लिये मिलसाहबने यह युक्तिवाद किया है, कि "जबतक बाह्य कर्मोंमें कोई भेद नहीं होता तबतक कर्मकी नीतिमत्तामें कुछ फ़र्क नहीं हो सकता, चाहे कर्ताके मनमें उस कामको करनेकी वासना किसी भावसे हुई हो।" § मिलके इस युक्तिवादमें सांप्रदायिक आग्रह दीख पड़ता है; क्योंकि बुद्धि या भावमें भिन्नता होनेपर यद्यपि दो कर्म दीखनेमें एकहीसे हों, तोभी वे तत्त्वतः एक योग्यताके कभी नहीं हो सकते। और इसी लिये मिलसाहबकी कही हुई 'जब तक (बाह्य) कर्मोंमें भेद नहीं होता, इत्यादि' मर्यादाको ग्रीनसाहब ‡ निर्मूल बतलाते हैं। गीताकाभी यही अभिप्राय है। इसका

  • Kant's Theory of Ethics, (trans. by Abbott) 6th Ed. p. 6. † "For as actions are objects of our moral sentiment, so far only as they are indications of the internal character, passions and affections, it is impossible that they can give rise either to praise or blame, where they proceed not from these principles, but are derived altogether from external objects." Hume's Inquiry concerning Human Understanding, Section VIII, part II (p. 368 of Hume's Eassys - The World Library Edition). § "Morality of the action depends entirely upon the intention, that is, upon what the agent wills to do, But the motive, that is, the feeling which makes him will so to do, when makes no difference in the act, makes none in the morality." Mill's Utilitarianism, p. 27. ‡ Green's Prolegomena to Ethics § 292 note p. 348. 5th Chea- per Edition.

९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारण गीतामें यह बतलाया गया है, कि यदि एकही धर्म-कार्यके लिये दो मनुष्य समान धन प्रदान करें, तोभी अर्थात् दोनोंके बाह्य कर्म एकसमान होनेपरभी, दोनोंकी बुद्धि या भावकी भिन्नताके कारण एक दान सात्त्विक और दूसरा राजस या तामसभी हो सकता है। इस विषयपर अधिक विचार पूर्वी और पश्चिमी मतोंकी तुलना करते समय करेंगे। अभी केवल इतनाही देखना है, कि कर्मके केवल बाहरी परिणामपरही अवलंबित रहनेवाली आधिभौतिक सुखवादकी श्रेष्ठ श्रेणीभी नीति- निर्णयके काममें कैसे अपूर्ण सिद्ध हो जाती है; और इसे सिद्ध करनेके लिये हमारी समझमें मिलसाहबकी उक्त स्वीकृति काफ़ी है। “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख” वाले आधिभौतिक पंथमें सबसे भारी दोष यह है, कि उसमें कर्ताकी बुद्धि या भावका कुछभी विचार नहीं किया जाता। मिलसाहबके लेखहीसे यह स्पष्टतया सिद्ध हो जाता है, कि उस (मिल) के युक्ति- वादको सच मानकरभी इस तत्त्वका उपयोग सब स्थानोंपर एकसमान नहीं किया जा सकता। क्यों कि वह केवल बाह्य फलके अनुसार नीतिका निर्णय करता है, अर्थात् उसका उपयोग किसी विशेष मर्यादाके भीतरही किया जा सकता है; या यों कहिये कि वह एकदेशीय है। इसके सिवा इस मतपर एक औरभी आक्षेप किया जा सकता है, कि स्वार्थकी अपेक्षा परार्थ क्यों और कैसे श्रेष्ठ है? – इस प्रश्नकी कुछ भी उपपत्ति न बतलाकर ये लोग इस तत्त्वको सच मान लिया करते हैं। फल यह यह होता है, कि बुद्धिमान स्वार्थकी बेरोक वृद्धि होने लगती है। यदि स्वार्थ और परार्थ ये दोनों बातें मनुष्यके जन्मसेही विद्यमान रहती हैं, अर्थात् स्वाभाविक हैं; तो प्रश्न होता है, कि मैं स्वार्थकी अपेक्षा लोगोंके सुखको अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों समझूं? यह उत्तर तो संतोषदायक होही नहीं सकता, कि तुम अधिकांश लोगोंके अधिक सुखको देखकर ऐसा करो। क्यों कि मूल प्रश्नही यह है, कि मैं अधिकांश लोगोंके अधिक सुखके लिये यत्न क्यों करूं? यह बात सच है, कि अन्य लोगोंके हितमें अपनाभी हित