श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुखदुःखविवेक ९९ बौद्ध-धर्मग्रंथोंमें तो यहाँतक कहा गया है, कि महाभारतका उक्त श्लोक, बुद्धत्व प्राप्त होनेपर गौतम बुद्धके मुखसे निकला था। * तृष्णाके जो दुष्परिणाम ऊपर बतलाये गये हैं, वे श्रीमद्भगवद्गीताकोभी मान्य हैं। परंतु गीताका यह सिद्धान्त है, कि उन्हें दूर करनेके लिये कर्मका त्याग नहीं कर बैठना चाहिये। अतएव यहाँ सुख-दुःखकी उक्त उपपत्तिपर कुछ सूक्ष्म विचार करना आवश्यक है। संन्यासमार्गके लोगोंका यह कथन सर्वथा सत्य नहीं माना जा सकता, कि सब सुख तृष्णा आदि दुःखोंके निवारण होनेपरही उत्पन्न होते हैं। एकबार अनुभवकी हुई (देखी हुई, सुनी हुई, इत्यादि) वस्तुकी जब फिर चाह होती है तब उसे काम, वासना या इच्छा कहते हैं। जब इच्छित वस्तु जल्द नहीं मिलती, तब दुःख होता है; जिससे वह इच्छा तीव्र होने लगती है, अथवा जब इच्छित वस्तुके मिलनेपरभी पूरा सुख नहीं मिलता; और उसकी चाह अधिकाधिक बढ़ने लगती है, तब उसी इच्छाको तृष्णा कहते हैं; परंतु इस प्रकार केवल इच्छाके तृष्णा- स्वरूपमें बदल जानेके पहलेही, यदि वह इच्छा पूर्ण हो जाय, तो उससे प्राप्त होने- वाले सुखके बारेमें हम यह नहीं कह सकेंगे, कि वह तृष्णा-दुःखके क्षय होनेसे उत्पन्न हुआ है। उदाहरणार्थ, प्रतिदिन नियत समयपर भोजन मिलता है, उसके बारेमें अनुभव यह नहीं है, कि भोजन करनेके पहले हमें दुःखही होता हो। यदि नियत समयपर भोजन न मिले तो हमारा जी भूखसे व्याकुल हो जाया करता है - अन्यथा नहीं। अच्छा, यदि हम मान लें, कि तृष्णा और इच्छा एकही अर्थके द्योतक हैं; तोभी यह सिद्धान्त सच नहीं माना जा सकता, कि सब सुख तृष्णामूलकही हैं। उदा- हरणके लिये, एक छोटे बच्चेके मुंहमें अचानक यदि, एक मिश्रीकी डली डाल दो तो यह कहा नहीं जा सकेगा, कि उस बच्चेको मिश्री खानेसे जो सुख हुआ वह पूर्व- तृष्णाके क्षयसे हुआ है। इसी तरह मान लो, कि राह चलते चलते हम किसी रमणीय बागमें जा पहुँचे; और वहाँ कोयलका मधुर गान एकाएक सुन पड़ा, अथवा किसी मंदिरमें भगवान्की मनोहर छबि दीख पड़ी; तब ऐसी अवस्थामें यह नहीं कहा जा सकता, कि उस गानके सुननेसे, या उस छबिके दर्शनसे होनेवाले सुखकी हम पहलेहीसे इच्छा किये बैठे थे। सच बात तो यही है, कि सुखकी इच्छा किये बिनाही उस समय हमें सुख मिला। इन उदाहरणोंपर ध्यान देनेसे यह अवश्यही मानना पड़ेगा, कि संन्यास-मार्गवालोंकी सुखकी उक्त व्याख्या ठीक नहीं है; और यहभी मानना पड़ेगा, कि इंद्रियोंमें भलीबुरी वस्तुओंका उपभोग करनेकी स्वाभाविक शक्ति होनेके कारण जब वे अपना व्यापार करती रहती हैं; और जब
- Rockhill's Life of Buddha p. 33 यह श्लोक 'उदान'नामक पाली ग्रंथ (२. २) में है। परंतु उसमें ऐसा वर्णन नहीं है कि यह श्लोक बुद्धके मुखसे, उसे 'बुद्धत्व' प्राप्त होनेके समय निकला था। इससे यह साफ़ मालूम हो जाता है, कि यह श्लोक पहले पहल बुद्धके मुखसे न निकला हो।