भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 147

१०० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कभी उन्हें अनुकूल या प्रतिकूल विषयकी प्राप्ति हो जाती है, तब पहले तृष्णा या इच्छाके न रहनेपरभी हमें सुख-दुःखका अनुभव हुआ करता है। इसी बातकी ध्यान रखकर गीता (२. १४) में कहा गया है, कि 'मात्रास्पर्शोंसे शीत-उष्ण आदिका अनुभव करनेपर सुख-दुःख उत्पन्न हुआ करता है। सृष्टिके बाह्य पदार्थोंको 'मात्रा' कहते हैं। गीताके उक्त पदोंका अर्थ यह है, कि जब उन बाह्य पदार्थोंका इंद्रियोंसे स्पर्श अर्थात् संयोग होता है, तब सुख या दुःखकी वेदना उत्पन्न होती है। यही कर्मयोगशास्त्रकाभी सिद्धान्त है। कानको कर्कश आवाज़ अप्रिय क्यों मालूम होती है ? जिह्वाको मधुर रस प्रिय क्यों लगता है ? आँखोंको पूर्ण चंद्रका प्रकाश आल्हादकारक क्यों प्रतीत होता है ? इत्यादि बातोंका कारण कोईभी नहीं बतला सकता। हम लोग केवल इतनाही जानते हैं, कि जीभको मधुर रस मिलनेसे वह संतुष्ट हो जाती है। इससे प्रकट होता है, कि आधिभौतिक सुखका स्वरूप केवल इंद्रियोंके अधीन है; और इसलिये कभी कभी इन इंद्रियोंके व्यापारोंको जारी रखनेमेंही सुख मालूम होता है - चाहे इसका परिणाम भविष्यमें कुछभी हो। उदा- हरणार्थ, कभी कभी ऐसा होता है, कि मनमें कुछ विचार आनेसे उस विचारके सूचक शब्द आप-ही-आप मुंहसे बाहर निकल पड़ते हैं। ये शब्द कुछ इस इरादेसे बाहर नहीं निकाले जाते, कि इनको कोई जान लें; बल्कि कभी कभी तो इन स्वाभाविक व्यापारोंसे हमारे मनकी गुप्त बातभी प्रकट हो जाया करती है, जिससे हमको, उल्टे नुकसान हो सकता है। छोटे बच्चे जब चलना सीखते हैं, तब वे दिनभर यहाँ वहाँयोंही चलते फिरते हैं। इसका कारण यह है, कि उन्हें चलते रहनेकी क्रियामेंही उस समय आनंद मालूम होता है। इसलिये सब सुखोंको दुःखाभावरूपही न कहकर यही कहा गया है, कि "इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ" (गीता ३. ३४) अर्थात् इंद्रियोंमें और उनके शब्दस्पर्शा आदि विषयोंमें जो राग (प्रेम) और द्वेष हैं, वे दोनों पहलेहीसे 'व्यवस्थित' अर्थात् स्वतंत्र-सिद्ध हैं। और अब हमें यही जानना है, कि इंद्रियोंके ये व्यापार आत्माके लिये कल्याणदायक कैसे होंगे या करलिये जा सकेंगे। इसके लिये श्रीकृष्ण भगवान्‌का यही उपदेश है, इंद्रियों और मनकी वृत्तियोंका नाश करनेका प्रयत्न करनेके बदले उनको अपने आत्माके लिये लाभ- दायक बनानेके अर्थ अपने अधीन रखना चाहिये - उन्हे स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिये। भगवान्के इस उपदेशमें, तृष्णा तथा उसीके साथ सब मनोवृत्तियोंकोभी समूल नष्ट करनेके लिये कहनेमें, जमीन-आसमानका अंतर है। गीताका यह तात्पर्य नहीं है, कि संसारके सब कर्तृत्व और पराक्रमका बिलकुल नाश कर दिया जाय; बल्कि उसके अठारहवें अध्याय (गीता १८. २६) में तो कहा है, कि कार्य-कर्तामें समबुद्धिके साथ धृति और उत्साहके गुणोंका होनाभी आवश्यक है। इस विषयपर विस्तृत विवेचन आगे किया जायगा। यहाँ हमको केवल यही जानना है, कि 'सुख' और 'दुःख' दोनों भिन्न वृत्तियां हैं, या उनमेंसे एक दूसरीका अभाव मात्रही है।