सम्मिलित रहता है, इस लिये यह प्रश्न, हमेशा नहीं उठता। परंतु आधिभौतिक पंथके उक्त तीसरे वर्गकी अपेक्षा इस अंतिम (चौथे) वर्गकी यही विशेषता है, कि इस आधिभौतिक पंथके लोग यह मानते हैं, कि जब स्वार्थ और परार्थमें विरोध खड़ा हो जाय, तब बुद्धिमान स्वार्थका त्याग करके परार्थ-साधन- हीके लिये यत्न करना चाहिये। इस पंथकी उक्त विशेषताकी कुछभी उपपत्ति नहीं दी गई है। इस अभावकी ओर एक विद्वान् आधिभौतिक पंडितका ध्यान आकर्षित हुआ। उसने छोटे कीड़ोंसे लेकर मनुष्यतक सब सजीव प्राणियोंके व्यवहारोंका खूब निरीक्षण किया; और अंतमें यह सिद्धान्त निकाला, कि जब कि छोटे कीड़ोंसे लेकर मनुष्यों तकमें यही गुण अधिकाधिक बढ़ता और प्रकट होता चला आ रहा है, कि वे स्वयं अपनेही समान अपनी संतानों और जातियोंकी रक्षा करते हैं; और किसीको दुःख न देते हुए अपने बंधुओंकी यथासंभव सहायता

करते हैं; तब हम कह सकते हैं, कि सजीव सृष्टिके आचरणका यही परस्पर-सहा- यताका गुण - प्रधान नियम है। सजीव सृष्टिमें यह नियम पहले पहल संतानोत्पादन और संतानके लालन-पालनके बारेमें दीख पड़ता है। ऐसे अत्यंत सूक्ष्म कीड़ोंकी सृष्टिको देखनेसे - कि जिसमें स्त्री-पुरुषका कुछ भेद नहीं है - ज्ञात होगा कि एक कीड़ेकी देह बढ़ते बढ़ते फट जाती है; और उससे दो कीड़े बन जाते हैं। अर्थात् यही कहना पड़ेगा कि संतानके लिये - दूसरेके लिये - यह कीड़ा अपने शरीरकोभी त्याग देता है। इसी तरह सजीव सृष्टिमें इस कीड़ेसे ऊपरके दर्जेके स्त्री-पुरुषात्मक प्राणीभी अपनी अपनी संतानके पालन-पोषणके लिये स्वार्थत्याग करनेमें आनंदित हुआ करते हैं। यही गुण बढ़ते बढ़ते मनुष्य जातिके असभ्य और जंगली समाजमेंभी इस रूपमें पाया जाता है, कि वे लोग न केवल अपनी संतानोंकी रक्षा करनेमें - वरन अपने जाति-भाइयोंकी सहायता करनेमेंभी सुखसे प्रवृत्त हो जाते हैं। इसलिये मनुष्यको - जो कि सजीव सृष्टिका शिरोमणि है - स्वार्थके समान परार्थमेंभी सुख मानते हुए सृष्टिके उपर्युक्त नियमकी उन्नति करने तथा स्वार्थ और परार्थके वर्तमान विरोधको समूल नष्ट करनेके उद्योगमें लगे रहना चाहिये। बस इसीमें उसकी इतिकर्तव्यता है।* यह युक्तिवाद तो ठीक है; परंतु यह तत्त्व कुछ नया नहीं है, कि परोपकार करनेका सद्गुण मूक सृष्टिमेंभी पाया जाता है, इसलिये उसे परमावधि तक पहुँचानेके प्रयत्नमें ज्ञानी मनुष्योंको सदैव लगे रहना चाहिये। इस तत्त्वमें विशेषता सिर्फ यही है, कि आजकल आधिभौतिक शास्त्रोंके ज्ञानकी बहुत वृद्धि होनेके कारण इस तत्त्वकी आधिभौतिक उपपत्ति उत्तम रीतिसे बतलाई गई है। यद्यपि हमारे शास्त्रकारोंकी दृष्टि आध्यात्मिक है, तथापि हमारे प्राचीन ग्रंथोंमें कहा है कि :- अष्टादशपुराणानां सारं सारं समुद्धृतम् । परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ “ परोपकार करना पुण्यकर्म है और दूसरोंको पीडा देना पापकर्म है। वह यही अठा- रह पुराणोंका सार है।” भर्तृहरिनेभी कहा है, कि “ स्वार्थो यस्य परार्थ एव स पुमान् एकः सतां अग्रणीः ” - परार्थहीको जिस मनुष्यने अपना स्वार्थ बना लिया है, वही सब सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ है। अच्छा, अब यदि छोटे कीड़ोंसे मनुष्यतककी सृष्टिकी उत्तरोत्तर क्रमशः बढ़ती हुई श्रेणियोंको देखें, तो एक और भी प्रश्न उठता है। वह यह है - क्या, मनुष्योंमें केवल परोपकारबुद्धिहीका उत्कर्ष हुआ है, या उसीके


  • यह उपपत्ति स्पेन्सरके Data of Ethics नामक ग्रंथमें दी हुई है। स्पेन्सरने मिलको एक पत्र लिखकर स्पष्ट कह दिया था, कि मेरे और आपके मतमें क्या भेद है। उस पत्रके अवतरण उक्त ग्रंथमें दिये गये हैं। pp. 57, 123. Also see Bain's Mental and Moral Science, pp. 721, 722 (Ed. 1875.)

