भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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केवल मनुष्यजन्म पानेके सौभाग्यको और (उसके बादके) मनुष्यके सांसारिक व्यवहार या 'जीवन'को भ्रमवश एकही नहीं समझ लेना चाहिये। केवल मनुष्यत्व, और मनुष्यके नित्य व्यवहार अथवा सांसारिक जीवन, ये दोनों भिन्न भिन्न बातें हैं। इस भेदको ध्यानमें रखकर यह निश्चय करना है, कि इस संसारमें श्रेष्ठ नरदेह-धारी प्राणीके लिये सुख अधिक है अथवा दुःख ? इस प्रश्नका यथार्थ निर्णय करनेके लिये केवल यही सोचना एकमात्र साधन या उपाय है, कि प्रत्येक मनुष्यके 'वर्तमान समयकी' वासनाओंमेंसे कितनी वासनाएँ सफल हुई और कितनी निष्फल। 'वर्तमान समयकी' कहनेका कारण यह है, कि जो बातें सभ्य या सुधरी हुई दशाके सभी लोगोंको प्राप्त हो जाया करती हैं, उनका नित्य व्यवहारमें उपयोग होने लगता है; और उनसे जो सुख हमें मिलता है, उसे हम लोग भूल जाया करते हैं। एवं जिन वस्तुओंको पानेकी नई इच्छा उत्पन्न होती है, उनमेंसे जितनी हमें प्राप्त हो सकती हैं, सिर्फ उन्हींके आधारपर हम इस संसारके सुख- दुःखोंका निर्णय किया करते हैं। इस बातकी तुलना करना, कि हमें वर्तमानकालमें कितने सुख-साधन उपलब्ध हैं और सौ वर्ष पहले इनमेंसे कितने सुखसाधन प्राप्त हो गये थे; और इस बातका विचार करना कि आजके दिन मैं सुखी हूँ या नहीं; दोनों बातें अत्यंत भिन्न हैं। इन बातोंको समझनेके लिये उदाहरण लीजिये। इसमें संदेह नहीं, कि सौ वर्ष पहलेकी बैलगाड़ीकी यात्रासे वर्तमान समयकी रेल-गाड़ीकी यात्रा अधिक सुखकारक है। परंतु अब इस रेल-गाड़ीसे मिलनेवाले सुखके 'सुखत्व'को हम भूल गये हैं। और इसका परिणाम यह दीख पड़ता है, कि किसी दिन रेल-गाड़ी देरसे आती है; और हमारी डाक हमें समयपर नहीं मिलती, तो हमें अच्छा नहीं लगता - कुछ दुःखी-सा होता है। अतएव मनुष्यके वर्तमान समयके सुख- दुःखोंका विचार, उन सुख-साधनोंके आधारपर नहीं किया जाता कि जो उपलब्ध हैं; किंतु यह विचार मनुष्यकी 'वर्तमान' आवश्यकताओंके (इच्छाओं या वासनाओं) आधारपरही किया जाता है। और, जब हम इन आवश्यकताओं, इच्छाओं या वासनाओंका विचार करने लगते हैं तब मालूम हो जाता है, कि उनका तो कुछ अंतही नहीं - वे अनंत और अमर्यादित हैं। यदि हमारी एक इच्छा आज सफल हो जाय, तो कल दूसरी नई इच्छा उत्पन्न हो जाती है; और मनमें यह भाव उत्पन्न होता है, कि वह इच्छाभी सफल हो। ज्यों ज्यों मनुष्यकी इच्छा या वासना सफल होती जाती है, त्यों त्यों उसकी इच्छाकी दौड़ एक कदम आगेही बढ़ती चली जाती है; और जब कि यह बात अनुभवसिद्ध है, कि इन सब इच्छाओं या वासनाओंका सफल होना संभव नहीं, तब इसमें संदेह नहीं, कि मनुष्य दुःखी हुए बिना रह नहीं सकता। यहाँ निम्न दो बातोंके भेदपर अच्छी तरह ध्यान देना चाहिये : (१) सब सुख केवल तृष्णा-क्षयरूपही है; और (२) मनुष्यको कितनाही सुख मिले, तोभी वह असंतुष्टही रहता है। यह कहना एक बात है, कि प्रत्येक सुख दुःखाभावरूप नहीं