श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सुखं सुखेनेह न जातु लभ्यं दुःखेन साध्वी लभते सुखानि । अर्थात् “ सुख सुखसे कभी नहीं मिलता; साध्वी स्त्रीको सुख-प्राप्तिके लिये दुःख या कष्ट सहना पड़ता है" (मभा. वन. २३३. ४)। इससे कहना पड़ेगा, कि यह उपदेश इस संसारके अनुभवके अनुसार सत्य है। देखिये, यदि जामुन किसीके होंठपर धर दिया जाय, तोभी उसको चबानेके लिये पहले मुंह खोलना पड़ता है; और यदि मुंहमें चला जाय, तो उसे खानेका कष्ट सहनाही पड़ता है। सारांश, यह बात सिद्ध है, कि दुःखके बाद सुख पानेवाले मनुष्यके सुखास्वादमें, और हमेशा विषयोपभोगोंमेंही निमग्न रहनेवाले मनुष्यके सुखास्वादमें बहुत भारी अंतर है। इसका कारण यह है, कि हमेशा सुखका उपभोग करते रहनेसे सुखका अनुभव करनेवाली इंद्रियांभी शिथिल-सी होती जाती हैं। कहाभी है कि :- प्रायेण श्रीमंतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते । काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां च सर्वशः ॥ अर्थात् “ श्रीमानोंमें सुस्वादु अन्नका सेवन करनेकोभी शक्ति नहीं रहती; परंतु गरीब लोग काष्ठकोभी पचा जाते हैं" (मभा. शां. २८. २९)। अतएव जब कि हमको इस संसारकेही व्यवहारोंका विचार करना है, तब कहना पड़ता है, कि इस प्रश्नको अधिक हल करते रहनेमें कोई लाभ नहीं, कि बिना दुःख पाये हमेशा सुखका अनुभव किया जा सकता है या नहीं। इस संसारमें यही क्रम सदासे सुन पड़ रहा है, कि “ सुखस्यानंतरं दुःखं दुःखस्यानंतरं सुखम् " (मभा. वन. २६०. ४९; शां. २५. २३.) अर्थात् सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख मिलाही करता है। और महाकवि कालिदासनेभी मेघदूत (मे. १. १४) में वर्णन किया है :- कस्यैकान्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा । नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ॥ “किसीकीभी स्थिति हमेशा सुखमय या हमेशा दुःखमय नहीं होती। सुख-दुःखकी दशा पहियेके समान ऊपर और नीचेकी ओर हमेशा बदलती रहती है।” फिर यह दुःख चाहे हमारे सुखकी मिठासको अधिक बढ़ानेके लिये उत्पन्न हुआ हो या इस प्रकृतिके संसारमें उसका औरभी कुछ उपयोग होता हो; उक्त अनुभव-सिद्ध क्रमके बारेमें मतभेद हो नहीं सकता। यहाँ, यह बात कदाचित् असंभव न होगी, कि कोई मनुष्य हमेशाही विषय-सुखका उपभोग किया करे और उससे उसका जीभी न ऊबे। परंतु इस कर्मभूमि (मृत्युलोक या संसार)में यह बात सर्वथा असंभव है, कि दुःखका बिलकुल नाश हो जाय और हमेशा सुख-ही-सुखका अनुभव मिलता रहे। यदि यह बात सिद्ध है, कि संसार केवल सुखमय नहीं है, किंतु वह सुख- दुःखात्मक है, तो अब तीसरा प्रश्न आप-ही-आप मनमें पैदा होता है, कि संसारमें सुख अधिक है या दुःख ? जो पश्चिमी पंडित आधिभौतिक सुखकोही परम साध्य