९२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र साथ उनमें न्याय-बुद्धि, दया, समानपन, दूरदृष्टि, तर्क, शूरता, धृति, क्षमा, इंद्रिय- निग्रह इत्यादि अनेक अन्य सात्त्विक सद्गुणोंकीभी वृद्धि हुई है ? जब इसपर विचार किया जाता है, तब कहना पड़ता है, कि अन्य सब सजीव प्राणियोंकी अपेक्षा मनुष्योंमें सभी सद्गुणोंका उत्कर्ष हुआ है। इन सब सात्त्विक गुणोंके समूहको 'मनुष्यत्व' नाम दीजिये। अब यह बात सिद्ध हो चुकी है, कि परोपकारकी अपेक्षा मनुष्यत्वको हम श्रेष्ठ मानते हैं। ऐसी अवस्थामें किसीभी कर्मकी योग्यता-अयोग्यताका विचार या नीतिमत्ताका निर्णय करनेके लिये उस कर्मकी परीक्षा केवल परोपकारहीकी दृष्टिसे नहीं की जा सकती - अब उस कर्मकी परीक्षा मनुष्यत्वकी दृष्टिसे - अर्थात् मनुष्यजातिमें अन्य प्राणियोंकी अपेक्षा जिन जिन गुणोंका उत्कर्ष हुआ है, उन सबको ध्यान रखकरही - की जानी चाहिये। अकेले परोपकारको ध्यानमें रखकर कुछ-न-कुछ निर्णय कर लेनेके बदले अब तो यही मानना पड़ेगा, कि जो कर्म सब मनुष्योंके 'मनुष्यत्व' या 'मनुष्यपन'को शोभा दें, या जिस कर्मसे 'मनुष्यत्व'की वृद्धि हो, वही सत्कर्म और वही नीति-धर्म है। यदि एक बार इस व्यापक दृष्टिको स्वीकार कर लिया जाय, तो "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" उक्त दृष्टिका एक अत्यंत छोटा भाग हो जायगा और इस मतका कोई स्वतंत्र महत्त्व नहीं रह जायगा, कि सब कर्मोंके धर्म-अधर्म या नीतिमत्ताका विचार केवल "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" तत्त्वके अनुसार किया जाना चाहिये - और तब तो धर्म- अधर्मका निर्णय करनेके लिये मनुष्यत्वकाभी विचार करना आवश्यक होगा। और जब हम इस बातका सूक्ष्म विचार करने लगेंगे, कि 'मनुष्यपन' या मनुष्य- त्वका यथार्थ स्वरूप क्या है, तब हमारे मनमें याज्ञवल्क्यके अनुसार "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" यह विषय आप-ही-आप उपस्थित हो जायगा। नीतिशास्त्रका विवेचन करनेवाले एक अमेरिकन ग्रंथकारने इस समुच्चयात्मक मनुष्यत्वके धर्मकोही 'आत्मा' कहा है। उपर्युक्त विवेचनसे यह मालूम हो जायगा, कि केवल स्वार्थ या अपनेही विषय-सुखकी कनिष्ठ श्रेणीसे बढ़ते बढ़ते आधिभौतिक सुखवादियोंकोभी परोप- कारकी श्रेणी तक और अंतमें मनुष्यत्वकी श्रेणीतक कैसे आना पड़ता है। परंतु मनुष्यत्वके विषयमेंभी और आधिभौतिकवादियोंके मनमें प्रायः सब लोगोंके बाह्य विषय-सुखहीकी कल्पना प्रधान होती है, अतएव आधिभौतिकवादियोंकी यह अंतिम श्रेणीभी जिसमें - अंतःशुद्धि, और अंतःसुखका कुछ विचार नहीं किया जाता - हमारे अध्यात्मवादी शास्त्रकारोंके मतानुसार निर्दोष नहीं है। यद्यपि इस बातको साधारण- तया मानभी लें, कि मनुष्यके सब प्रयत्न सुख-प्राप्तिके तथा दुःख-निवारणकेही लिये हुआ करते हैं; तथापि जबतक पहलें इस बातका निर्णय न हो जाय, कि सच्चा सुख किसमें है - आधिभौतिक अर्थात् सांसारिक विषयभोगोंमें है, अथवा और किसीमें बात है - तबतक कोईभी आधिभौतिक पक्ष ग्राह्य नहीं समझा जा सकता।

