श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तृष्णार्त्तिप्रभवं दुःखं दुःखातिप्रभवं सुखम् । “ पहले जब कोई तृष्णा उत्पन्न होती है, तब उसकी पीड़ासे दुःख होता है; और उस दुःखकी पीड़ासे फिर सुख उत्पन्न होता है ” ( मभा. शां. २५. २२; १७४. १९ ) । संक्षेपमें इस पंथका यह कहना है, कि मनुष्यके मनमें पहले एक-आध आशा, वासना या तृष्णा उत्पन्न होती है; और जब उससे दुःख होने लगे, तब उस दुःखका जो निवारण किया जाता है, वही सुख कहलाता है। सुख कोई दूसरी भिन्न वस्तु नहीं है। अधिक क्या कहें उस पंथके लोगोंने यहभी अनुमान निकाला है, कि मनुष्यकी सब सांसारिक प्रवृत्तियाँ केवल वासनात्मक या तृष्णात्मकही हैं, और जबतक सब सांसारिक कर्मोंका त्याग नहीं किया जायगा, तबतक वासना या तृष्णाकी जड़ उखड़ नहीं सकती; और जबतक तृष्णा या वासनाकी जड़ नष्ट नहीं हो जाती, तबतक सत्य और नित्य सुखका मिलनाभी संभव नहीं है। वृहदारण्यक ( वृ. ४. ४. २२; वे. सू. ३. ४. १५ ) में विकल्पसे और जाबाल-संन्यास आदि उपनिषदोंमें प्रधानतासे उसीका प्रतिपादन किया गया है; तथा अष्टावक्र-गीता ( ९. ८; १०. ३-८) एवं अवधूत-गीता ( ३. ४६ ) में इसीका अनुवाद है। इस पंथका अंतिम सिद्धान्त यही है, कि जिस किसीको आत्यंतिक सुख या मोक्ष प्राप्त करना है, उसे उचित है, कि वह जितना जल्द हो सके उतना जल्द संसारको छोड़कर संन्यास ले ले। स्मृति-ग्रंथोंमें जिसका वर्णन किया गया है, और श्रीशंकराचार्यने कलियुगमें जिसकी स्थापना की है, वह श्रौत-स्मार्त संन्यासमार्ग इसी तत्त्वपर चलाया गया है। सच है; यदि सुख कोई स्वतंत्र वस्तुही नहीं है, जो कुछ है, सो दुःखही है; और वहभी तृष्णामूलक है, तो इन तृष्णा आदि विकारोंकोही पहले समूल नष्ट कर देनेपर फिर स्वार्थ और परार्थकी सारी झंझटें आप-ही-आप दूर हो जायगी; और तब मनकी जो मूल साम्यावस्था या शांति है, वही रह जायगी। इसी अभिप्रायसे महा- भारतान्तर्गत शांतिपर्वकी, पिंगलगीतामें, और मंकिगीतामें भी, कहा गया है, कि :- यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ “ सांसारिक काम अर्थात् वासनाकी तृप्ति होनेसे जो सुख होता है और जो सुख स्वर्गमें मिलता है, उन दोनों सुखोंकी योग्यता तृष्णाके क्षयसे होनेवाले सुखके सोलहवें हिस्सेके बराबरभी नहीं है” ( मभा. शां. १७४. ४८; १७७. ४९ ) । वैदिक संन्यासमार्गकाही आगे चलकर जैन और बौद्ध-धर्ममें अनुकरण किया गया है। इसीलिये इन दोनों धर्मोंके ग्रंथोंमें तृष्णाके दुष्परिणामोंका और उसकी त्याज्यताका वर्णन, उपर्युक्त वर्णनोंहीके समान और कहीं कही तो उससेभी बढ़ा चढ़ा किया गया है (उदाहरणार्थ, 'धम्मपद'के 'तृष्णा-वर्ग'को देखिये)। तिब्बतके