भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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१०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र करते” इस बातसे यह भ्रामक अनुमान नहीं करना चाहिये, कि उनका जीवन सुखमय है। सच्चा अनुमान यही हो सकता है, कि संसार कैसाभी हो, उससे कुछ अपेक्षा न रखते हुये; सिर्फ़ अचेतन अर्थात् जड़ अवस्थासे सचेतन यानी सजीव अवस्थामें आनेहीसे अनुपम आनंद मिलता है; और उसमेंभी मनुष्यत्वका आनंद तो सबमे श्रेष्ठ है। हमारे शास्त्रकारोंनेभी कहा है :- भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजोविनः । बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृता ॥ ब्राह्मणेषु च विद्वांसः विद्वत्सु कृतबुद्धयः । कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः ॥ अर्थात् “अचेतन पदार्थोंकी अपेक्षा सचेतन प्राणी श्रेष्ठ है। सचेतन प्राणियोंमें बुद्धिमान्, बुद्धिमानोंमें मनुष्य, मनुष्योंमें ब्राह्मण, ब्राह्मणोंमें विद्वान्, विद्वानोंमें कृतबुद्धि (वे मनुष्य जिनकी बुद्धि सुसंस्कृत हो), कृतबुद्धियोंमें कर्ता (काम करनेवाले), और कर्त्ताओंमें ब्रह्मवादी श्रेष्ठ हैं।” इस प्रकार शास्त्रों (मनु. १. ९६, ९७; मभा. उद्यो. ५. १ और २) में क्रमशः बढ़ती हुई श्रेणियोंका जो वर्णन है, उसकाभी रहस्य वही है, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। और उसी न्यायसे प्राकृत भाषा-ग्रंथोंमेंभी कहा गया है, कि चौरासी लाख योनियोंमें नरदेह श्रेष्ठ है, नरोंमें मुमुक्षु श्रेष्ठ है और मुमुक्षुओंमें सिद्ध श्रेष्ठ है। संसारमें जो कहावत प्रचलित है, कि “सबको अपनी जान अधिक प्यारी होती है।” उसकाभी कारण वही है, जो ऊपर लिखा गया है। और इसी कारणसे संसारके दुःखमय होनेपरभी जब कोई मनुष्य आत्महत्या करता है, तो उसको लोग पागल कहते हैं; और धर्मशास्त्रके अनुसार वह पापी समझा जाता है (मभा. कर्ण. ७०. २८)। तथा आत्महत्याका प्रयत्नभी कानूनके अनुसार जुर्म माना जाता है। संक्षेपमें यह सिद्ध हो गया, कि “मनुष्य आत्महत्या नहीं करता” – इस बातसे संसारके सुख- मय होनेका अनुमान करना उचित नहीं है। ऐसी अवस्थामें हमको, “यह संसार सुखमय है या दुःखमय?” इस प्रश्नका निर्णय करनेके लिये, पूर्वकर्मानुसार नरदेहप्राप्ति-रूप अपने नैसर्गिक भाग्यकी बातको छोड़कर, केवल उसके पश्चात् अर्थात् इस संसारहीकी बातोंका विचार करना चाहिये। “मनुष्य आत्महत्या नहीं करता; बल्कि वह जीनेकी इच्छा करता रहता है” – यह तो सिर्फ़ संसारकी प्रवृत्तिका कारण है। आधिभौतिक पंडितोंके कथनानुसार संसारके सुखमय होनेका यह कोई सबूत या प्रमाण नहीं है। यह बात इस प्रकारभी कही जा सकती है, कि आत्महत्या न करनेकी बुद्धि स्वाभाविक है; वह संसारके सुखदुःखोके तारतम्यसे उत्पन्न नहीं हुई है; और, इसीलिये इससे यह सिद्ध हो नहीं सकता कि संसार सुखमय है।