आधिभौतिक सुखवाद ९३ इस बातको आधिभौतिक सुखवादीभी मानते हैं, कि शारीरिक सुखसे मानसिक सुखकी योग्यता अधिक है। पशुको जितने सुख मिल सकते हैं, वे सब किसी मनुष्यको देकर उससे पूछो कि “क्या, तुम पशु होना चाहते हो ?” तो वह कभी इस बातके लिये राजी न होगा। इसी तरह, ज्ञानी पुरुषोंको यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि तत्त्वज्ञानके गहन विचारोंसे बुद्धिमें जो एक प्रकारकी शांति उत्पन्न होती है, उसकी योग्यता सांसारिक संपत्ति अथवा बाह्योपभोगसे हज़ार गुना बढ़ कर है। अच्छा, यदि लोकमतको देखें, तोभी यही ज्ञात होगा, की नीतिका निर्णय करना केवल संख्यापर अवलंबित नहीं है। लोग जो कुछ किया करते हैं, वह सब केवल आधिभौतिक सुखकेही लिये नहीं किया करते - वे आधिभौतिक सुखहीको अपना परम उद्देश्य नहीं मानते । बल्कि हम लोग यही कहा करते हैं, कि बाह्य सुखोंकी कौन कहे, विशेष प्रसंग आनेपर अपनी जानकीभी परवाह नहीं करनी चाहिये । क्योंकि ऐसे समयमें आध्यात्मिक दृष्टिके अनुसार जिन सत्य आदि नीति-धर्मोंकी योग्यता अपनी जानसेभी अधिक है, उनका पालन करनेके लिये मनोनिग्रह करनेमेंही मनुष्यका मनुष्यत्व है। यही हाल अर्जुनका था। उसकाभी प्रश्न यह नहीं था, कि लड़ाई करनेपर किसको कितना सुख होगा। उसका श्रीकृष्णसे यही प्रश्न था, कि “मेरा, अर्थात् मेरे आत्माका श्रेय किसमें है सो मुझे बतलाइये” (गीता. २.७; ३.२) आत्माका यह नित्यका श्रेय और सुख आत्माकी शांतिमें है। इसी लिये बृहदारण्य- कोपनिषद् (बृ. २. ४. २) में कहा गया है, कि “अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन” अर्थात् सांसारिक सुखसंपत्तिके यथेष्ट मिल जानेपरभी आत्मसुख और शांति नहीं मिल सकती । इसी तरह कठोपनिषद्‌में लिखा है, कि जब मृत्यु नचिकेताको पुत्र, पौत्र, पशु, धान्य, द्रव्य इत्यादि अनेक प्रकारकी सांसारिक संपत्ति देने सिद्ध हुआ तो उसने साफ़ जवाब दिया, कि “मुझे आत्मविद्या चाहिये, संपत्ति नहीं।” और 'प्रेय' अर्थात् इंद्रियोंको प्रिय लगनेवाले सांसारिक सुखमें तथा 'श्रेय' अर्थात् आत्माके सच्चे कल्याणमें भेद दिखलाते हुए (कठ. १. २. २ में) कहा है, कि :- श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ संपरीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मंदो योगक्षेमाद् वृणीते ॥ “जब प्रेय (तात्कालिक बाह्य इंद्रियसुख) और श्रेय (सच्चा और चिर- कालिक कल्याण) ये दोनों मनुष्यके सामने उपस्थित होते हैं, तब बुद्धिमान् मनुष्य उन दोनों में किसी एकको चुन लेता है। जो मनुष्य यथार्थमें बुद्धिमान् होता है, वह प्रेयकी अपेक्षा श्रेयको अधिक पसंद करता है; परंतु जिसकी बुद्धि मंद होती है, उसको आत्मकल्याणकी अपेक्षा प्रेय अर्थात् बाह्य सुखही अधिक अच्छा लगता है।” इस लिये यह मान लेना उचित नहीं, कि संसारमें इंद्रियजन्य विषय-सुखही मनुष्यका ऐहिक परम उद्देश्य है; तथा मनुष्य जो कुछ करता है वह सब केवल बाह्य अर्थात् आधिभौतिक सुखहीके लिये अथवा अपने दुःखोंको दूर करनेके लियेही करता है।

९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इंद्रियगम्य बाह्यसुखोंकी अपेक्षा बुद्धिगम्य अंतःसुखकी - अर्थात् आध्या- त्मिक सुखकी - योग्यता अधिक तो हैही; परंतु इसके साथ साथ एक बात यहभी है, कि विषय-सुख अनित्य है। वह दशा नीति-धर्मकी नहीं है। इस बातको सभी मानते हैं, कि अहिंसा, सत्य आदि धर्म कुछ बाहरी उपाधियों अर्थात् बाह्य सुखदुःखों- पर अवलंबित नहीं हैं; किंतु ये सभी अवसरोंके लिये और सब कामोंमें एकसमान उपयोगी हो सकते हैं। अतएव ये नित्य हैं। बाह्य