श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुखदुःखविवेक १०१ इस विषयमें गीताका मत उपर्युक्त विवेचनसे पाठकोंके ध्यानमें आही गया होगा। 'क्षेत्र'का अर्थ बतलाते समय 'सुख' और 'दुःख'की अलग अलग गणना की गई है (गीता १३. ६); बल्कि यहभी कहा गया है, 'सुख' सत्त्वगुणका और 'तृष्णा' रजोगुणका लक्षण है (गीता १४. ६, ७); और सत्त्वगुण तथा रजोगुण दोनों अलग हैं। इससेभी भगवद्गीताका यह मत साफ़ मालूम हो जाता है, कि सुख और दुःख दोनों एक दूसरेके प्रतियोगी हैं; और भिन्न भिन्न दो वृत्तियाँ हैं। अठारहवें अध्यायमें राजस त्यागकी जो न्यूनता दिखलाई है, कि “कोईभी काम यदि दुःखकारक है, तो उसे छोड़ देनेसे त्यागफल नहीं मिलता; किंतु ऐसा त्याग राजस कहलाता है” (गीता १८. ८), वहभी इस सिद्धान्तके विरुद्ध है, कि “सब सुख तृष्णा-क्षयमूलकही हैं।” अब यदि यहमान लें, कि सब सुख तृष्णा-क्षयरूप अथवा दुःखाभावरूप नहीं हैं, और यहभी मान लें, कि सुख-दुःख दोनों स्वतंत्र वस्तुएँ हैं; तोभी - इन दोनों वेदनाओंके परस्पर-विरोधी या प्रतियोगी होनेके कारण - यह दूसरा प्रश्न उपस्थित होता है, कि जिस मनुष्यको दुःखका कुछभी अनुभव नहीं है, उसे सुखका स्वाद मालूम हो सकता है या नहीं ? कई लोगोंका तो यहाँतक कहना है, कि दुःखका अनुभव किये बिना सुखका स्वादही नहीं मालूम हो सकता। इसके विपरीत, स्वर्गके देवताओंके नित्यसुखका उदाहरण देकर कुछ पंडित प्रतिपादन करते हैं, कि सुखका स्वाद मालूम होनेके लिये दुःखके पूर्वानुभवकी कोई आवश्यकता नहीं है। जिस तरह किसीभी खट्टे पदार्थको पहले चखे बिनाही शहद, गुड़, शक्कर, आम, केला इत्यादि पदार्थोंका भिन्न भिन्न प्रकारका मीठापन मालूम हो जाया करता है, उसी तरह सुखकेभी अनेक प्रकार होनेके कारण पूर्व-दुःखानुभवके बिनाही भिन्न भिन्न प्रकारके सुखों (जैसे, रूईदार गद्दीपरसे उठकर परोंकी गद्दीपर बैठना इत्यादि) का सदैव अनुभव करते रहनाभी सर्वथा संभव है। परंतु सांसारिक व्यव- हारोंको देखनेसे मालूम हो जायगा, कि यह वादही निरर्थक है। पुराणोंमें देवताओं- परभी संकट पड़नेके कई उदाहरण हैं; और पुण्यका अंश घटतेही कुछ समयके बाद स्वर्ग-सुखकाभी नाश हो जाया करता है। इसलिये स्वर्गीय सुखका उदाहरण ठीक नहीं है। और, यदि ठीकभी हो, तो स्वर्गीय सुखका उदाहरण हमारे किस काम का ? यदि यह सत्य मान लें, कि “नित्यमेव सुखं स्वर्गे” तो इसीके आगे (मभा. शां. १९०. १४) यहभी कहा है, कि “सुखं दुःखमिहोभयम्” - अर्थात् इस संसारमें सुख और दुःख दोनों मिश्रित हैं। इसीके अनुसार समर्थ श्रीरामदास स्वामीनेभी कहा है, “हे विचारवान् मनुष्य, इस बातको अच्छी तरह सोचकर देख ले, कि इस संसारमें पूर्ण सुखी कौन है ?” इसके सिवा द्रौपदीने सत्यभामाको यह उपदेश दिया है कि :-