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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 956 में से

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पृष्ठ 150

सुखदुःखविवेक १०३ मानते हैं, उनमेंसे बहुतेरोंका कहना है, कि यदि संसारमें सुखसे दुःखही अधिक होता, तो (सब नहीं तो) अधिकांश लोग अवश्यही आत्महत्या कर डालते। क्योंकि जब उन्हें मालूम हो जाता, कि संसार दुःखमय है, तो वे फिर उसमें रहनेकी झंझटमें क्यों पड़ते ? बहुधा देखा जाता है, कि मनुष्य अपनी आयु अर्थात् जीवनसे नहीं ऊबता; इसलिये निश्चयपूर्वक यही अनुमान किया जा सकता है, कि इस संसारमें मनुष्यको दुःखकी अपेक्षा सुखही अधिक मिलता है; और इसलिये धर्म-अधर्मका निर्णयभी, सुखकोही सब लोगोंका परम साध्य समझ कर, किया जाना चाहिए। अब यदि उपर्युक्त मतकी अच्छी तरह जांचकी जाय तो मालूम हो जायगा, कि यहाँ आत्महत्याका जो संबंध सांसारिक सुखके साथ जोड़ दिया गया है, वह वस्तुतः सत्य नहीं है। हाँ, यह बात सच है, कि कभी कभी कोई मनुष्य संसारसे त्रस्त होकर आत्महत्या कर डालता है; परंतु सब लोग उसकी गणना 'अपवाद' में अर्थात् पागलोंमें किया करते हैं। इससे यही बोध होता है, कि सर्वसाधारण लोगभी 'आत्महत्या करने या न करने' का संबंध सांसारिक सुखके साथ नहीं जोड़ते किंतु उसे (अर्थात् आत्महत्या करने या न करनेको) एक स्वतंत्र बात समझते हैं। यदि असभ्य और जंगली मनुष्योंके उस 'संसार' या जीवनका विचार किया जावे, जो सुधरे हुए और सभ्य मनुष्योंकी दृष्टिसे अत्यंत कष्टदायक और दुःखमय प्रतीत होता है; तोभी वही अनुमान निष्पन्न होगा, जिसका उल्लेख ऊपरके वाक्यमें किया गया है। प्रसिद्ध सृष्टिशास्त्रज्ञ चार्ल्स डार्विनने अपने प्रवास-ग्रंथमें कुछ ऐसे जंगली लोगोंका वर्णन किया है, जिन्हें उसने दक्षिण-अमेरिकाके अत्यंत दक्षिण प्रांतोंमें देखा था। उस वर्णनमें लिखा है, कि वे असभ्य लोग - स्त्री, पुरुष सब - कड़ाकेके जाड़ेके अपने देशमें बारहों महीने नंगे घूमते रहते हैं; इनके अपने पास अनाजका कुछभी संग्रह न करते रहनेसे इन्हें कभी कभी भूखों रहना पड़ता है; तथापि इनकी संख्या दिनोंदिन बढ़तीही जाती है*। देखिये, ये जंगली मनुष्यभी अपनी जान नहीं देते; परंतु क्या इससे यह अनुमान किया जा सकता है, कि उनका संसार या जीवन सुखमय है ? कदापि नहीं। यह बात सच है, कि वे आत्महत्या नहीं करते; परंतु इसके कारणका यदि सूक्ष्म विचार किया जावे, तो मालूम होगा, कि हर एक मनुष्यको - चाहे वह सभ्य हो या असभ्य - केवल इसी बातमें अत्यंत आनंद मालूम होता है, कि "मैं पशु नहीं हूँ मनुष्य हूँ।" और अन्य सब सुखोंकी अपेक्षा मनुष्य होनेके सुखको वह इतना अधिक महत्त्वपूर्ण समझता है, कि यह संसार कितनाभी कष्टमय क्यों न हो; तथापि वह उसकी ओर ध्यान नहीं देता; और न वह अपने इस मनुष्यत्वके दुर्लभ सुखको खो देनेके लिये कभी तैयार रहता है। मनुष्यकी बात तो दूर रही, पशु-पक्षीभी आत्महत्या नहीं करते तो क्या इससे कह सकते हैं, कि उनकाभी संसार या जीवन सुखमय है ? तात्पर्य यह है, कि "मनुष्य या पशु-पक्षी आत्महत्या नहीं

  • Darwin's Naturalist's Voyage Round the World - Chap. X.
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