बातोंपर अवलंबित न रहनेवाली, नीति-धर्मोंकी यह नित्यता उनमें कहांसे और कैसे आई - अर्थात् इस नित्यताका कारण क्या है ? इस प्रश्नका आधिभौतिक-वादसे हल होना असंभव है। कारण यह है, कि यदि बाह्यसृष्टिके सुख-दुःखोंके अवलोकनसे कुछ सिद्धान्त निकाला जाय, तो सब सुख-दुःखोंके स्वभावतः अनित्य होनेके कारण, उनके अपूर्ण आधार- पर बने हुए नीति-सिद्धान्तभी वैसेही अनित्य होंगे। और, ऐसी अवस्थामें सुख- दुःखोंकी कुछभी परवाह न करके सत्यके लिये जान दे देनेकी सत्य-धर्मकी जो त्रिकालाबाधित नित्यता है, वह "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख"के तत्त्वसे सिद्ध नहीं हो सकेगी। इसपर यह आक्षेप किया जाता है, कि जब सामान्य व्यवहारोंमें सत्यके लिये प्राण देनेका समय आ जाता है, तो बड़े बड़े लोगभी असत्य पक्ष ग्रहण करनेमें संकोच नहीं करते; और उस समय हमारे शास्त्रकारभी जादा सख्ती नहीं करते; तब सत्य आदि धर्मोंकी नित्यता क्यों माननी चाहिये ? परंतु यह आक्षेप या दलील ठीक नहीं है; क्योंकि जो लोग सत्यके लिये जान देनेका साहस नहीं कर सकते, वेभी अपने मुंहसे इस नीति-धर्मकी नित्यताको मानाही करते हैं। इसी लिये महाभारतमें अर्थ, काम आदि पुरुषार्थोंकी सिद्धि करनेवाले सब व्याव- हारिक धर्मोंका विवेचन करके, अंतमें भारत-सावित्रीमें (और विदुरनीतिमेंभी) व्यासजीने सब लोगोंकों यही उपदेश किया है :- न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः । धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नि यो हेतुरस्य त्वनित्यः ।। अर्थात् “सुख-दुःख अनित्य हैं; परंतु (नीति) धर्म नित्य हैं। इसलिये सुखकी इच्छासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण-संकट आनेपरभी धर्मको कभी नहीं त्यागना चाहिये। यह जीव नित्य है; और सुखदुःख आदि विषय अनित्य हैं।" इसीलिये व्यासजी उपदेश करते हैं, कि अनित्य सुखदुःखोंका विचार न करके नित्य-जीवका संबंध नित्य-धर्मसेही जोड़ देना चाहिये । (महा. स्व. ५. ६; उ. ३९. १२, १३)। यह देखनेके लिये, व्यासजीका उक्त उपदेश उचित है या नहीं, हमें अब इस बातका वचार करना चाहिये, कि सुख-दुःखका यथार्थ स्वरूप क्या है, और नित्य सुख किसे कहते हैं।

पाँचवाँ प्रकरण सुखदुःखविवेक सुखमात्यंतिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतींद्रियम् । * — गीता ६. २१ हमारे शास्त्रकारोंको यह सिद्धान्त मान्य है, कि इस संसारका प्रत्येक मनुष्य सुख- प्राप्तिके लिये या प्राप्त सुखकी वृद्धिके लिये, दुःखको टालने या कम करनेके लिये ही सदैव प्रयत्न किया करता है। भृगुजी भरद्वाजसे शांतिपर्व (मभा. शां. १९०. ९) में कहते हैं, कि “ इह खलु अमुष्मिंश्च लोके वस्तुप्रवृत्तयः सुखार्थमभिधी- यंते। न ह्यतःपरं त्रिवर्गफलं विशिष्टतरमस्ति।” अर्थात् इस लोक तथा परलोकमें सारी प्रवृत्ति केवल सुखके लिये है; और धर्म, अर्थ, कामका इसके अतिरिक्त कोई अन्य फल नहीं है। परंतु शास्त्रकारोंका कथन है, कि मनुष्य यह न समझकर कि सच्चा सुख किसमें है — मिथ्या सुखहीको सत्य सुख मान बैठता है; और इस आशासे, कि आज नहीं तो कल सुख अवश्य मिलेगा — वह अपनी आयुके दिन व्यतीत किया करता है। अकस्मात, एक दिन मृत्युके झपेटेमें पड़कर वह इस संसारको छोड़कर चल बसता है। परंतु उसके उदाहरणसे अन्य लोक सावधान होनेके बदले उसीका अनुकरण करते हैं। इस प्रकार यह भव-चक्र चलता रहा है, और कोई मनुष्य सच्चे और नित्य सुखका विचार नहीं करता ! इस विषयमें पूर्वी और पश्चिमी तत्त्व- ज्ञानियोंमें बड़ाही मतभेद है, कि यह संसार केवल दुःखमय है, या सुखप्रधान अथवा दुःखप्रधान है। परंतु इन पक्षवालोंमेंसे सभीको यह बात मान्य है, कि मनुष्यका कल्याण अपने दुःखका अत्यंत निवारण करके अत्यंत सुख-प्राप्ति करनेहीमें है। ‘सुख’ शब्दके बदले प्रायः ‘हित’, ‘श्रेय’ और कल्याण शब्दोंका अधिक उपयोग हुआ करता है। इनका भेद आगे चलकर बतलाया जायगा। यदि यह मान लिया जाय, कि सुख शब्दमेंही सब प्रकारके सुख और कल्याणका समावेश हो जाता है, तो सामान्यतः कहा जा सकता है, कि प्रत्येक मनुष्यका प्रयत्न केवल सुखके लिये हुआ करता है। परंतु इस सिद्धान्तके आधारपर सुख-दुःखका जो लक्षण महाभारतांतर्गत पराशरगीता (मभा. शां. २९५. २७) में दिया गया है, कि “ यदिष्टं तत्सुखं प्राहुः द्वेष्यं दुःखमिहेष्यते ” — जो कुछ हमें इष्ट है वही सुख है; और जिसका हम द्वेष करते हैं, अर्थात् जो हमें नहीं चाहिये, वही दुःख है — उसे शास्त्रकी दृष्टिसे पूर्ण निर्दोष नहीं कह * “ जो केवल बुद्धिसे ग्राह्य हो और इंद्रियोंसे परे हो, उसे आत्यंतिक सुख कहते हैं।”

९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सकते । क्योंकि इस व्याख्याके 'इष्ट' शब्दका अर्थ इष्ट वस्तु या पदार्थभी हो सकता है, और इस अर्थको माननेसे इष्ट पदार्थकोभी सुख कहना पड़ेगा । उदाहरणार्थ, प्यास लगनेपर पानी इष्ट होता है; परंतु इस बाह्य पदार्थ 'पानी' को 'सुख' नहीं कहते । यदि ऐसा होगा, तो नदीके पानीमें डूबनेवालेके बारेमें कहना पड़ेगा, कि वह सुखमें डूबा है । सच बात यह है, कि पानी पीनेसे जो इंद्रियतृप्ति होती है, उसे सुख कहते हैं। इसमें संदेह नहीं, कि मनुष्य इस इंद्रियतृप्ति या सुखको चाहता है; परंतु इससे यह व्यापक सिद्धान्त नहीं बताया जा सकता, कि जिसकी चाह होती है वह सब सुखही है। इसी लिये नैयायिकोंने सुखदुःखको वेदना कह कर उसकी व्याख्या इस तरहसे की है, 'अनुकूलवेदनीयं सुखं' जो वेदना हमारे अनुकूल है, वह सुख है; और 'प्रतिकूलवेदनीयं दुःखं' जो वेदना हमारे प्रतिकूल है, वह दुःख है । ये वेदनाएँ जन्मसिद्ध अर्थात् मूलहीकी और अनुभवगम्य मात्र हैं। इसलिये नैयायिकोंकी उक्त व्याख्यासे बढ़कर सुखदुःखका अधिक उत्तम लक्षण बतलाया नहीं जा सकता । ये वेदनात्मक सुख-दुःख केवल मनुष्यके व्यापारोंसेही उत्पन्न नहीं होते हैं, तो कभी कभी कुछ देवताओंके कोपसेभी बड़े बड़े रोग और दुःख उत्पन्न हुआ करते हैं, जिन्हें मनुष्यको अवश्य भोगना पड़ता है। इसीलिये वेदान्त-ग्रंथोंमें सामान्यतः इन सुख- दुःखोंके तीन भेद-आधिदैविक, आधि भौतिक और आध्यात्मिक किये गये हैं। देवता- ओंकी कृपा या कोपसे जो सुख-दुःख मिलते हैं, उन्हें 'आधिदैविक' कहते हैं। बाह्य- सृष्टिके - पृथ्वी आदि पंचमहाभूतात्मक पदार्थोंका मनुष्यकी इंद्रियोंसे संयोग होनेपर - शीतोष्ण आदिके कारण जो सुखदुःख उत्पन्न हुआ करते हैं, उन्हें 'आधिभौतिक' कहते हैं। और, ऐसे बाह्यसंयोगके बिना उत्पन्न होनेवाले अन्य सब सुखदुःखोंको 'आध्यात्मिक' कहते हैं। यदि सुख-दुःखका यह वर्गीकरण स्वीकार किया जाय, तो शरीरहीके वात- पित्त आदि दोषोंके परिमाणके बिगड़ जानेसे उत्पन्न होनेवाले ज्वर आदि दुःखोंको - तथा उन्हीं दोषोंका परिणाम यथोचित रहनेसे अनुभवमें आनेवाले शारीरिक स्वास्थ्यको - आध्यात्मिक सुख-दुःख कहना पड़ता है। क्योंकि, यद्यपि ये सुखदुःख पंचमहाभूतात्मक शरीरसे संबंध रखते हैं - अर्थात् ये शारीरिक हैं - तथापि हमेशा यह नहीं कहा जा सकता, कि ये शरीरसे बाहर रहनेवाले पदार्थोंके संयोगसे पैदा हुए हैं। और इसलिये आध्यात्मिक सुख-दुःखोंके, वेदान्तकी दृष्टिसे फिर भी दो भेद - शारीरिक और मानसिक - करने पड़ते हैं। परंतु इस प्रकार सुख-दुःखोंके 'शारीरिक' और 'मानसिक' दो भेद कर दें, तो फिर आधिदैविक सुख-दुःखोंको भिन्न माननेकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। क्योंकि, यह तो स्पष्टही है कि देवताओंकी कृपा अथवा क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले सुख-दुःखोंकोभी आखिर मनुष्य अपनेही शरीर या मनके द्वारा भोगता है। अतएव हमने इस ग्रंथमें वेदान्त-ग्रंथोंकी परिभाषाके अनुसार सुख-दुःखोंका त्रिविध वर्गीकरण नहीं किया है। किंतु उनके दोही वर्ग (बाह्य या शारीरिक और आभ्यन्तर या मानसिक) किये हैं, और इसी

सुखदुःखविवेक ९७ वर्गीकरणके अनुसार, हमने इस ग्रंथमें सब प्रकारके शारीरिक सुख-दुःखोंको 'आधिभौतिक' और सब प्रकारके मानसिक सुख-दुःखोंको 'आध्यात्मिक' कहा है। वेदान्तग्रंथमें जैसे तीसरा वर्ग 'आधिदैविक' दिया गया है, वैसे हमने नहीं किया है। क्योंकि, हमारे मतानुसार सुख-दुःखोंका शास्त्रीय रीतिसे विवेचन करनेके लिये यह द्विविध वर्गीकरणही अधिक सुभीतेका है। सुखदुःखका जो विवेचन आगे किया गया है, उसे पढ़ते समय यह बात अवश्य ध्यानमें रखनी चाहिये, कि वेदान्त-ग्रंथोंके और हमारे वर्गीकरणमें भेद है। सुख-दुःखोंको चाहे आप द्विविध मानिये अथवा त्रिविध, इसमें संदेह नहीं, कि दुःखकी चाह किसीभी मनुष्यको नहीं होती। इसीलिये वेदान्त और सांख्यशास्त्र (सां. का. १; गीता ६. २१, २२) में कहा गया है, कि सब प्रकारके दुःखोंकी अत्यंत निवृत्ति करना और आत्यंतिक तथा नित्य सुखकी प्राप्ति करनाही मनुष्यका परम पुरुषार्थ है। जब यह बात निश्चित हो चुकी, कि मनुष्यका परम साध्य या उद्देश्य आत्यंतिक सुखही है, तब ये प्रश्न मनमें सहजही उत्पन्न होते हैं, कि अत्यंत सत्य और नित्य सुख किसको कहना चाहिये ? उसकी प्राप्ति होना संभव है या नहीं ? यदि संभव है तो कब और कैसे ? इत्यादि। और जब हम इन प्रश्नोंपर विचार करने लगते हैं, तब सबसे पहले यही प्रश्न उठता है, कि नैयायिकोंके बतलाये हुए लक्षणके अनुसार सुख और दुःख दोनों भिन्न भिन्न स्वतंत्र वेदनाएँ, "अनुभव या वस्तुएँ हैं" अथवा "जो उजेला नहीं वह अँधेरा" इस न्यायके अनुसार इन दोनों वेदनाओं- मेंसे एकका अभाव होनेपर दूसरी संज्ञाका उपयोग किया जाता है। भर्तृहरिने कहा है, कि "प्याससे जब मुँह सूख जाता है, तब हम उस दुःखका निवारण करनेके लिये पानी पीते हैं। भूखसे जब हम व्याकुल हो जाते हैं, तब मिष्टान्न खाकर उस व्यथाको हटाते हैं; और काम-वासनाके प्रदीप्त होनेपर उसको स्त्रीसंग द्वारा तृप्त करते हैं। इतना कहकर अंतमें कहा है कि :- प्रतीकारो व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जनः । "किसी व्याधि अथवा दुःखके उत्पन्न होनेपर उसका जो निवारण या प्रतिकार किया जाता है, उसीको लोक भ्रमवश 'सुख' कहा करते हैं।" दुःखनिवारणके अतिरिक्त 'सुख' कोई भिन्न वस्तु नहीं है। यह नहीं समझना चाहिये, कि उक्त सिद्धान्त मनुष्योंके सिर्फ़ उन्हीं व्यवहारोंके विषयमें उपयुक्त होता है, जो स्वार्थहीके लिये किये जाते हैं। पिछले प्रकरणमें आनंदगिरिका यह मत बतलायाही गया है, कि जब हम किसीपर कुछ उपकार करते हैं, तब उसका कारण यही होता है, कि उसके दुःखको देखनेसे हमारी कारुण्यवृत्ति हमारे लिये असह्य हो जाती है; और इस दुःसहत्वकी व्यथाको दूर करनेके लियेही हम परोपकार किया करते हैं। इस पक्षके स्वीकृत करनेपर हमें महाभारतके अनुसार यह मानना पड़ेगा कि :- गी. र. ७

९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तृष्णार्त्तिप्रभवं दुःखं दुःखातिप्रभवं सुखम् । “ पहले जब कोई तृष्णा उत्पन्न होती है, तब उसकी पीड़ासे दुःख होता है; और उस दुःखकी पीड़ासे फिर सुख उत्पन्न होता है ” ( मभा. शां. २५. २२; १७४. १९ ) । संक्षेपमें इस पंथका यह कहना है, कि मनुष्यके मनमें पहले एक-आध आशा, वासना या तृष्णा उत्पन्न होती है; और जब उससे दुःख होने लगे, तब उस दुःखका जो निवारण किया जाता है, वही सुख कहलाता है। सुख कोई दूसरी भिन्न वस्तु नहीं है। अधिक क्या कहें उस पंथके लोगोंने यहभी अनुमान निकाला है, कि मनुष्यकी सब सांसारिक प्रवृत्तियाँ केवल वासनात्मक या तृष्णात्मकही हैं, और जबतक सब सांसारिक कर्मोंका त्याग नहीं किया जायगा, तबतक वासना या तृष्णाकी जड़ उखड़ नहीं सकती; और जबतक तृष्णा या वासनाकी जड़ नष्ट नहीं हो जाती, तबतक सत्य और नित्य सुखका मिलनाभी संभव नहीं है। वृहदारण्यक ( वृ. ४. ४. २२; वे. सू. ३. ४. १५ ) में विकल्पसे और जाबाल-संन्यास आदि उपनिषदोंमें प्रधानतासे उसीका प्रतिपादन किया गया है; तथा अष्टावक्र-गीता ( ९. ८; १०. ३-८) एवं अवधूत-गीता ( ३. ४६ ) में इसीका अनुवाद है। इस पंथका अंतिम सिद्धान्त यही है, कि जिस किसीको आत्यंतिक सुख या मोक्ष प्राप्त करना है, उसे उचित है, कि वह जितना जल्द हो सके उतना जल्द संसारको छोड़कर संन्यास ले ले। स्मृति-ग्रंथोंमें जिसका वर्णन किया गया है, और श्रीशंकराचार्यने कलियुगमें जिसकी स्थापना की है, वह श्रौत-स्मार्त संन्यासमार्ग इसी तत्त्वपर चलाया गया है। सच है; यदि सुख कोई स्वतंत्र वस्तुही नहीं है, जो कुछ है, सो दुःखही है; और वहभी तृष्णामूलक है, तो इन तृष्णा आदि विकारोंकोही पहले समूल नष्ट कर देनेपर फिर स्वार्थ और परार्थकी सारी झंझटें आप-ही-आप दूर हो जायगी; और तब मनकी जो मूल साम्यावस्था या शांति है, वही रह जायगी। इसी अभिप्रायसे महा- भारतान्तर्गत शांतिपर्वकी, पिंगलगीतामें, और मंकिगीतामें भी, कहा गया है, कि :- यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ “ सांसारिक काम अर्थात् वासनाकी तृप्ति होनेसे जो सुख होता है और जो सुख स्वर्गमें मिलता है, उन दोनों सुखोंकी योग्यता तृष्णाके क्षयसे होनेवाले सुखके सोलहवें हिस्सेके बराबरभी नहीं है” ( मभा. शां. १७४. ४८; १७७. ४९ ) । वैदिक संन्यासमार्गकाही आगे चलकर जैन और बौद्ध-धर्ममें अनुकरण किया गया है। इसीलिये इन दोनों धर्मोंके ग्रंथोंमें तृष्णाके दुष्परिणामोंका और उसकी त्याज्यताका वर्णन, उपर्युक्त वर्णनोंहीके समान और कहीं कही तो उससेभी बढ़ा चढ़ा किया गया है (उदाहरणार्थ, 'धम्मपद'के 'तृष्णा-वर्ग'को देखिये)। तिब्बतके